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रविवार, 30 मई 2010

माओवादी उग्रवादीयों को प्रश्रय दे रही है रेलमंत्री

ममता बनर्जी रेलमंत्री के रूप में अपनी जिम्मेदारियों का ईमानदारी से निर्वाह करने के स्थान पर दिल्ली की रेलगाडी के सहारें बंगाल विधानसभा की वेतरणी पार करने का ख्वाब देखते हाथ पर हाथ धरे बैठी हुवी है। उल्टा चोर कोतवाल को ड़ाटे मुहावरे को चरितार्थ करते हुवे जिम्मेदारीयों से पल्ला झाड़ अपनी विफलताओं का दोष विराधियों पर मढ़ना ऊँटपटांग झुठी बयानबाजी के लिये कुख्यात रेलमंत्री की पुरानी आदत हैं, उधर गठबंधन धर्म के निर्वाह के नाम पर संप्रग-२ सरकार अपने मंत्रियों की विफलताओं को नजरअंदाज करने के लिये मजबुर है। अभी मई के पहले पखवाड़े दिल्ली रेलवे स्टेशन भगदड़ में हुई मौतो के लिये कोई ओर नहीं मिला तो रेलमंत्री ने लोगो को ही जिम्मेदार ठहरा दिया, मई की शुरूआत में मुंबई मोटरमेंन हडताल के मामले में संसद में उपस्थित हो वक्तव्य देने के स्थान पर हड़ताल को माकपा की साजिश बताकर कलकत्ता में ही प्रेस कांफ्रेंस करती रही। उधर रेलमंत्री की अनुपस्थिती में उनके प्रतिनिधी सुदीप बंदोपाध्याय वेटरन वामपंथी नेता वासुदेव आचार्य को संसद में गालिया देते सुनाई दिये, इसके बाद तो देश में गालीगलौज का एक सिलसिला ही चल पड़ा। अभी पिछले वर्ष की ही घटना है पी.सी.पी.ए. ने पश्चिमी मिदनापुर के बनस्तला हॉल्ट पर भुवनेश्वर राजधानी एक्सप्रेस का अपहरण कर साढ़े सात घंटे तक रोके रखा था, आनन-फानन में रेलमंत्री ने इस अपहरण का आरोप मार्क्सवादीयों पर मढ़ दिया। ममता की नोटंकी का पटापेक्ष पी.सी.पी.ए. द्वारा अपने नेता छत्रधर महतो की रिहाई की मांग से हुआ, अपहरणकर्ताओं के विरूद्घ ठोस कार्यवाही करने के स्थान पर ममता मिड़ीया में माकपा को पानी पी-पीकर कोसती रही वही पर्दे के पिछे उग्रवादीयों पर अपनी ममता बिखेरकर बातचीत की पेशकश करती नजर आयी, इसपर एफ.आई.आर. में पी.सी.पी.ए. या नक्सलियों का कोई जिक्र तक नहीं किया गया। ज्ञातव्य रहे कि माओवादी-तृणमूल कांग्रेस-एस.यू.सी.आई.-एन.जी.ओ.-बुद्घिजीवीयो द्वारा समर्थित पी.सी.पी.ए. प्रमुख छत्रधर महतो पूर्व में तृणमूल कांग्रेस का सक्रिय नेता रहा है, तथा सिंगुर-नंदीग्राम-लालगढ़ में वाममोर्चे की औद्योगिकीकरण मुहिम विरोधी आंदोलन में तृणमूल कांग्रेस का प्रमुख सहयोगी। झारग्राम रेल हादसे के तुरंत बाद रेलमंत्री ने बगैर एक भी पल गवाये हादसे की पुर्ण जिम्मेदारी राज्य सरकार पर डाल दी। तत्पश्चात माओवादीयो को क्लीन-चीट देते हुवे अपने धुर विरोधीयो मार्क्सवादीयों को ही इस हादसे का आरोपी ठहराया। उधर पी.सी.पी.ए. प्रवक्ता असीत महतो ने ममता की हॉं में हॉं मिलाते हुवे घटना के पिछे माकपा का हाथ होने का दावा करते हुवे कहा कि ''माकपा ममता बनर्जी को राजनीतिक रूप से अलगथलग करना चाहता है इस घटना को इसलिये अंजाम दिया गया ताकी कैंद्र सरकार के दिशानिर्देश से ममता को रेलमंत्री के पद से इस्तीफा देना पडे''। राजधानी अपहरण कांड की ही तरह झारग्राम हादसे में रेलवे द्वारा दायर एफ.आई.आर. में भी पी.सी.पी.ए. का कोई जिक्र नहीं किया गया है। ममता समर्थित बुद्घिजीवी भी इस अवसर को भुनाने में पिछे नहीं रहे तथा अपने बौद्घिक विरोधियो से हिसाब चुकाते नजर आये। यह भी ज्ञात रहे कि तथाकथित माओवादी-नक्सवादीयो नें लोकसभा चुनावो के बाद से अब तक 150 से अधिक माकपा कार्यकर्ताओं-नेताओं-समर्थको को मौत के घाट उतार दिया है। उधर तृणमूल सासंद-मंत्री, एन.जी.ओं. एवं तथाकथित बुद्घिजीवी पी.सी.पी.ए. व सी.पी.आई(माओवादी) के उग्रवादीयों को धन-हथियार व नैतिक समर्थन मुहैया करवाने का काम कर रहे है, तृणमूल सांसद व गायक कबीर सुमन ने तो माओवादीयों के समर्थन में म्यूजिक एलबम तक जारी किया है। अपने क्षुद्र स्वार्थ की पूर्ति के लिये दीदी ने न केवल भारत की जीवनरेखा व उसमें सवारी करने वाली गरीब जनता की जान को दाव पर लगा रखा है वरन् माओवादी उग्रवाद को प्रश्रय देकर विखंडनकारी ताकतो को अपनी जडे मजबुत करने में मदत कर देश की अखंडता को भी खतरे में डाल दिया है।

