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मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010

भारत में परम्पराओं को लेकर विचित्र रवैया - प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल

''साझी विरासत और कबीर की कविता'' विषय पर परिसंवाद
उदयपुर. एक कवि अपने सांस्कृतिक परिदृश्य में कितना बड़ा हस्तक्षेप कर सकता है,कबीर इसका उदाहरण हैं. प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल की चर्चित कृति ''अकथ कहानी प्रेम की'' के सन्दर्भ में आयोजित परिसंवाद में वरिष्ट आलोचक प्रो.नवल किशोर ने कहा कि इस पुस्तक का महत्त्व इस तथ्य में है कि लेखक कबीर के मध्याम से उनके समय के धर्म,दर्शन और संस्कृति की समग्र पड़ताल बेहद विश्वसनीय ढंग से कर सका है. अपने निष्कर्षों की पुष्टि के लिए वे यूरोप के विद्वानों और विख्यात ग्रंथों कि आलोचना करने में कैसा भी संकोच नहीं करते.

मोहन लाल सुखाड़िया विश्व विद्यालय के नेहरु अध्ययन केंद्र द्वारा ''साझी विरासत और कबीर की कविता'' विषय पर आयोजित इस परिसंवाद में सिरोही महाविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. माधव हाड़ा ने कहा कि वर्णाश्रम जैसी हमारी गढ़ी गई कई पूर्व धारणाओं को यह पुस्तक झटका देती है और औपनिवेशिक ज्ञान कांड से विरासत में मिली समझ कि विकलांगता को बहुधा दुरुस्त करती है. डॉ. हाड़ा ने प्रो. अग्रवाल द्वारा दिए देशज आधुनिकता के सिद्धांत को आलोचना व समाज विज्ञान के लिए प्रस्थान बिंदु बताया. गुरु गोबिंद सिंह विश्व विद्यालय के अंग्रेजी विभाग के प्रो. आशुतोष मोहन ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि यह ऐसी पुस्तक नहीं है जिसे मौज या सपाटे में पढ़ लिया जाये, अपितु अपने विस्तार और गहराई के कारण यह अंतर अनुशासनिक अध्ययन का आदर्श उदाहरण बन जाती है. दर्शन शास्त्र की प्राध्यापक डॉ. सुधा चौधरी न प्रो. अग्रवाल द्वारा दी गई अवधारणा ''धर्मेतर अध्यात्म'' के सम्बन्ध में अपने शंकाओं और जिज्ञासाओं को रखा. बी.एन.कालेज के डॉ. हिमांशु पंड्या ने कहा की अपनी स्थापनाओं के लिए पुस्तक 'पोलिटिकली इनकरेक्ट'' होने का जोखिम उठाने से परहेज नहीं करती. संयोजन कर रहे दिल्ली विश्व विद्यालय के हिंदी सहायक आचार्य डॉ. पल्लव ने कहा कि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने आलोचना को सभ्यता समीक्षा कहा था, सभ्यता समीक्षा के स्तर को प्राप्त करने वाली दुर्लभ आलोचना पुस्तकों में से है जो कवि रूप में कबीर को सुस्थापित करती है.

