जलेस की पत्रिका नया-पथ पढने के लिये क्लिक करे!

शुक्रवार, 12 सितंबर 2008

परमाणु करार से नहीं होगा बिजली संकट का समाधान

Sep 06, 02:04 am
देवघर। परमाणु करार देश के बहुसंख्यक लोगों के हित में नहीं है। उससे देश को नुकसान उठाना पड़ेगा। इस संधि के बाद देश में परमाणु बिजली उत्पादन में वृद्धि होने व देश की बिजली समस्या का समाधान होने की बात कहना मिथ्या है। इस संधि के 20 वर्षो के बाद बिजली उत्पादन में मात्र 6 फीसदी वृद्धि होगी, जो देश भर के लिए अपर्याप्त साबित होगी। ये बातें शुक्रवार को इस विषय पर आयोजित जनवादी लेखक संघ की देवघर जिला इकाई की बैठक में वक्ताओं ने कही। उसकी अध्यक्षता अब्दुरशीद रहमानी ने की। उसका संचालन सुधीर रंजन ने किया। उसमें वक्ताओं ने कहा कि वास्तविकता यह है कि इस संधि के बाद भारत अमेरिका की साम्राज्यवादी नीति के चंगुल में फंस जायेगा। अमेरिका के पुराने व बेकार पड़े परमाणु सयंत्र भारत में बेची जा सकेगी और भारत परमाणु परीक्षण निषेध जैसी वर्जनाओं के दायरे में आ जायेगा। वक्ताओं ने यह भी कहा कि भारत को इस वक्त बिहार में आयी बाढ़ पीड़ितों व क्षेत्रों के बचाव पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। उन्होंने परमाणु संधि को देश हित के खिलाफ बताने व केंद्र से समर्थन वापस लेने के सीपीएम के फैसले को भी सही बताया। उक्त विचार व्यक्त करनेवालों में धनंजय प्रसाद, श्री रहमानी, श्री रंजन, फाल्गुनी मरीक, राजेन्द्र, लखन यादव, डी भैया, उमेश कुमार, निरंजन कुमार, मो. तौकिर, बहादुर राउत, प्रेमशीला गुप्ता, नूरजहां बेगम, अतिकुर रहमान आदि शामिल थे।

(in.jagran.yahoo.com से साभार)

2 टिप्‍पणियां:

Umesh ने कहा…

प्रश्न न.1) परमाणु सन्धि के अभाव मे भारत अपनी उर्जा जरुरतो को कैसे पुरा करे ?

प्रश्न न.2) एक तरफ वामपंथी अमरिका का विरोध करते है तो दुसरी तरफ ब्रिन्दा करांत जैसे वामपंथी नेता खुलकर अमरिकी हित की बात करती है। इस दोहरे चरित्र की वजह से वामपंथी अपनी विश्वसनीयता खो रहे हैं।

प्रश्न न.3) भारत परमाणु अनुसन्धान के क्षेत्र मे क्यो निरंतर पिछडता जा रहा था। परमाणु आपुर्तिकर्ताओ द्वारा प्रतिबन्ध हटाने से हमे क्या लाभ हो सकता है?

प्रश्न न.4)भारत अपने लिए मोबाईल फोन तक नही बना पा रहा है, क्या यह भारत के तकनीकी क्षेत्र मे अति पिछडेपन की निसानी नही है? कौन है जिम्मेवार ईस स्थेती के न्लिए।

प्रश्न न.5) वही भारतीय विदेशी कम्पनी के लिए अच्छा काम करता है, लेकिन भारत मे वह उतनी काब्लियत एवम प्रडक्टीविटी नही दिखा पाता। वामपंथीयो द्वारा थोपे गए श्रमिक संरक्षण कानुन इस स्थिती के लिए किस हद तक जिम्मेवार है?

Ek ziddi dhun ने कहा…

Kabeera bhai, aap likha karo ki America hamen adopt kar le, to desh kee tarakkee ho jaayegi. Tabhi ye log Khush Honge...