बुधवार, 5 अगस्त 2009

Hiroshima Day

Hiroshima Child

I come and stand at every door
But none can hear my silent tread
I knock and yet remain unseen
For I am dead for I am dead

I'm only seven though I died
In Hiroshima long ago
I'm seven now as I was then
When children die they do not grow

My hair was scorched by swirling flame
My eyes grew dim my eyes grew blind
Death came and turned my bones to dust
And that was scattered by the wind

I need no fruit I need no rice
I need no sweets nor even bread
I ask for nothing for myself
For I am dead for I am dead

All that I need is that for peace
You fight today you fight today
So that the children of this world
Can live and grow and laugh and play

by Nazim Hikmet

शुक्रवार, 2 जनवरी 2009

अलविदा 008

आतंकवाद के खिलाफ राष्ट्रवाद
चेला : आतंकवाद किसे कहते है?
उस्ताद : मुसलमान बम फोड़े तो उसे आतंकवाद कहते हैं।
चेला : राष्ट्रवाद किसे कहते है?
उस्ताद : हिन्दू बम फोड़े तो उसे राष्ट्रवाद कहते हैं।

राष्ट्रवाद के खिलाफ देशभक्ति
चेला :
राष्ट्रवादी कौन होते है?
उस्ताद : प्रतियोगी राष्ट्रो के मुकाबले अपने राष्ट्र विशेष की श्रेष्ठता के दावे को मजबूत करने के खातिर राष्ट्रपिता को गोली मार देश को अनाथ बनाने का पराक्रम दिखाने वाले राष्ट्रवादी होते है।
चेला : ये देशभक्त कौन होते है?
उस्ताद : साम्राज्यवाद-सांप्रदायवाद की शोषण आधारित व्यवस्था को चुनौती पैश कर मातृ अथवा पितृभूमि को गुलामी की जंजीरो से मुक्त कराने के खातिर हसते-हसते फासी का फंदा चूमने वाले – सीने पर गोली खाने वाले देशभक्त होते है।

बस वोही घर चला रहा है
चेला : क्यो उस्ताद कैसे हो?
उस्ताद : अब क्या बताये …
उस्ताद : छोटा भाई शेयर ब्रोकर है …
उस्ताद : एक भतीजा जेट में था, तो दूसरा रिलायंस रिटेल में…
उस्ताद : बडा बेटा इंजिनियरिंग कर रहा है सत्यम में कैंपस प्लेस्ड हुआ है…
चेला : बहुत बुरा हुवा उस्ताद! पर अब घर कौन चला रहा है?
उस्ताद : सबसे छोटा पानवाला है …
उस्ताद : बस वोही घर चला रहा है।

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2008

VS Achuthanandan did'nt said anything wrong

Controversy created over Comrade VS remark is very unfortunate, media desperately misquoted VS for gaining profit over competitors. It is not for first time when just for sake of TRP ‘Times Now’ like media groups create such controversy. It is not VS or Sandeep's relative but Media who must have to apologize for such a shameful act.
The Lady Journalist of 'Times Now' asked VS: How do you respond to Sandeep's father statements that "I don’t want to see any dog coming to my house".
Responding to question V.S.A. told “I have respect for Sandeep, his mother and father. If it had not been Sandeep's residence, not even a dog would have glanced at the house," & "I did not expect such a reception."
Mr.Rajeev, Sandeep's relative, who talk to the media on behalf of Mr. Unnikrishnan made it clear that its the ‘Times Now’ reporter who misquoted V.S.'s words and created an unwanted controversy.

According to wikipedia:
Media raked up another issue in the wake of the November 2008 Mumbai attacks after slain NSG commando Major Sandeep Unnikrishnan's father literally shouted at the Kerala chief minister V S Achuthanandan on Sunday. CM, who had been criticized for his delay in offering condolences to the bereaved family, tried to make up by calling on the victim's family who also hailed from his state. The father hesitated in accepting the head of a state imagining that it could reduce the national significance of the cause for which Sandeep laid down his life and shouted "Get out, get out, dogs" at the CM and his colleague, which was accepted as an emotional outburst of a bereaved father by the Chief Minister. On repeatedly asked by a news reporter why he chose to go there, Achuthanandan replied "If it had not been (Major) Sandeep's house, not even a dog would have gone there". The comment sparked a major controversy and attracted major criticism for the 85 year old chief minister, who later expressed regret for making a statement that could be misunderstood when taken out of context.
(Courtesy: http://en.wikipedia.org/wiki/V._S._Achuthanandan)

