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रविवार, ८ नवम्बर २००९

श्रद्घांजलिः का. कुवरपाल सिंह

जानेमाने हिन्दी साहित्यकार व अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पूर्व डीन कामरेड़ कुवरपाल सिंह का लंबी बिमारी के बाद 72 वर्ष की आयु में बीती रात निधन हो गया। आप जनवादी लेखक संघ के संस्थापक सदस्यों में से एक रहे है, तथा वर्तमान में जनवादी लेखक संघ को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में सेवा प्रदान कर रहे थे।

हाल ही में आपके सम्मान में आयोजित कार्यक्रम के दौरान आपने मरणोपरांत वैज्ञानिक अनुसंधान हेतू देहदान करने की इच्छा जाहिर की थी। आपकी अंतीम इच्छा को पूर्ण करते हुवे आपकी देह अ.मु.यू. को सौप दी गयी।

जलेस परिवार कुवरपाल सिंह जी पत्नी नमिता सिंह, उनके पुत्र व पुत्री के प्रति हार्दिक शोक संवेदना व्यक्त करता है।

का. कुवरपाल सिंह अमर रहे।
का. कुवरपाल सिंह को लाल सलाम।

गुरुवार, ५ नवम्बर २००९

मालवा के दुलारे को नमन :

क्या वे सचिन के 17000 रन पूरे करने के लिये प्रतीक्षा कर रहे थे?
वीरेन्द्र जैन्
शायद उन्हें सचिन के 17000 रन पूरे होने की प्रतीक्षा थी। अपने पिछले जन्मदिन पर लिखे कागद कारे में उन्होंने आगामी मृत्यु को सूंघ लेने के साफ साफ संकेत दे दिये थे।
वे ऐसे इकलौते वरिष्ट सम्पादक विचारक चिंतक और सामाजिक कार्यकर्ता थे जिन्हें समाज राजनीति अर्थ व्यवस्था आदि की बराबरी पर क्रिकेट को रखने में कोई परेशानी नहीं होती थी जबकि हम जैसे कई लोग जब किसी विशेष महत्व के विषय पर उनके धारदार लेख की प्रतीक्षा में जनसत्ता का इंतज़ार कर रहे होते, तब प्रथम पृष्ठ पर उतनी ही धार के साथ क्रिकेट पर उनका लेख देख कर कोफ्त होती थी। बाद में पता चला कि वे एक अखकार के सम्पादक के रूप में जन रुचियों के प्रति कितने सम्वेदन शील थे।
एक बार जब वे भारत भवन में आये थे और बातचीत में उनसे उनके सती प्रथा वाले सम्पादकीय के बारे में जिज्ञासा व्यक्त की तो उन्होंने कहा था कि एक सम्पादक का काम भी एक बेट्स मैन की तरह होता है जिसको एक दो सेकिंड में फैसला ले लेना होता है कि इस आती हुयी बाल को खेलना है छोड़ना है, हिट करना है या डिफेंसिव रहना है! और ये एक दो सेकिंड बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। इस त्वरित फैसले में की गयी गलती कई बार खिलाड़ी को भारी भी पड़ जाती है । सम्पादक के लिये भी ऐसे ही क्षण बहुत महत्वपूर्ण होते हैं।

