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रविवार, 20 दिसंबर 2009

'साहित्यिक बाजारवाद' की जय हो!

हिन्दी के एक अग्रणी अराष्ट्रीय-अवामपंथी आलोचक 'साहित्यिक बाजार-युग' के प्रारंभ से अति-उत्साहित हैं। इतिहास के बाद न जाने किस-किस का अंत करवा चुके इन महानुभव की खुशी के आगे हिन्दोस्ता में नयी आर्थिक नितीयों का आगाज करने वाले माननीय मनमोहन सिंह जी व उनके मळंलीबाज चिदंबरम, मौंटेक की खुशी भी फिकी पड़ती नजर आती हैं। अब हो भी क्यो न हर क्षेत्र का बाज़ारीकरण हो गया लेकिन ये साहित्य वाले थे कि कुछ समझने को ही तैयार नहीं थे जब देखो तब साम्राज्यवाद मुर्दाबाद - पूंजीवाद मुर्दाबाद की रट लगाये रखते थे। अरे साहित्य सृजन हाय-हाय के बगैर भी तो हो सकता है, लिखने के लिए चिर-विरोध, विक्षुब्ध सतत, नित क्रांति-क्रांति की अनिवार्यता भला क्यो? लेखक को मानवीय मूल्यों, अन्याय, समाज में फैली असमानताओं के विरोध में लिखने की आखिर जरूरत क्या है, इन लेखकों ने वैश्वीक बाजार में हमारी बड़ी इकन्नी करवायी है, अरे ये शाईनिंग इंडिया या विजन 2020 पर भी तो कलम-कीबोर्ड़ तोड़ सकते है। इलेक्ट्रानिक मीडिया तो जन्मजात बाजारू था लेकिन बाजारवाद ने धीरे-धीरे प्रिंट मीडिया को भी अपना कर ही लिया। ये न समझो की पत्रकारों ने अपने संस्कार झुटला दिये हो, लेकिन ये संतोष की बात है कि इनकी आवाज़ पर कम-अस-कम लगाम तो लगा कर रखी जा सकी है। पर हाय रे ये लेखक गीता के लिखे को भी झुटलाने पर तुले रहे और परिवर्तन के नियम का विरोध करने तक से बाज़ नहीं आये। नौकरी करे बाजारूओं की ओर लेखनी चलाये उन्हीं के खिलाफ, अरे नामुरादो तुमने जिस थाली में खाया उसी में छेद किया। ये गरीब-शोषित-अन्याय के शिकार निरीह लोग तुम्हारा पेट थोडे ही भरते है, रोजी के लिये तो तुम्हें आखिरकार बाजार के ही पास आना पडता हैं। ब्लाग-आरकुट-फेसबुक हर कही तुम हिन्दी के साम्राज्यविरोधी साहित्यकारों-लेखको का साम्राज्य फैला हुआ है। अरे ये तो हद ही हो गयी तुम लोगो ने बाजार प्रदत्त तकनीकी को भस्मासुर बनवा डाला। सही ही है हर सिक्के के दो पहलू होते है, अब आप ही देखिये औपनिवेशिक ताकतों ने दुनियाभर के संसाधनों व मूल्कों के बटवारे के लिये जिन हथियारों को बनाया उन्हीं हथियारों का उपनिवेश-विरोधी ताकतो ने उपनिवेशवादियों के खिलाफ जमकर इस्तेमाल किया।

हिन्दास्तान की भूखी-गरीब जनता के लिये कलम तोडने वाले भी उनके समान भूखे-गरीब ही होंगे। अब सरकार या साहित्य अकादमिया दिखावे के लिये ही सही भूखे-नंगो के इन हिमायतीयों का खर्चा भला क्यों कर उठाये, कितनी ही कम राशी के क्यो न हो टुच्चे पुरस्कार भला क्यो बाटे? जब सबकुछ बाजार के हवाले किया जा चुका हैं ऐसे में सरकार साहित्य अकादमियों के लिये दाता क्यों बनी रहें? अब इन अकादमियों की जिम्मेंदारी सरकार के कंधो से हटाकर सीधे बाजार के हवाले कर दिये जाने का वक्त आ गया है। टीवी के टैंलेन्ट हंट या क्रिकेट-फुटबाल प्रतियोगिताओं की ही तरह साहित्य के पुरस्कार भी प्रायोज्य किये जाने चाहिये। इनका चयन भी सीधे जनता द्वारा एस.एम.एस. के ट्रांसपरेन्ट सिस्टम से होना चाहिये, फिल्म फेयर अवार्डो की तरह साहित्य के क्षेत्र में भी बडे-बडे आयोजन होने चाहिये, जिसमें इंडिया के गणमान्य नागरिकों का गेट-टुगेदर किया जा सके।