Achuthanandan & hostile media
It is disgusting to see the corporate-controlled media has been playing up the remarks made by the Kerala Chief Minister Achuthanandan. Though the mention of 'dog' in his comment by the Kerala CM is regrettable and was likely to be misunderstood ,if read between the lines in the current atmosphere of the terror attack in Mumbai, the media is utterly biased in airing reports against Kerala CM. The media has been deliberately reporting that the Kerala CM had insulted the slain major Unnikrishnan who sacrificed his life for the nation.In the first place, it was slain Major's father who insulted a democratically elected chief minister of a state by refusing to let the CM into his home. After all, the CM went there to offer his condolences to and share the grief with the bereaved family. There was nothing personal between the slain major’s family and the Chief Minister of Kerala. What was the provocation for the slain major's father to insult him?
It is basic etiquette that any visitor offering condolences to a bereaved family is not turned away by the family .There may not be any pleasantries exchanged but certainly the condolences are accepted by the family in manner that befits the occasion . But for reasons best known to the father of the slain major Unnikrishnan, the Chief Minister was not allowed entry in the house by the father . Not content with that, the father behaved in a hysterical manner with shouts and abuses thrown at the visitors which could be seen by all in TV visuals . The ostensible reason given by the bereaved family in Bangalore was the Kerala CM did not attend the funeral of the slain major the previous day.
Is it Hindu culture to drive out a visitor who had gone there to share the grief ,leave alone a CM of a state? How can anyone justify the hysterical behaviour of the father in abusing the CM ? If the CM had not gone there to attend the funeral, was it a big crime that it should provoke the slain major's father to hurl abuses and act in a hysterical manner which was seen by all in TV visuals? Major Unnikrishnan has certainly sacrificed his life for the nation. But that does not mean his father should behave in a manner that is not expected of him who was supposed to have acted as a host to the visiting guests.The media as usual plays double game. When the father insulted the CM, it was reported gleefully as a ‘snub’ to the CM. But when the CM expressed his indignation on the behaviour of the father of the slain major, the media calls it as ‘insult’ for the slain major's family. As a typical case of reading between the lines, the hostile media which has been pandering to the jingoism of the educated middle class picked up the word ‘dog’ and has been inciting middle class hostility towards the CPI(M) in general and the Kerala CM in particular.
The media failed to highlight the insulting behaviour of the father of the slain major, particularly when there was no provocation from the CM except that he did not attend the funeral in Bangalore which was not a big crime by any yardstick. Instead,it has been resorting to 'campaign journalism' of berating the CPI(M) and the Kerala Chief Minister.

R. Maran

गुरुवार, 18 सितंबर 2008

Spy comes to SAHMAT

Now the state is spying on SAHMAT, India's leading secular platform for artists.

New Delhi, Sept. 12: A “spy” sat staring at his polished shoes locked up in the small office of cultural group Sahmat for almost an hour today, after hamhanded snooping blew his cover and gave a telling insight into the working of the Intelligence Bureau.

“I am an FCRA (foreign contribution regulation) official and am here on official duty,” Praveen Sharma (name changed) insisted, fidgeting with his phone.

But Rajendra Prasad, the Sahmat member he had first approached with the introduction and a long list of queries, was not buying this any more. He had called police.

Sahmat, set up in January 1989 after actor, poet and political and street theatre activist Safdar Hashmi was killed performing a play 20km from Delhi, brings together a cross-section of people to defend democracy and freedom of expression.

In white T-shirt and grey pants, the bespectacled Sharma had walked into its office posing as an FCRA official under the home ministry.

“He wanted to know every detail of the organisation, and I gave it to him. I didn’t even ask for his identity card. He initially started with who the members of the organisation were and also details of the kind of work we do. He asked me if Sahmat took foreign funds for their work, and when I said no, he said if I was offered, would I take it? I had no problems answering those questions,” Prasad said.

Then he named two people, who he said were connected with the Maharashtra blasts, and asked me if I knew them. I realised he was asking me if our group had connections with terrorists. That’s what made me suspicious. I asked for his identity card and he just flashed some card at me. I asked him which blasts he was talking about, and he couldn’t even answer that,” the Sahmat member said.

Soon, Sharma had been locked up and the police called.

“It’s the recent blasts in Maharashtra,” Sharma said in answer to this correspondent’s question as he tried to contact his bosses.

So where was his office? Sharma didn’t remember.

When the police arrived, the mystery was solved. “He is with the Intelligence Bureau and it was his mistake that he barged into Sahmat’s office and intimidated them. Sahmat can officially register a case if they want,” the Parliament Street SHO, Vijay Chandel, said before the police took him away.

It is not uncommon for officials of the Intelligence Bureau, the country’s internal spy agency, to make discreet enquiries about organisations. But to go about it as Sharma did provides a clue perhaps to the intelligence failures blamed for blast after blast.

“What’s completely unacceptable is that at the time of the incident, there were two artistes in the room — young women, one from Pakistan and the other a Bangladeshi, who are in the country for an international art workshop. He made such a fuss about their nationalities that they ran away from the spot,” said photographer Ram Rahman.

Courtesy: Commualism Watch
Read more: http://www.pragoti.org/node/2048

सोमवार, 15 सितंबर 2008

दिल्ली के धमाके - मुश्किल वक्त में कुछ ज़रूरी बातें

सांप्रदायिक ताकतों का काम हमेशा बेहद आसान होता है और इनके खिलाफ लडाई उतनी ही मुश्किल होती है। कई बार या कहें अधिकतर समय यह रास्ता बेहद तनहा, बार-बार हार का अहसास कराने वाला और खतरे व अपमान पैदा कराने वाला होता है. हम पाते हैं कि मुश्किल लड़ाई में शामिल कोई प्यारा साथी साम्प्रदायिक बहाव का शिकार हो गया है या फ़िर लोकतंत्र, न्याय, निष्पक्षता जैसे तर्कों का इस्तेमाल करते हुए ही वह घोर फासीवादी बातें करने लगा है.