बुधवार, ४ नवम्बर २००९

समीक्षा - मेरे मुंह में ख़ाक

“मेरे मुंह में खाक्””
मुश्ताक अहमद यूसुफी के उपन्यास का हिन्दी अनुवाद
वीरेन्द्र जैन
मुश्ताक अहमद यूसुफी की किताब - मेरे मुंह में खाक- के हिन्दी में प्रकाशित होने की सwचना के साथ ही इस बारे में कोई दूसरा विचार नहीं आया सिवाय इसके कि इसे खरीदना है और पढना है। यह इसलिये कि इससे पहले में उनकी किताब- आबे गुम- का अनुवाद -खोया पानी के अंश पहले लफ्ज़ में और फिर पुस्तकाकार पढ कर मुग्ध हो चुका था। -राग दरबारी- के बाद यह दूसरी पुस्तक थी जिसके पढने का आग्रह में सेक़ङों दूसरे लोगों से कर चुका था। एक बेहद अच्छे शायर तुफैल चतुर्वेदी अपनी शायरी के साथ साथ इस बात के लिये भी सराहे जायेंगे कि उन्होंने न केवल मुश्ताक अहमद यूसुफी की किताबों का अनुवाद किया अपितु उसे प्रकाशित करके हिन्दी पाठ्कों तक पहुंचाया। मुझे ऐसा कहना चाहिये फिर भी में नहीं कहता कि यूसुफीजी भारतीय उपमहाद्वीप के सर्वश्रेष्ठ हास्य लेखक हैं पर इतना ज़रूर कह सकता हूं कि हास्य व्यंग्य की असंख्य पुस्तकें पढ जाने के बाद भी मैंने इससे बेहतर कोई भी हास्य पुस्तक नहीं पढी। पुस्तक का फ्लेप मैटर सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार आलोक पुराणिक ने और भूमिका डा. ज्ञान चतुर्वेदी ने तैयार की है और वे दौनों भी इसी निष्कर्ष पर पहुंचे हैं।
मैंने जब भी युसुफी जी की किताब के बारे में लिखने की सोची तो में यह नहीं तय कर पाया कि कहां से शुरुआत की जाये क्योंकि सिरे से आखिर तक पूरी किताब ऐसे ऐसे ज़ुम्लों से भरी हुयी है कि पढते समय अंडरलाइन करता गया तो पूरी किताब ही अंडरलाइन हो गयी जैसे कि कम्प्यूटर में सलेक्ट आल का विकल्प होता है।
कहा गया है और सही कहा गया है कि दृष्टा ही सृष्टा होता है भोक्ता सृष्टा नहीं होता। उनकी पुस्तकें पढ कर लगता है कि वे किसी विदेह की तरह इस पूरी दुनिया को देखते और इस फानी दुनिया के कार्य कलापों”को ऐसे ज़ुमलों में व्यक्त करते हैं कि इस नटखट दुनिया की शैतानियों”पर एक वात्सल्य भरा आनन्द महसूस होता है। ऐसा लगता है कि पाठक भी हंस कर प्रभु से प्रार्थना करता महसूस होता है कि- हे प्रभु इन्हें माफ कर देना, ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं।
उक्त पुस्तक में एक जगह वे अपने पात्र के मुंह से कहलवाते हैं- हर वह जानवर जिसे मुसलमान खा सकते हैं पाक है, इस कारण से मुस्लिम देशों में बकरों को अपनी पवित्रता के कारण खासा नुकसान पहुंचा है।
अपनी भूमिका में वे लिखते हैं कि स्वयं प्राक्थान लिखने में वही आसानी और फायदे निहित हैं, जो खुद्कुशी में होते हैं, यानि देहांत की तिथि, हत्या का उपकरण,और हत्या के स्थान का चयन मृतक खुद करता है।
वे कहते हैं कि यह किताब चराग तले के पूरे आठ साल बाद प्रकाशित हो रही है। जिन प्रशंसकों को हमारी पहली किताब में ताज़गी, ज़िन्दादिली और जवानी का अक्श नज़र आया, सम्भव है कि उन्हें बुज़ुर्गी के आसार दिखायी दें। इसका कारण हमें तो यही लगता है कि उनकी (पाठक) उम्र में आठ साल की बढोत्तरी हो चुकी है।
aaआगे कहते हैं कि इंसान को हैवाने ज़रीफ (प्रबुद्ध जानवर्) कहा गया है लेकिन यह हैवानों के साथ बड़ी ज्यादती है, इसलिये कि देखा जाय तो इंसान अकेला वह जानवर है जो मुसीबत से पहले मायूस हो जाता है।
अगर आप को इस किताब की कोई ऐसी प्रति मिल जाय जो इससे पहले कोई आलोचक पढ चुका हो तो आपको हर पेज पर ढेरों हाईलाइट किये हुये वाक्य मिल जायेंगे, पर आप आलोचक की आलोचना करते हुये कहेंगे कि जो वाक्य उसने हाईलाइट करने से छोड़ दिये हैं वे क्यों छोड़ दिये हैं!
में उनके उदाहरण देने की वह गलती नहीं करूंगा जैसा कि अच्छी पार्टी के बुफे भोजन के बाद लगता है कि फलां आइटम तो खा ही नहीं पाये!
इस हाईटेक ज़माने में आपको इस किताब को प्राप्त करने के लिये कोई चिटठी पत्री ड्राफ्ट मनी आर्डर की ज़रूरत नहीं है अपितु आप केवल लफ्ज़ के खाता संख्या 2629020000251 में बैंक आफ बड़ोदा में 300/-रुपये ज़मा करने के बाद वहीं से मोबाइल नम्बर 9810387857 पर पूरा पता एस एम एस कर दें तो आपको अति शीघ्र डाक या कोरिअर से किताब मिल जायेगी।
में अंत में केवल इतना ही कह सकता हूं कि शिष्ट हास्य व्यंग्य को पसन्द करने वाला कोई भी व्यक्ति जो उक्त राशि व्यय कर सकता हो अगर इस किताब को स्टाक खत्म होने से पहले मंगा कर नहीं पढेगा तो यह उसका दुर्भाग्य होगा। अगर में इसका प्रकाशक होता तो यह भी लिखना देता कि पसन्द न आने पर पैसे वापिस्।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629

