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शनिवार, 26 जुलाई 2008

पूंजीवादी दलालों का अनैतिक करार

मुझसे कहा गया कि संसद
देश की धड़कन को
प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण है
जनता को
जनता के विचारों का
नैतिक समर्पण है
लेकिन क्या यह सच है?
या यह सच है कि
अपने यहां संसद -
तेली की वह घानी है
जिसमें आधा तेल है
और आधा पानी है
और यदि यह सच नहीं है
तो यहाँ एक ईमानदार आदमी को
अपनी ईमानदारी का मलाल क्यों है?
जिसने सत्य कह दिया है
उसका बुरा हाल क्यों है?
धूमिल


22 जुलाई हिन्दोस्तानी जम्हूरियत की तवारिख में स्याह दिवस के रूप में हमेंशा-हमेंशा के लिये दर्ज रहेंगा। पार्टीयो द्वारा जारी व्हीप के आधार पर सरकार साफ तौर पर बहुमत से पिछड़ती दिख रही थी लेकिन विश्वास मत से पूर्व सांसदो की बाकायदा बोलिया लगाई गयी नेताओ को खुलेआम मंत्री पद व अन्य प्रलोभन दिये गये नतीजतन वामपंथी दलों को छोड़ लगभग सभी दलों के सांसद सरेआम अपनी-अपनी पार्टीयो के व्हीप का उल्लंघन करते पाये गये व सरकार विश्वास मत जितने में सफल रहीं। बहरहाल विश्वास मत जितते ही बुश का मन व मन का चिदंबरम अमीरी-अमेंरीकी 'बधुआ मजदूरी' के अपने पुश्तेनी कारोबार में तुरत-फुरत रम गया। उधर सरकार बचते ही संवेदी सूचकांक में भारी उछाल लाकर बाजार व व्यापार जगत ने भी अपनी खुशी का इजहार किया। बैंक आफ सौराष्ट्र का स्टेट बैंक आफ इंडिया में मर्जर कर मन की तिकड़ी अर्थात मनमोहन-मौंटेक-चिदंबरम ने लेफ्ट के दबाव के चलते चार बरसो से लटके पडे़ विवादास्पद आर्थिक सुधारो को तेजी से लागू करने का आगाज भी कर दिया है, अब आगे बारी है बीमा क्षेत्र में एफ डी आई निवेश की सीमा 26 ये 49 प्रतिशत बढाने की, पैंशन निधी को शेयर बाजार में लगाने की इत्यादि इत्यादि... नि:संदेह इन कदमों का अंजाम हमारी संपुर्ण आर्थिक गुलामी का आगाज होंगा। परमाणु करार पर तो पहले ही आगे बढा जा चुका हैं अब संसद में विचाराधीन पडे बैंक, बीमा, बीएसएनएल, पैंशन, कर्मचारी निधी इत्यादि आर्थिक सुधारों संबंधी विवादास्पद विधेयको को हर सूरतेहाल में पास करवाया जाना सरकार की प्राथमिकता होंगी। उधर सांसदो की खरीद फरोख्त का हल्ला मचा रही प्रमुख विपक्षी दल भाजपा भी आर्थिक सुधार के मुद्दे पर संसद में सरकार के समर्थन का संकेत दे रही हैं। इस सिलसिले में फिक्की व सी आई आई के नुमांईदे आने वाले दिनों में भाजपा नेताओ से मिलने भी वाले है। खैर ये साफ हो चुका है कि भाजपा की कांग्रेस के साथ पहले ही फिक्सिंग हो चुकी थी 22 जुलाई का तमाशा तो केवल पूंजीवादी दलालों का अपने अनैतिक करार की गोपनीयता बनाये रखने के लिये था।

2 टिप्‍पणियां:

परमजीत बाली ने कहा…

ho sakataa hai aap ki baat sahi ho.

Pradeep Kant ने कहा…

Sahi baat yahi hai ki vishvaas mat to ek tamasha hi hokar rah gaya.