साम्प्रदायिक ताकतों की असल जीत किसी धमाके में कुछ या बहुत सी जिंदगियां ले लेना नहीं होती, बल्कि यही होती है कि लोग उनके एजेंडे पर सोचना और रिअक्ट करना शुरू कर दें।

दिल्ली के धमाके मुझे भी बेहद दुखी और परेशां कर रहे हैं पर मैं ऐसे मौकों के लिए उत्साह से बयानों में भडास निकालने वाले पत्रकारों, नेताओं और राष्ट्रभक्तों से और भी ज्यादा परेशां होता हूँ। मसलन - आतंकवाद से आर-पार की लड़ाई का वक्त आ गया है, पकिस्तान पर हमला कर देना चाहिए, पोटा-सोटा कुछ हो, चूडियाँ कब तक पहने रहेंगे (और मुसलमानों को सबक सिखाना होगा) जैसी बातें वो काम कर रही होती हैं, जो बम के धमाके भी नहीं कर पाते। या कहें जो धमाका करने वाले लोग चाहते हैं।

ऐसे मौके बीजेपी और पूरे संघ परिवार के लिए टोनिक का काम करते हैं। १९४७ में देश के बंटवारे और हाल के दो दशकों में इसी तरह की राजनीति से देश को छिन्न-भिन्न कर देने की कीमत पर ताकतवर होता गया संघ परिवार ऐसे धमाकों की इंतज़ार ही नहीं करता बल्कि ऐसी स्थितियां पैदा करने के लिए खाद-पानी भी देता है।

देखने में यह बेहद सामान्य और बेहद साफ़ बात है कि कोई भी सिमी-विमी किसी भी संघ-वंघ को और संघ-वंघ,सिमी-विमी को अपने-अपने अस्तित्व के लिए कितना जरूरी मानते हैं। दुर्भाग्य यह है कि सामान्य और साफ़ बातें देख पाना हमेशा ही मुश्किल रहता आया है. यह देखने के लिए मूलगामी नज़र की जरूरत होती है, जो माइंड सेट को तोड़ सके. यह नज़र एक चेतना का हिस्सा होती है, जो इस तरह के धमाकों को किसी धर्म के लोगों से नफरत की शक्ल में नहीं देखने लगती बल्कि यह पड़ताल कर लेती है कि इस साजिश से क्या चीज बन रही है. सांप्रदायिक ताकतों से मूलगामी नजर के साथ लम्बी लड़ाई लड़ते रहे मार्क्सवादी आन्दोलन के ही बहुत से साथी इस चेतना के अभाव में जब-तब अजीबोगरीब बातें करते दिख जाते हैं (हाल में हुसेन के चित्रों को लेकर और असद जैदी की कुछ कविताओं को लेकर भी यह देखा गया). लिब्रेलिज्म की आड़ में तो वैसे भी साम्प्रदायिकता और तमाम तरह का फासीवाद इत्मीनान से पलता रहता है। ऐसे लिबरल गुडी-गुडी बातें करते हुए मजे से डेमोक्रेसी की दुहाई देते रहते हैं और मौका मिलते ही साम्प्रदायिक नफरत उनके पेट से बाहर आ जाती है.

हाँ जरूरी नहीं कि हर कोई एक मूलगामी नज़र पैदा करने की कुव्वत रखता हो, पर अगर उसमें वैल्यूज़ की गहरी जड़ें हैं तो भी वह सांप्रदायिक साजिशों का शिकार होने से बचा रह सकता है. नेहरू ने एक सेकुलर और प्रगतिशील समाज की लडाई लड़ी थी तो प्रगतिशीलता और वैल्यूज़ उनकी बड़ी ताकत थी लेकिन गाँधी अपने पिछडेपन के बावजूद इंसानी वैल्यूज़ में गहरी आस्था के बूते ही साम्प्रदायिकता के खिलाफ इतनी बड़ी लडाई लड़ सके थे. अगर मूलगामी नज़र और वैल्यूज़ दोनों ही न हों, तो फ़िर साम्प्रदायिकता ही क्या, जाति और जेंडर के सवालों पर भी कोई लडाई लड़ना मुमकिन नहीं हो सकता. हम देखें कि हम किस नज़र और किन वैल्यूज़ को लेकर फासीवाद से लड़ना चाहते हैं.

धीरेश सैनी
(पेंटिंग The Wolf at the Door; water colour on paper by Atul Dodiya`सहमत` से साभार)

सोमवार, 25 अगस्त 2008

असहनशीलो की सहनशीलता: सहमत की प्रदर्शनी पर सांस्कृतिक फासीवादी हमला

कतिपय हिन्दू संगठनों द्वारा हुसैन की प्रदर्शनीयों पर किये जा रहे हमलो की श्रंख्ला सांस्कृतिक फासीवाद का निकृष्ठतम उदाहरण है, इस फासीवाद को हिन्दोस्तान में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। हुसैन की प्रदर्शनी पर हमला करना हिन्दोस्तानी तहजीब का हिस्सा नहीं है, यह तो नियोकान छाप दक्षिणपंथी सांप्रदायिक संस्कृति का परिचायक है। जो लोग इस संस्कृति की तरफदारी करना चाहते हो उन्हें उनकी संस्कृति मुबारक, हम तो हमारी संस्कृति पर हो रहे हमले की जोरदार मजम्मत करेंगे।

गौरतलब है कि भारत के पहले कला शिखर सम्मेलन में प्रसिद्ध चित्रकार एमएफ हुसैन के चित्रों का प्रदर्शन नहीं किए जाने के विरोध में सांस्कृतिक संगठन सहमत द्वारा वीपी हाउस के लान में आयोजित हुसैन के चित्रों की प्रदर्शनी के दौरान रविवार 24 अगस्त को तोड़फोड़ की गई।

ये मजेदार बात है कि नयी आर्थिक निती, देशविरोधी परमाणु करार, राजनिती का सांप्रदायिकरण, राजनिती के अराजनितीकरण जैसे समस्त गंभीर मुद्दो पर एक तरफ तो घोर दक्षिणपंथी सांप्रदायिक ताकते व दूसरी तरफ अमेंरिकी-इंडियन के आईने से इसरायली भारत रचने को बेताब फील गुड के पश्चात विजन 2020 का स्वप्न देख रहा भारत का उच्च मध्यवर्ग व उनके एन आर आई रिश्तेदार दोनो ही का रवैया लगभग एक सा है। संक्षेप में कहा जाये तो सांप्रदायिकता नंगई के साथ सांम्राज्यवाद को व सांम्राज्यवाद सांप्रदायिकता को पोषित कर रहा है। अभिव्यक्ति की आजादी वगैहरा-वगैहरा जुमले इलायट वर्ग की रखैल है, जो अपना हित साधने के लिये इसका उपयोग उलट पलट कर किया करता है।

विडंबना देखिये गुजरात प्रोजेक्ट को अंजाम तक पहुचाने वाले असहनशीलता के पुजारी स्वयं की संस्कृति की सहनशीलता की मिसाल देते फिर रहे है। हुसैन के चित्रो का विरोध कर रहे हिन्दू संस्कृति के तथाकथित ठेकेदार खजुराहों, अजंता-एलोरा, कोणार्क की कलाकृतियों के बारे क्या राय रखते है, क्या ये हिन्दू देवी देवताओ का अपमान नहीं है?