व्यंग्य- में गाँव नहीं जा पाया

व्यंग्य
मैं गाँव नहीं जा पाया
वीरेन्द्र जैन
बचपन में राष्ट्रकवि मैथली शरण गुप्त की कविता पढ़ी थी।
अहा ग्राम्यजीवन भी क्या है!
पर उन दिनों कविता केवल हिन्दी की किताब में पड़ने की चीज होती थी और उस पर प्रयोग करने की संभावना नहीं थी। फिर मुझे राहत इंदौरी का एक शेर बहुत पसंद आया था। शेर यूँ था-
शहरों में तो बारूदों का मौसम है
चलो गाँव को अमरूदों का मौसम है
पर अब मुझे यह शेर भी 'शेर' की तरह डराता है। हुआ ये कि यह शेर सुन कर मैं गाँव के लिए बिस्तरा बांधने लगा था तभी पता चला कि मालेगाँव में बम विस्फोट हो गया और पता नहीं दुर्भाग्य से या सौभाग्य से यह विष्फोट समय से पहले हो गया और कुछ इस तरह से हुआ कि -
जो तोहे कांटा बुहे, ताहि बूह तू फूल
तुझको फूल के फूल हैं, बाको हैं त्रिशूल
सो भइया हुआ यूँ था कि दूसरों के लिए बम बनाने वालों ने बम तो बना लिये थे पर बेचारे बम बनाने वाले हिन्दू भाई कुछ ज्यादा ही उतावले थे सो बनाने वालों के साथ ही फट गये और त्रिशूल दीक्षा लेने वालों के लिए त्रिशूल बन गये । इन बम बनाने वालों ने तैयारी तो पूरी कर रखी थी। उनके अड्डे से मुसलमानों जैसी नकली दाढी और पाजामे शोरवानी तक बरामद हुयीं थीं जिन्हें पहिन कर वे जाते और प्रत्यक्षदर्शी पुलिस को बताते कि ऐसी रूपरेखा वाले यहाँ घूम रहे थे और यह उन्हीं की करतूत है। मीडिया को मशाला मिल जाता और फिर क्या था उर्वर दिमाग लगातर कहानियाँ उगलते रहते। पर मैं डर गया और कहीं नहीं गया।
कई महीने गुजर जाने के बाद फिर गाँव जाने का भूत सवार हुआ तो मैंने फिर बिस्तर बांधना शुरू किया और फिर वही हुआ। दीवाली से ऐन पहले मडगाँव में पटाखा फट गया जो कुछ बड़ा था और जिसे ले जाकर बाजार में रखने जा रहे दोनों वीर, वीर गति को प्राप्त हुये। ये बेचारे भी उसी गैंग के सदस्य थे जो खुद बम विष्फोट करके दूसरे धर्म वालों पर जिम्मेवारी थोपने का काम अपनी भगवा पार्टी के मुँहजोरों को सौंप देते हैं ताकि महौल में साम्प्रदायिकता छा जाये जो बहुमत के वोटों की बारिश करे। समाज में बंटवारा होगा तो लाभ बहुसंख्यकों की पार्टी को ही होगा।
वैसे मैं तीसरी बार भी चिरगाँव जाने की कोशिश करता पर मेरा दुर्भाग्य कि इस बार हिन्दी के एक कवि की कविता मेरी राह में आ गयी। मैं गाँव जाने को था और स्व क़ैलाश गौतम की कविता कह रही थी-

गाँव गया था गाँव से भागा
पंचायत की चाल देख कर
आंगन की दीवाल देख कर
सिर पर आती डाल देखकर
नदी का पानी लाल देखकर
और आंख में बाल देखकर
गाँव गया था गाँव से भागा

जला हुआ खलिहान देखकर
नेता का दालान देखकर
मुस्काता शैतान देखकर
घिघियाता इंसान देखकर
कहीं नहीं ईमान देखकर
बोझ हुआ मेहमान देखकर
गाँव गया था गाँव से भागा

नये नये हथियार देखकर
लहू लहू त्योहार देखकर
झूठ की जै जैकार देख कर
सच पर पड़ती मार देखकर
भगतिन का श्रंगार देखकर
गिरी व्यास की लार देखकर
गाँव गया था गाँव से भागा

कविता तो बहुत लंबी है पर मेरे लिए इतनी ही काफी थी और मैंने सोच लिया कि मालेगाँव, मडगाँव, चिरगाँव, क्या किसी गाँव नहीं जाऊँगा।
............नहीं तो जाऊंगा पर शहर में भी सुकून कहाँ है! और यह अमेरिका तो ग्लोबल विलेज बनाने को तैयार है व हमारे प्रधानमंत्री जिसके लिए उतावले हैं।
अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जायेंगे
मर के भी चैन न पाया तो किधर जायेंगे
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र