बाजार हिन्दी में खतरनाक मिथ की तरह देखा जाता है? खतरनाक मिथ मानने-मनवाने तक तो ठीक था पर हद तो ये है कि लेखक इसे खतरनाक वास्तविकता सिद्ध करने पर तुले पडे है। घोर कलिजुग है भाई लोगो को सच बताने की क्या जरूरत है? खुदा-न-खास्ता हिन्दोस्तान की भूखी-गरीब जनता इनके बहकावे में आ गयी तो क्या होंगा? कही यह इंडियावालों के शायनिंग ड्रीम को चकनाचुर करके न रख दे। ये सब बाते इन बुतशिकनो को भला कौन समझाये। लेकिन अब हमारे सुसंस्कृत संस्कृति मंत्रालय प्रभारी सिंग इज किंग के सानिध्य में साहित्य अकादमी के खैरख्वाहों ने इनको निपटाने के पुरजोर इंतजामात किये हैं। अब ऐसा तो नहीं है कि सभी लेखक एक जैसे होते है, कई नामवंत नमकहलाल भी है। अनेकों ऐसे भी है जिन्हें पूंजीवाद-साम्राज्यवाद, गरीब और गरीबो से कोई लेना देना नहीं है, सिर्फ अड्डेबाजी की जगह व विषय की तलाश उन्हें जनवादी-प्रगतिशीलों के साथ जाने को मजबुर करती है। अब साहित्य के बाजारीकरण की पहल से ये उम्मीद जगी है कि इन बीच का रास्ता अख्तियार किये लेखकों को दक्षिण में खिचा जा सकेंगा व बचे-खुचे अस्सल वामपंथी जनवादी-प्रगतिशीलों को आसानी से चुन-चुनकार निपटाया जा सकेंगा। धन्य हों अग्रेंजो का क्या गजब की पालिसी सिखा गये हमें। सैमसंग ने राष्ट्रकवी टैगोर के नाम से साहित्यकारों के लिये पुरस्कार प्रायोजित करने की जो घोषणा की है, बाजार के लिये बहुत अच्छा संकेत है। हिंदी के पूंजीरहित बाजार में पूंजी निवेश की भारी संभावने जगी हैं, सैमसंग जैसी मल्टीनेशनल कंपनी का इस क्षेत्र में प्रवेश एक नयी सदी का आगाज है। मजलूमों की बाते करते लेखक व उनके प्रेमचंदी संघो को अब इतिहास के कूडेदान में फेंक दिया जायेगा। इलेक्ट्रानिक-प्रिंट मिडिया की भांती अब साहित्य में भी 'काम दे - दाम ले' की संस्कृति का ही बोलबोला होंगा। 'साहित्यिक बाजारवाद' की जय हो!

कुछ बुद्घिजीवीछाप लोग सैमसंग द्वारा की गयी जालसाजीयों की खबरे बाजार में परोस रहे है। जालसाजीया बाजारवाद का एक अहम हिस्सा है, इसके बगैर भला बाजारवाद चल सकता हैं क्या? वामपंथी जनवादी-प्रगतिशील और उनके लेखक संगठन भी साहित्य में पूंजी के इस घालमेंल का कड़ा विरोध कर रहें है। वैसे उन्हें इस मुद्दे पर बोलने का कोई हक नहीं है, अस्सल जनवादी-प्रगतिशील साहित्यकारो-लेखको को साहित्य के पुरस्कार दिये ही नहीं जाते है या दिये जाते भी है तो अधिकांश इन्हें लेने से साफ इंकार कर देते है। फ्री लंच-डीनर-दारू के लोभ से परे जलेस-प्रलेस-जसम के ज्ञानेंद्रपति, लीलाधर जगूड़ी, राजेश जोशी, अरुण कमल, विरेन डंगवाल, मंगलेश डबराल और इनके जैसे अनेकों मनसा-वाचा-कर्मणा नई आर्थिक व्यवस्था और नव-साम्राज्यवाद के सक्रिय विरोधीयों को साहित्य अकादमी में बैठे मठाधीशों ने किनारें करके रखा है। लेकिन विडंबना देखिये फिर भी ये हिन्दी के नवीन बिंदास पाठक-पाठिकाओं के हीरों है।

2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

वैसे मस्त आईटम हो आप लोग भी। आपसे सुर में सुर लगा कर भौके कोई तो कोई शिकायत नहीं वरना तो दुनिया में रखा क्या है? :)

Suman ने कहा…

nice