जनवादी लेखक संघ इन्दौर सहमत की प्रदर्शनी पर हिन्दू संगठन द्वारा किये आंतकी हमले की भ्रत्सना करता है व दोषियो को गिरफ्तार कर उचित दंड दिये जाने की मांग करता है।

मंगलवार, 5 अगस्त 2008

Kız Çocuğu (The Little Girl)

6 अगस्त 1945 को अमेंरीकी द्वारा हिरोशीमा पर गिराये "Little Boy" परमाणु बम से उपजी मानवीय त्रासदी से व्यथित हो नाज़िम हिकमत ने अपनी कालजयी कृति Kız Çocuğu (The Little Girl) लिखी। जलेस साम्राज्यवादी ताकतो द्वारा विश्व पर थोपे तमाम युद्धो के हताहतो को श्रंद्धाजली देता है।


"Little Boy"

Kiz Cocugu
Kapýlarý çalan benim
Kapýlarý birer birer
Gözünüze görünemem
Göze görünmez ölüler
Hiroþima'da öleli
Oluyor bir on yýl kadar
Yedi yaþýnda bir kýzým
Büyümez ölü çocuklar
Saçlarým tutuþtu önce
Gözlerim yandý kavruldu
Bir avuç kül oluverdim
Külüm havaya savruldu
Çalýyorum kapýnýzý
Teyze, amca, bir imza ver
Çocuklar öldürülmesin
Þeker de yiyebilsinler
Nazým Hikmet


The Little Dead Girl
This little girl is at your door,
At every door, at every door.

And I am she you cannot see,
I am at your door, at every door.
I am at your door, at every door.

And for this child will never be
That love and laughter you have known.

At Hiroshima do you see
My flesh was seared to bone,
My flesh was seared to bone.
My hair was blue aflame,
Hot were my poor eyes, hot my hands.
Now just a trace of ash remains
Where I had played on smiling sands.
Stranger, what can you do for me,
This little ash, this little girl?
This human child like paper burned
Dry ash the cooling wind shall swirl,
Dry ash the cooling wind shall swirl
This little maid unseared by strife.

Oh stranger please do this for me.
Your name for mankind's peace and life,
And peace and life for all like me,
And peace and life for all like me.
Nazim Hikmet

गुरुवार, 3 जुलाई 2008

गंगा-जमुनी संस्कृति पर हमला

साथियो हमारा अमनपसंद प्यारा शहर इंदौर आज चंद सिरफिरे शिद्दतपसंद दहशतगर्दो की गिरफ्त में है जो बेवजह ही बेगुनाह नागरिको के खुन से होली खेल रहे है। आज इंदौर में गुजरात माडल की दस्तक साफ सुनी जा सकती है।

अमरनाथ यात्रा हमारे देश की गंगा-जमुनी संस्कृति का एक बेहतरीन उदाहरण है, लेकिन आर.एस.एस. वाले अपनी हिटलरी संस्कृति देश पर थोपना चाहते है। देशभर में हो रहे हिन्दू-मुस्लिम दंगे इशारा कर रहे है कि आर.एस.एस. गुजरात माडल का एक्सपान्शन दुसरे राज्यो में भी करने में सफल हो रही है।

क्या हिन्दूओ की तरक्की के वास्ते गुजरात ही एकमात्र माडल बचा रह गया है ? अगर देश की जनता भगवा ब्रिगेड के हाथो कठपुतली बन ऐसे ही तमाशे का हिस्सा बनती रही तो चर्चिल की कुख्यात भविष्यवाणी सच होकर रहेगी। महंगाई ने हिन्दू हो या मुसलमान, अगडा हो या पिछडा सभी की कमर तोडे रखी है, उधर सरकार वामपंथीयो व शिर्षस्त वैज्ञानिको के विरोध को दरकिनार कर जयचंद-मीरजाफरो की मदद से परमाणु करार पर आगे बढ रही है, इस भयावह स्थिती में बेवजह हो रहे मजहबी दंगे किसी गहरी सोची-समझी साजिश की ओर इशारा करते है।

बुधवार, 25 जून 2008

कुमार केतकर के बहाने

बाजारवाद के हाथो अपनी इस्मत लुटवाते मीडिया की दुनिया के बचे-खुचे सचाई परस्त आजाद आवाजों को नित नये फासिस्ट हमलो द्वारा कुंद किया जा रहा है। ऐसा नहीं है कि ये हमले सिर्फ साम्राज्यवाद की तरफ से हो रहे हो, सांप्रदायिक-क्षेत्रीय ताकतो ने भी अपनी तरफ से कोई कसर बाकी नहीं छोडी है। सत्ता को जेब में रखे हुए कुछ गिरोहों की मनमर्जी को आतंकवाद की घटना क्यों न माना जाए? पिछले दिनों कुमार केतकर पर जिस तरह के फासिस्ट हमले हुवे है अत्यंत दुखद व शर्मनाक है। इसी विषय पर श्री मनोज कुलकर्णी के विचार प्रस्तुत है।
संपादक