मंगलवार, १३ अक्तूबर २००९

श्रद्धांजलि हरीश भदानी

श्रद्धांजलि: हरीश भदानी
वे निरंतर विकसित होते रहने वाले रचनाकार थे
वीरेन्द्र जैन
हरीश भदानी जी के न रहने का समाचार जैसे ही इन्टरनैट पर देखा तो लगा कि कोई अपने बहुत निकट का व्यक्ति नहीं रहा है जबकि मेरी उनसे कभी मुलाकात नहीं हुयी। मुझे कैफी आजमी के कहे वे शब्द याद आ गये कि विचारधारा का रिश्ता खून के रिश्ते से भी बढ कर होता है। उनके नाम से मेरा पहला परिचय 1977 में हुआ जब मैं राजस्थान के भरतपुर में पोस्टेड था और उसी दौरान मार्क्सवाद का कखग समझने का अवसर मिला था। भदानी जी के व्यक्तित्व और कृतित्व से परिचित कराने का काम भी कामरेड रामबाबू शुक्ल ने ही किया जिन्होंने मुझे मार्क्सवाद की बेसिक जानकारी दी थी और पहली बार कम्युनिष्ट पार्टियों के मूलभूत भेदों से भी अवगत कराया था। बाद में तो मैं जितने दिन राजस्थान में रहा तब शायद ही कोई साहित्यिक चर्चा ऐसी रही हो जब कहीं न कहीं भदानी जी का जिक्र न आया हो। बहुत बाद में पता चला कि वे सीपीएम की तत्कालीन राज्यसभा सदस्य सरला महेश्वरी के पिता हैं तथा उसके बाद उनसे एक रिश्ता और जुड़ा जब वे मुझे अपने छोटे भाई की तरह स्नेह देने वाले कथाकार, से रा यात्री के समधी बन गये।
11 जून 1933 को बीकानेर में जन्मे हरीश भदानी जी किसी समय राजस्थान के नीरज और बच्चन माने जाते थे तथा उनके गीत और रूवाइयाँ अभी भी उस दौर के लोगों को भावुक बना जाती हैं। 60-70 के दशक में वे प्रेम और विद्रोह दोनों ही तरह के रूमानों के गायक थे और कवि सम्मेलनों में उन्हें किसी साहित्यिक सितारे की तरह बुलाया जाता था। उसी दौरान 60से 80 के दशकों में वे 'वातायन' के सम्पादक के रूप में भी पहचाने गये। 1959 में उनके गीतों का संकलन 'अधूरे गीत' आया तो 1961 में 'सपन की गली' तथा 1962 में 'हंसनी यादों की' नामक रूबाइयों का संग्रह। आज भी उन गीतों और रूबाइयों को याद करके लोग अपने अतीत में डूबने लगते हैं। एक बड़े कवि के रूप में बाद में विकसित हुये हरीश भदानी के ये गीत उनके काव्य का शैशव काल हैं पर आज भी वे गीत किसी शिशु की तरह उतने ही मासूम और प्यारे हैं, जिनके साथ लाखों लोगों के अहसासों से एकाकार होने का इतिहास जुड़ा है। अभी भी लोगों को उनके गीत- तेरी मेरी जिन्दगी के गीत एक हैं- रही अछूती सभी मटकियां- सभी सुख दूर से गुजरे-सात सुरों में बोल- सोजा पीड़ा मेरे गीत की, आदि कंठस्थ हैं, जो कविता की सफलता का सबसे बड़ा मापक यंत्र हैं।