लोकसत्ता, मुंबई से प्रकाशित होने वाला मराठी लोकप्रिय दैनिक है। इसके संपादक है श्री कुमार केतकर। केतकर साहब की भारतीय अखबार जगत में खासी प्रतिष्ठा है। उनकी आवाज को ध्यान से सुना जाता है। पिछले दिनों श्री केतकर के मकान पर कुछ लोगों ने हमला किया। ये लोग किसी शिव संग्राम नाम के संगठन से थे। इनके प्रमुख हैं श्री विनायक मेटे। मेटे जी शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस के हैं। बड़े दम्भ के साथ उन्होंने इस हमले की जिम्मेदारी ली है। उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र सरकार में राकांपा एक नेतृत्वकारी घटक है।


कुमार केतकर का अपराध क्या था? उन्होंने महाराष्ट्र सरकार के एक निर्णय पर अपने अखबार में संपादकीय लिखा था। उक्त संपादकीय में उठाये गये प्रश्नों से श्री विनायक मेटे और उनके गुर्गे आहत हुए। फलत: उन्होंने केतकर साहब के मकान पर तोड़-फोड की।

महाराष्ट्र की देशमुख सरकार ने मुंबई के अरब सागर में छत्रपति शिवाजी की 300 फीट ऊची प्रतिमा लगाने का फैसला किया है। केतकर जी ने इसी मसले पर व्यंग्यपूर्ण भाषा में कुछ असुविधाजनक प्रश्न खड़े किये। उन्होंने जानना चाहा कि क्या महाराष्ट्र में तमाम समस्याऐ हल हो चुकी हैं? क्या किसानों ने आत्महत्याए बंद कर दीं हैं? क्या बेरोजगारी खत्म हो गयी हैं? संपादकीय में शिवाजी को लेकर कोई बात नहीं है। महज यह प्रश्न है कि शिवाजी की मूर्त्ति के जरिए आखिर राज्य सरकार हासिल क्या करना चाहती है?

जनता की गाढ़ी कमाई के लाखों रूपये बड़ी-बड़ी प्रतिमाये लगाकर नष्ट करने के बजाय उसे रचनात्मक कामों में लगाए जाने की जरूरत है। विडम्बना यह है कि मुख्यधारा के राजनीतिक दल एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं, लिहाज उनमें सामाजिक बदलाव लाने की इच्छाशक्ति का अभाव है। चूंकि साधारण जनता राज-काज चलाने की पेचीदगियों को नहीं समझ पाती, वो महापुरूषों के नाम पर रास्ते, पुल या चौराहे देख-देख कर खुश हो जाती है।

हाल ही में जब केंद्र सरकार ने पेट्रौल-रसोई गैस के दाम बढ़ाए, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री और उनके साथियों ने विरोध स्वरूप साइकिल से मंत्रालय जाने का करतब दिखाया। यदि प्रदेश सरकार ये दिखावटी प्रदर्शन करने के बजाय सचमुच की सादगी लाए, भ्रष्टाचार न करे, भ्रष्ट मंत्रियों और अफसरों पर ईमानदारी से सख्त कार्यवाही करे, घोषित योजनाओ को जमीनी स्तर पर लागू करे तो देश-समाज का अधिक भला होगा।

प्रधानमंत्री द्वारा खर्चो में कटौती करने की राष्ट्र के नाम अपील के बाद कुछ प्रभावशाली मंत्रियों ने तुरत-फुरत अपने विदेशी दौरे रद्द किए। क्या ये मंत्री इतने नादान थे कि इन्हें पता ही नहीं था कि महंगाई भयानक तौर पर बढ़ चुकी है? प्रधानमंत्री की अपील से पहले इनमें ऐसी सद्बुद्धि क्यों नहीं जागी? जाहिर है यह कदम दिखावटी और सस्ती लोकप्रियता पाने के हथकण्डे हैं।


हममें से अधिकांश ने अपने गांव, कस्बे, मोहल्ले के नेताओ को पनपते और फलते-फूलते देखा है। हम सब जानते हैं कि देखते ही देखते इनका रहन-सहन, इनकी संपन्नता, इनका वैभव कैसे बढ़ जाता है।

अपराध जगत और राजनीति का जो गठजोड़ हमारे देश में पिछले कुछ वर्षो में बना और बढ़ा है, वो चितंनीय है। इसका मुकाबला वैकल्पिक राजनीतिक आंदोलनों को मजबूत करके ही किया जा सकता है। सादगी पसंद, मेहनती, यथार्थ को जानने, समझने और विश्लेषित करने की वैज्ञानिक समझ और तार्किकता और समस्यायों के मूल में जाकर उन्हें हल करने की राजनीतिक धारा ही इन तमाम प्रश्नों का एकमात्र हल है।

जाहिर है, उसे लाना और स्थापित करना आसान नहीं है। बेतरह की बाधायें है। पर तय कर लेने पर कोई काम मुश्किल नहीं।

अन्यथा कुमार केतकर जैसी आवाजों पर विनायक मेटे हमले करते रहेंगे। कहने को लोकतंत्र रहेगा, चुनी हुई सरकारें होंगी पर विरोध के स्वरों को दबा देने की कुटिलता और चतुराई रहेगी। क्या ये सचमुच का लोकतंत्र है या सत्ता को जेब में रखे हुए कुछ गिरोहों की मनमर्जी?

मनोज कुलकर्णी
(छग व मप्र के पाक्षिक लोकजतन से साभार)

बुधवार, 4 जून 2008

Pakistani bomb disposal squad members inspect the site of a blast at a music shop in Peshawar on 4 June 2008 which killes at least 3 innocent people (Pakistan, AFP)
Pakistani rescue workers remove the body of a victim from the site of a bomb explosion outside the Danish Embassy in Islamabad, Pakistan on Monday, June 2, 2008
(AP Photo/Anjum Naveed)



ये धमाके या कौमी धुन!
पाकिस्तान में आम चुनाव के बाद पहली बार हुई हिंदुस्तान और पाकिस्तान के वजीरे खा जां (विदेश मंत्री) प्रणब मुखर्जी और शाह महमूद कुरैशी की मुलाकात है। पाकिस्तान दौरे में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता मोहम्मद सादिक ने खुलासा किया कि आतंकवाद दोनों देशों के लिए खतरा बना हुआ है। यह बात पाकिस्तानी हुकूमत को उस महकमे के नुमांइदे ने फरमाई है, जिसके वजीर साहब को राह चलते अगवा कर लिया जाता है और बाद में पता चलता है कि जनाब वजीर साहब को तालिबान ने अगवा किया है। इस खबर की हैसियत ऐसी है, जैसे बिहार में स्कूल से वापसी पर किसी बच्चे को अगवा कर लिया और कुछ अर्से बाद फिरौती की खबर आई। जिस मुल्क में वजीर महफूज न हो, वहां के नुमाइंदे दावा करें दोनों मुल्कों के दरमियान अमन की और दहशतगर्दी की मुखालिफत की जबकि दहशतगर्दी की फसलों को सींचने वाले और तैयार पूरी दुनिया में तक्सीम करने वाले ये खुद हैं।


अब तो इस फसल की पैदावार इतनी हो गई है कि संभाले नहीं संभल रही, बल्कि खारदार झाड़ियों की तरह उन्हीं के दामन को चाक कर रही है। कभी लाहौर में धमाके, कभी इस्लामाबाद में, कभी वादी-ए-सबात गूंजती है, तो कभी डेरा इस्माइल खान, कभी रावलपिंडी लरजती है, तो कभी वजीरिस्तान। बेनजीर की रैली के दौरान लर्जा कराची और अगली रैली में कत्ल, कत्ल के वक्त फिर धमाका। धमाके न हुए मानो पाकिस्तान की कौमी धुन हो गई, जो सरहद से लेकर शहरों तक सुनाई देती है। इस खौफनाक आवाज के दरमियान पस्त हो जाती है मौत की चीखें, दम तोड़ देती हैं जख्मियों की आहोकराह। जब यह खौफनाक आवाज खामोश होती है, तो सिलसिला शुरू होता है उन आवाजों का जो आह की शक्ल में छाती पीटते और माथा पीटते करीबी रिश्तेदारों के दिल से होते हुए उनके रूंधे हुए गलों से निकलती है। इसके अलावा बेचारे कुछ कर भी नहीं सकते।


सियासत और दहशतगर्दी के दरमियान फसी मासूम आवाम कभी तानाशाही के जुल्मोसितम से पिसी तो कभी सियासतदानों की बाजीगरी से। ऐसी मजलूम अवाम बेचारी जम्हूरियत का परचम बुलंद करने के बावजूद दहशतगर्दी का तूफान पाकिस्तान की चूलें हिला रहा है। जम्हूरियत की बेखौफ और बुलंद आवाज भी इंसानी बमों की खौफनाक, लर्जाखेज गूंज में दब चुकी है। यह कहना नामुनासिब न होगा कि पाकिस्तान में हर कोई बारूद के ढेर बैठकर आतिशबाजी कर रहा है और पाकिस्तान दुनिया का सबसे बेकाबू मुल्क बन चुका है। पाकिस्तान की अवाम इश्के जम्हूरियत की कीमत चुका रही है, तो सियासतदां परवरिशे दहशतगर्दी की सजा पा रहे है। जिन दहशतगर्दो को फर्जी जिहाद के नाम पर दूध पिलाया था, वह अब उनका खून पी रहे हैं, और इनसे दामन बचाना मुश्किल हो गया है, खामियाजा भुगत रही है अवाम।


लाहौर में एफआईए की सातमंजिला इमारत का हादसा अलामत है इस बात की, कि तालिबान और अलकायदा ने हुकूमत पर दबदबे का नक्कारा बजा दिया है। कुछ अरसे पहले लाहौर में एक ट्रक बम के जरिये पुलिस को पैगाम दे दिया है मुजाहिदीन के खिलाफ अमेरिका के साथ किसी भी कारगुजारी का अंजाम यही होगा। साथ ही तमाम पाकिस्तान में इंसानी बमों की तैनाती से साबित कर दिया है कि आम चुनाव में भले हार गये हों, लेकिन उनके हौसले बुलंद है। अबतक तो फर्जी और गुमराह मुजाहिदीन की कारगुजारियां सरहदी इलाकों तक ही थीं, मगर कराची, पेशावर, इस्लामाबाद और रावलपिंडी के बाद लाहौर को निशाना बनाया जाना एक बड़े खूनी खेल के आगाज की अलामत है। पाकिस्तानी शहरों में इंसानी बमों के खौफ के साथ कबाइली इलाकों में अलकायदा का साया गहरा होता जा रहा है। कबाइली इलाकों में जासूसी कामयाब न होने से सीआईए परेशान है, इसका सबब है कबाइली इलाकों में अलकायदा के बेहतर ताल्लुकात, जबकि सीआईए की कामयाबी का दारोमदार सिर्फ अलकायदा में फूट पर है। अब अमेरिकी एजेंसियां भी इस बात को तसलीम कर रही हैं कि पाकिस्तान सदर मुशर्रफ ने 2006 में कबाइली शिद्दत पसंदों (कट्टरपंथी) से जो समझौता किया था, वही अलकायदा की सेहतमंदी का सबब है। कबाइली इलाकों से पाकिस्तान फौज की वापसी भी शिद्दतपसंदों को ताकत बख्शने का सबब बनी, जिसकी बिना पर नये ठिकाने और मुजाहिदों की नई भर्ती का आगाज हुआ और इन तमाम खुराफात की वजह है, सदर मुशर्रफ की हिकमतेअमली।