1966 में उनका एक संकलन आया-'सुलगते पिंड' और इसी साल दूसरा संकलन आया 'एक उजली नजर की सुई' इन दोनों ही संकलनों में महानगरीय सभ्यता से परिचय पाने और उसे अपने आलिंगन में समेटने के प्रयास की रचनाएं हैं। नगर की अजनबियत को अपनी छैनी के प्रहारों से तराशने के दौर में रची बसी इन कविताओं के तेवर ही अलग हैं। इसी दौरान वे एक भावुक विद्रोही से एक कम्युनिष्ट में बदल रहे होते हैं।उनके तब के गीत दिल और दिमाग के समन्वय और संतुलन के गीत हैं। इनमें से कुछ के शीर्षक ही अपने कथ्य का संकेत देते हैं जैसे- 'मेंने नहीं कल ने बुलाया है' 'क्षण क्षण की कैंची से काटो तो जानूँ' 'ऐसे तट हें क्यों इन्कारें' 'संकल्पों के नेजों को और तराशो' 'थाली भर धूप लिये' 'सड़क बीच चलने वालों से' आदि। इस दौर के तेरह वर्षों के बाद उनकी लम्बी कविता 'नष्टोमोह' आती है जो पिछले दौर के विद्रोही आवेग का उपसंहार जैसी है। 'रोटी नाम सत्त है' जैसी कविता के लेखक को आपात काल ने जो उत्तेजक बेचैनी दी थी उसके परिणाम स्वरूप वे एक नुक्कड़कवि के रूप में प्रकट हुये व इस दौरान 'भारत की भूखी जनता को अपना लेटीनेंट चाहिये' जैसी रचनाएं लिखी गयीं।
1981 में 'नष्टोमोह' वाले हरीश भदानी फिर एक नये रूप में प्रकट होते हैं और उनकी पुस्तक 'खुले अलाव पकाई घाटी' आती है। इसके एक गीत में वे कहते हैं-
चले कहाँ से
गये कहाँ तक
याद नहीं है
रिस रिस झर झर ठर ठर गुमसुम
झील हो गया है घाटी में
हलचल बस्ती में केवल
एक अकेलापन पांती में
दिया गया
या लिया शोर से
याद नहीं है
वे अपने इन गीतों में दमघोंटू ठहराव के खिलाफ निरंतर बेचैन रहने वाले कवि की तरह सामने आते हैं। पर अपने अकेलेपन और माहौल के सन्नाटे को वे सदैव ही रचनात्मकता से तोड़ते रहते हैं। इस दौरान उनके संग्रह आते रहते हैं। 1982 में सन्नाटे के 'शिलाखण्ड पर' आता है तो 1985 में 'एक अकेला सूरज खेले' और 'आज की आंख का सिलसिला' आता है। 1988 में 'विश्मय के अंशी हैं ' आता है तो 1991 में 'पितृकल्प' और 1999 में 'मैं और मेरा अष्टावक्र' जैसी लम्बी कविताएं सामने आती हैं। इस बीच राजस्थानी में भी संकलन 1984 में बांथा में भूगोल के नाम से आता है।
भदानीजी को मिले पुरस्कारों की भी अनंत श्रंखला है किंतु कुछ प्रमुख पुरस्कार निम्नानुसार हैं
राजस्थान साहित्य अकादमी से मीरा पुरस्कार
प्र्रियर्दशनी अकादमी सम्मान
परिवार अकादमी (महाराष्ट्र) सम्मान
पशचिमबंग अकादमी (कोलकता) से राहुल सम्मान
के क़े बिड़ला फाउन्डेशन से 'बिहारी' सम्मान
उदयपुर में विशिष्ट सम्मान, आदि
भदानी जी ने इसके अलावा साक्षरता कार्यक्रमों जैसे सामाजिक कार्यों में सक्रिय भागीदारी की है व साक्षरता पर उनकी 25 से अधिक पुस्तकें हैं। वे अंतिम समय में कैंसर से पीड़ित थे और एक सप्ताह पहले ही कलकत्ता में अपने नाती के विवाह में भाग लेकर लौटे थे। वे भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं किंतु उनके गीत और कविताएं लम्बे समय तक रहेंगीं।