पाकिस्तान की हुकूमत और ओहदे के लालची सियासतदानों और मजहब के सौदागरों से अहम सवाल यह है कि सियासत के बाजीगरों और जंगजूओ की लड़ाई का खामियाजा अवाम क्यों चुकाए? हालिया धमाकों में कहीं फौजी मरे तो कहीं सियासतदां और कहीं पुलिस। इन्हीं के साथ मासूम शहरियों की लाशों के ढेर भी लगे। 22 फरवरी को वादी-ए-सबात में एक बारात जिसमें दुल्हन की डोली साथ थी, ऐसा धमाका हुआ जिसने मासूम दुल्हन के साथ 16 अफराह को मौत की नींद सुला दिया। मेहंदी की लाली पर खुन का रंग गालिब आ गया। इसी तरह इस्लामाबाद की लाल मस्जिद एक्शन के बाद से अब तक तकरीबन एक हजार से ज्यादा अफराह हलाक हो चुके हैं और उनकी हलाकत से न जाने कितनी बेवाओ और यतीमों की ताअदाह में इजाफा हुआ है। इन तमाम कारगुजारियों में वही दहशतगर्द (मुजाहिद) हैं जिन्हें कभी कश्मीर और अफगानिस्तान के लिये तर्बियत दी गई थी। लिहाजा पाकिस्तान को तस्लीम करना पड़ेगा कि 1980 के बाद जिन मुजाहिदीन को उसने सरहदी इलाकों में खेमाजन होने की दावत दी थी, अब मौत का सौदा बन गई है। उस वक्त सोवियत यूनियन ने अफगानिस्तान में हथियार इसलिए डाले थे कि वह जिहादियों के लिए पाकिस्तान से सप्लाई लाईन बंद नहीं कर सका था। बाद में जब तालिबान का गलबा हुआ तो पाकिस्तान के सरहदी इलाकों में फर्जी और मस्नूई मदरसों में अफगान नौजवानों की भीड़ लग गई। 11 सितंबर के बाद से मुशर्रफ की अमेरिकां नवाजी के सबब एक हजार पाकिस्तानी फौजी दहशतगर्दी की आग में खाक हो गये। कल तक जो जंगजू दोस्त थे 11 सितंबर के बाद बागी हो गये। वादी-ए-सबात में शिद्दतपसंद मजहबी ग्रुप भले ही आम चुनाव हार गये हों, मगर इलाके में दहशतगर्दी का बोलबाला है, इस बात का सुबूत है एक पुलिस अफसर के जनाजे में बम धमाके से 40 अफराह की मौत। कुल मिलाकर गलतियां सियासतदानों ने की है और कीमत अवाम चुका रही है। अब गौरतलब यह है कि अवाम की तामीर की हुई जम्हूरियत की यह इमारत बुनियादी तौर पर कमजोर हैं या मजबूत। चुने गये लीडरान हमदर्द है या खुदगर्ज।

पाशा मियां कादरी

मई 2008





हमसाया मूल्क याने पाकिस्तान की बदलती कौमी धुन और शिद्दतपसंदो के हाथो तरक्कीपसंदो की शिकस्त हिन्दोस्ता की फिजा के लिये कुछ शुभ संकेत नहीं है। तारीख गवाह है कि जो सियासतदा कमबख्त शिद्दतपसंदो की पनाह गये, उनके लिये ये भस्मासुर बने। 9/11 से कोई सबक न ले विश्वआका अमेंरिका आज भी दुसरे मुल्कों में शिद्दतपसंदो की दोनो हाथो से मदद कर रहा है। पाकिस्तान तो आज भी सरमायादारो-शिद्दतपसंदो-दहशतगर्दो-साम्राज्यवाद के एंजेटो के चंगुल में फसा गुलाम मूल्क हैं वहा के सियासतदानों से उम्मीद की जाना बेमानी है। लेकिन उधर विश्व की सबसे बड़ी जम्हूरियत होने का दंभ भरने वाले हिन्दोस्ता के लीड़रानो ने भी तारीख से सबक न सिखने की कसम ले रखी है। इंदिरा गांधी को भिडंरावाले के गूर्गो ने हलाक किया, तो वसुंधरा राजे इंदिरा की राह पर आगे बढती दिख रही है। आज गुर्जरों की लाशों पर बैठ, मीणा समाज को गुर्जरों के खिलाफ खडा करवाकर राज करने की वसुंधरा की पालिसी कल को रानी के होश ठिकाने लगायेगी। आर एस एस, विहिप, बजरंग दले के दहशतगर्दो के साथ रोमांस का क्या हश्र हो रहा है गुजरात प्रोजेक्ट के रूप में वह आप सबके सामने है। उधर ठाकरे रूपी भाषायी फासीवादी के उत्थान के लिये काग्रेस-भाजपा दोनो जिम्मेदार है, अपनी गद्दी बचाने के लिये कभी काग्रेस तो कभी भाजपा ने शिवसेना जैसी फासीवादी पार्टी के साथ नापाक रिश्ता कायम दिया। उधर नार्थ-ईस्ट में भी प्रमुख राष्ट्रीय दल अलगाववादी ताकतो के साथ नापाक गठजोड करने से बाज नहीं आ रहे है। आज हिन्दोस्ता की अवाम भी अपने पाकिस्तानी भाईयो की तरह बारूद के ढेर पर बैठी दिखाई देती है।




परेश टोकेकर