हरीश भदानी का गीत
रोटी नाम सत है।
रोटी नाम सत है
खाये से मुगत है

ऐरावत पर इंदर बैठे
बांट रहे टोपियां
झोलिया फैलाये लोग
मूग रहे सोटियां
वायदों की चूसणी से
छाले पड़े जीभ पर
रसोई में लाक्लाव भैरवी बजत है
रोटी नाम सत है
खाये से मुगत है

बोले खाली पेट की
करोड़ क्रोड़. कूड़ियां
खाकी टोपी वाले भूपे
भरे हैं बन्दूकियां
पाखंड के राज को
स्वाहा स्वाहा होम दे
राज के विधाता सुण
तेरे ही निमत्त है
रोटी नाम सत है
खाये से मुगत है

बाजरे के पिंड और
दाल की वैतरणी
थाली में परोस ले
हथेली में परोस ले
दाताजी के हाथ
मरोड़ के परोस ले
भूख के धरमराज
ये ही तेरा व्रत है
रोटी नाम सत है
खाये से मुगत है

बुधवार, ९ सितम्बर २००९

व्यंग्य राष्ट्र ऋषियों को मारने वाली सरकार

व्यंग्य
राष्ट्र ऋषियों को मारने वाली सरकार
वीरेन्द्र जैन
हमारे प्रदेश में जब से राम राज्य आया है तब से सब कुछ पौराणिक काल में चल रहा है। राम पथ गमन की खोज करने में प्रदेश के इतने करोड़ रूपये फूंके जाने वाले हैं कि मायावती के हाथी तक चुल्लू भर पानी में डूब कर मर जायें। ऐसा लगता है कि कुछ ही दिनों में मंत्री तक नोटों की जगह स्वर्णमुद्राओं में रिश्वत मांगने लगेंगे। संज्ञाओं का यदि इसी तरह पौराणिकीकरण होता रहा तो मंत्री भी आमात्य के नाम से पुकारे जायेंगे।
मन में विचारों की यह खेप शिक्षक दिवस के दिन मास्टरों पर पड़े डंडों के बाद लगातार आ रही है। महाभारत की कथा में एक भीष्म थे जो पितामह के नाम से इतना प्रसिद्ध थे कि संभवत: उनकी वैध अवैध पत्नियां तक पितामह ही कह कर पुकारती रही होंगीं। वे इतने उत्तरदायी किस्म के जीव थे कि जिज्ञासु किस्म के हर एक बच्चे को उत्तर देना जरूरी मानते थे जिसका फायदा उठा कर अर्जुन ने उनसे उनके मरने का तरीका पूछ लिया था। प्रदेश में जैसे भूतपूर्व राजा महाराजाओं के परिवारों में बुआ भतीजा भले ही अलग अलग पार्टियों में हों पर एक दूसरे के खिलाफ चुनाव नहीं लड़ते इसी तरह भीष्म भी शिखंडी के आगे तीर नहीं चलाते थे, जिस राज को बता कर वे युद्ध के मैदान में खेत रहे थे। शिखंडी के पीछे से होकर उन्हें पीठ पर इतने तीर मारे गये थे कि उन तीरों की शैया तैयार हो गयी थी तब भी वे जीवित थे और उनका सिर लटक रहा था। जब उस लटकते हुये सिर के नीचे कौरवों ने तकिये लगाने की कोशिश की तो उन्होंने उन्हें मना कर दिया और अर्जुन से कहा कि उन्हें वीरों वाला तकिया लगा दे। तब अर्जुन ने उन्हें तीरों का ही तकिया लगा दिया। जब मास्टर भी गुरूजी और शिक्षक हो जाते हें तो वे भी अपनी जाति के पौराणिक युग में चले जाते हैं तथा अपना सम्मान कराने के लिए वेतनवृद्धि नहीं मांगते अपितु उसी बेंत प्रहार की मांग करते हैं जिसे उनके पूर्वज अपने छात्रों के लिए प्रयोग में लाते थे- हे पार्थ हमारा सम्मान उन्हीं बेंतों से करो।
प्रदेश सरकार की शिक्षा आमात्य को लगा होगा कि शिक्षक और गुरूजी होकर भी अगर वे पौराणिक काल में नहीं पहुँचते तब उन्होंने उन्हें और पीछे ले जाने के लिए राष्ट्रऋषि घोषित कर दिया। अब वे कह सकती हैं कि ऋषि होते हुये भी नश्वर द्रव्यों के लिए आन्दोलन करते हो छि: छि: छि: इतना पतन। द्रोणचार्य की याद करो जिसकी पत्नी पानी में आटा घोल अपने बच्चे को दूध का भ्रम देकर पिलाती थी। सरकार जो गुरू दक्षिणा दे उसे लेकर खुश रहो। दुष्यंत कुमार ने कहा ही है-
मुझको ईसा बना दिया तुमने
अब शिकायत भी की नहीं जाती
नामकरण एक संस्कार होता है जिसका बड़ा महत्व होता है। अतीत के गौरव से भर कर लोगों को वर्तमान कठिन समय में बरगलाया जा सकता है। कुपोषित बच्चियों को लाड़ली लक्ष्मी कह कर उनकी माँओं को भटकाया जा सकता है। स्कूल ड्रैस को गणवेष कह देने पर भ्रमित लोग इस बात पर ध्यान नहीं दे पाते कि उसमें घटिया कपड़ा लगा कर कितना कमीशन किनने खाया है। रोडशो को पथ संचालन कह देने और कांधे पर दण्ड रख मुँह ऊपर की ओर कर कदमताल करने वालों को सड़कों के गङ्ढे नजर नहीं आते। बालठाकरे के जय महाराष्ट्र की तर्ज पर जय मध्यप्रदेश का नारा लाया जा रहा है पर यह नहीं बताया जा रहा कि जय किस बात की! विकास में सबसे पीछे होने की या कुपोषण व खराब स्वास्थ सेवाओं में सबसे आगे होने की।
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
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शनिवार, ५ सितम्बर २००९

अहमद फ़राज़ की याद में

अहमद फराज हमारे दिल में बने हुये हैं
वीरेन्द्र जैन

अहमद फराज साहब से मेरी कभी मुलाकात नहीं हुयी किंतु उनके साथ मुहब्बत उनकी शायरी के साथ मुहब्बत होने के कारण हुयी। उनकी शायरी ने मेरे दिल में पहले जगह बना ली और बहुत बाद में पता चला कि बेपनाह मनपसंद शायरी का शायर कौन है। मैंने किसी मुशायरे की रिपोर्ट पढी थी जिसमें उदाहरण बतौर हर एक शायर की चार छह पंक्तियाँ दी गयी थीं। उन पंक्तियों में जो दिल को असीमित आनंद दे गयीं वे थीं-
सुना है लोग उसे आह भर के देखते हैं
सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं
सुना है बोले तो बातों से फूल झरते हैं
ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं
जैसा कि ऐसे अवसरों पर आम तौर पर किया करता रहा था मैं टेलीफोन की ओर दौड़ा जिससे कि अपने निकट के कविताप्रेमी दोस्तों को सुना सकूं। इस खुशी खुशी में मैं शायर का नाम याद रखना ही भूल गया और बात भी आयी गयी हो गयी। पर पंक्तियाँ दिल में खुब गयीं थीं जिन्हें सुनाने के लिए मैं मौके की तलाश में रहता था तथा कभी कभी तो बेमौके भी उन्हें सुनाने की भूल कर बैठता था।
असल में यह बात मुझे बहुत बाद में पता चली कि उक्त शेर पाकिस्तान के मशहूर शायर अहमद फराज की गजल के थे और यह भूल केवल मुझ से ही नहीं हुयी अपितु इस पूरी गजल पर मोहित होने वाले दुनिया में लाखों लोग इसी भूल के शिकार हुये हैं जो गजल में इतने खो गये कि उन्होंने शायर की खोज खबर ही नहीं ली। मुझे उसी समय कृष्ण बिहारी नूर का वह शेर याद आ गया जो केवल नूर साहब ही नहीं सारे अच्छे शायरों के दर्द को भी बयाँ करता है-
मैं तो गजल सुना के अकेला खड़ा रहा
सब अपने अपने चाहने वालों में खो गये
इसके बाद जब मैंने अहमद फराज को खोज खोज कर पढना प्रारंभ किया तब वे दिल मे गहरे उतरने लगे। इस मुहब्बत में इस जानकारी ने और भी इजाफा किया जब पता चला कि वे इकबाल, फैजअहमद फैज और अली सरदार जाफरी जैसे प्रगतिशील शायरों के फैन होने के बाद लेखन के क्षेत्र में उतरे थे तथा फैज और अली सरदार जाफरी ही शायरी में उनके मॉडल रहे थे। उनके लिए मेरे दिल में सम्मान का भाव तब और भी बढ गया जब यह मालूम हुआ कि वे पाकिस्तान में फौजी हुकूमत के हमेशा खिलाफ रहे व जियाउल हक के दौर में तीन साल तक आत्मनिर्वासन में ब्रिटेन कनाडा व यूरोप के दूसरे देशों में रहे। वे कहा करते थे कि आसपास घट रही दुखद घटनाओं के प्रति यदि मैं मूक र्दशक बना रहूंगा तो मेरी आत्मा कभी मुझे माफ नहीं करेगी। मैं और क्या कर सकता हूँ , सिवाय तानाशाही निजाम को यह बताने के कि उस जनता की निगाह में, जिसके मौलिक अधिकारों को उन्होंने हड़प लिया है, वे कहाँ ठहरते हैं। मैं सिविल नाफरमानी की घोषणा कर रहा हूं और सत्ता को बता देना चाहता हूँ कि मैं उससे जुड़ने व उसके आदेशों को मानने से इंकार कर रहा हूँ। अहमद फराज साहब ने कभी भी अभिव्यक्ति की पाबंदी को नहीं माना और जीवन भर अपने विचार खुल कर व्यक्त किये। उनके रचना कर्म पर नजर रखने वालों के साथ उनकी भी इस बात पर सहमति रही कि उनका सर्वश्रेष्ठ रचनाकर्म निर्वासन के दौर में ही रहा। इस दौर की उनकी एक रचना महाशरा को बहुत महत्वपूर्ण माना गया। भले ही ज्यादा लोग निम्नांकित गजल को उनके नाम से न जानते हों पर इस गजल को पसंद करने वाले उन्हें जानने वालों से कई गुना अधिक हैं-
रंजिश ही सही दिल को दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ
यह शेर उनकी निर्वासन के दौर में लिखी वतन को याद करने वाली गजलों में से एक है।
गुलामअली ने उनकी बहुत सारी गजलों को गाया है या दूसरे शब्दों में कहें कि उनके चुनाव के सबसे पसंदीदा शायरों में से एक हैं। उनकी एक गजल में वे बहुत गहरे उतरे हैं वह है-
ये आलम शौक का देखा न जाये
वो बुत हैं या खुदा देखा न जाये
कम लोगों को पता है कि ये शेर भी अहमद फराज का ही है जिसे लाखों प्रेमपत्रों में लाखों प्रेमियों ने बार बार लिखा होगा-
अब के बिछुड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुये फूल किताबों में मिलें
ढूंढ उजड़े हुये लोगों में बफा के मोती
ये खजाने तुझे मुमकिन है खराबों में मिलें
इस गजल का पहला शेर तो हजारों ट्रकों के पीछे लिखा हुआ भी मिलता है जो उस स्थान पर एक अलग ही अर्थ देता है।

अहमद फराज साहब की शिक्षा दीक्षा पेशावर यूनीवर्सिटी में हुयी जहाँ उन्होंने उर्दू और फारसी की पढाई की। वे जन्म से पश्तो बोलने वाले पश्तूनी थे पर उनकी रचनाओं की विशेषता है सरल हिन्दुस्तानी भाषा और आम जनजीवन से उठाये बिम्बों द्वारा अपनी बात कहना। इसी कारण से वे आम आदमी के दिल में सीधे उतर जाते हैं। उदाहरण देखें-
आशिकी बेदिली से मुश्किल है
फिर मुहब्बत उसी से मुश्किल है
इशक आगाज ही से मुश्किल है
सब्र करना अभी से मुश्किल है
14जनवरी 1931 को नौशेरा पाकिस्तान में जन्मे शैयद अहमद शाह को शायरी और उर्दू के प्रेम ने अहमद फराज बना दिया। वे रेडियो पाकिस्तान में स्क्रिप्ट रायटर भी रहे और पाक अकेदमी आफ लैटर्स के डायरेक्टर जनरल तथा बाद में चेयरमैन भी रहे । उन्होंने कुछ समय पेशावर यूनीवर्सिटी में प्रोफेसरी भी की। उनकी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं।

पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस पर वे सत्ताधीशों और अवाम दोनों को ही संबोधित करते हुये कहते हैं-
अब किसका जश्न मनाते हो, उस देस का जो तकसीम हुआ
अब किसके गीत सुनाते हो उस तनमन का जो नीम हुआ
उस परचम का जिसकी हुरमत बाजारों में नीलाम हुयी
उस मिट्टी का जिसकी हुरमत मंसूब उदू के नाम हुयी
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क्यों नंगे बदन की बात करो क्या रक्खा है इस किस्से में

उनकी वह प्रिय गजल जब भी याद आ जाती है तो गुनगुनाने का मन करने लगता है। गजल इस प्रकार है-
सुना है लोग उसे ऑंख भर के देखते हैं
सो उसके शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं
सुना है रब्त है उसको खराब हालों से
सो अपने आप को बरबाद करके देखते हैं
सुना है दर्द की गाहक है चश्मेनम उसकी
सो हम भी उसकी गली से गुजर के देखते हैं
सुना है उसको भी है शेरो शायरी से शगफ
सो हम भी मौजजे अपने हुनर के देखते हैं
सुना है बोले तो बातों से फूल झरते हें
ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं
सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है
सितारे बामे फलक से उतर के देखते हैं
सुना है हश्र हैं उसकी गजाल सी ऑंखें
सुना है उसको हिरन दशत भर के देखते हैं
सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात को जुगुनू ठहर के देखते हैं
सुना है रात से बढ कर हें काकुलें उसकी
सुना है शाम को साये गुजर के देखते हैं
सुना है उसके लवों से गुलाब जलते हैं
सो हम बहार पै इल्जाम धर के देखते हैं
सुना है चश्म तसव्वुर से दश्ते इमकां में
पलंग जावे उसी की कमर को देखते हैं
सुना है उसके बदन की तराश ऐसी है
कि फूल अपनी गवायें कतर के देखते हैं
बस इक निगाह से लूटे है काफिला दिल का
सो राहरांवे तमन्ना भी डर के देखते हैं
सुना है उसके शबिस्तां से मुतासिल है बहिश्त
मकीं उधर के भी जलवे इधर के देखते हैं
किसे नसीब कि बेपैरहन उसे देखे
कभी कभी दरो दीवार घर के देखते हैं
कहानियाँ ही सही सब मुबालगे ही सही
अगर वो ख्वाब है ताबीर कर के देखते हैं
अब उसके शहर में ठहरें कि कूच कर जायें
फराज आओ सितारे सफर के देखते हैं