लेखकीय वक्तव्य में आलोचक और संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि जब तक हम परम्परा से विवेकपूर्ण सम्बन्ध नहीं बनाते तब तक अपने सांस्कृतिक इतिहास को सही नहीं देख सकते.उन्होंने कहा कि अपनी परम्पराओं को लेकर जैसा विचित्र रवैया भारत में है वैसा और किसी औपनिवेशिक समाज में नहीं मिलता. प्रो. अग्रवाल ने देशज आधुनिकता और उसमें औपनिवेशिक आधुनिकता द्वारा उत्पन्न किये गए व्यवधान को समझना अतीत,वर्तमान और भविष्य का बोध प्राप्त करने के लिए ही नहीं अपितु नितांत निजी आत्मबोध के लिए भी जरूरी है. इससे पहले कला महाविद्यालय की अधिष्ठाता प्रो. अंजू कोहली ने अथितियों का स्वागत किया. अध्यक्षता कर रहे विश्व विद्यालय के कुलपति प्रो. आई.वी.त्रिवेदी ने कहा कि स्थानीय और सार्वभौमिक विषयों पर ऐसे उच्च स्तरीय संवादों का सिलसिला बनाना शिक्षण संस्थानों का कर्तव्य है.प्रो. अग्रवाल के इस सुझाव पर, मेवाड़ के विख्यात प्राच्यविद मुनि जिन विजय की स्मृति को स्थाई बनाने के लिए प्रयास होने चाहिए, कुलपति ने घोषणा की कि प्रतिवर्ष मुनि जिनविजय स्मृति व्याख्यानमाला का आयोजन मोहन लाल सुखाड़िया विश्व विद्यालय द्वारा किया जायेगा. पद्म श्री से सम्मानित मुनि जिन विजय चित्तोड्गढ़ जिले के निवासी थे,जिन्होंने प्राच्य विद्या के क्षेत्र में अपने असाधारण कार्य से अंतर्राष्ट्रीय पहचान बनाई थी.प्रो. आई.वी.त्रिवेदी ने प्रो. अग्रवाल को शाल ओढ़ाकर अभिनन्दन भी किया. आयोजन में स्वयं सेवी संस्थान ''आस्था'' द्वारा हाल में प्रकाशित सामुदायिकता और साम्प्रदायिक सदभाव शृंखला कि तीन पुस्तकों का लोकार्पण भी किया गया. इस शृंखला का संपादन डॉ. पल्लव ने किया है.

नेहरु अध्ययन केंद्र के निदेशक डॉ. संजय लोढ़ा ने अंत में सभी का आभार माना. आयोजन में विश्वविद्यालय कुल सचिव मोहनलाल शर्मा, कोटा खुला विश्वविद्यालय के निदेशक प्रो. अरुण चतुर्वेदी, कवि कैलाश जोशी,आकाशवाणी के केंद्र निदेशक डॉ. इन्द्रप्रकाश श्रीमाली,मीरा कन्या महाविद्यालय की हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. मंजू चतुर्वेदी, श्रमजीवी महाविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. मलय पानेरी, आस्था के विष्णु जोशी सहित आसपास के शहरों से आये लेखक-कवियों की उपस्थिति भी रही अंकुर प्रकाशन द्वरा लगायी गई पुस्तक प्रदर्शनी का संभागियों ने पूरा लाभ लिया..

(डॉ. संजय लोढ़ा)

रविवार, 13 दिसंबर 2009

छवियों का व्यापार मीडिया के समक्ष बड़ा संकट: प्रो. रामबक्ष

मीडिया अध्ययन केन्द्र द्वारा व्याख्यान आयोजित

उदयपुर । खबर वही नहीं है जो हमें दिखाई या सुनाई देती है उसका निहितार्थ ही उसे खबर बनाता है। खबर और विज्ञापन में जब भेद दिखाई न पड़ता हो तब निहितार्थों को समझना अधिक कठिन हो जाता है। सुप्रसिद्ध मीडिया विशेषज्ञ और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आचार्य प्रो. रामबक्ष ने 'आज का जटिल यथार्थ और मीडिया' विषय पर उक्त व्याख्यान में कहा कि छवियों का व्यापार मीडिया के समक्ष बड़ा संकट बन कर आ गया है । जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ ( डीम्ड विश्वविद्यालय) के मीडिया अध्ययन केन्द्र द्वारा आयोजित व्याख्यान में प्रो. रामबक्ष ने कहा कि मीडिया जाने-अनजाने जब इस यथास्थितिवाद को प्रेषित करता है तो सामान्य जन में परिवर्तन को कोई आकांक्षा नहीं रह जाती । उन्होंने लोकतंत्र के चारों स्तम्भों की स्थिति और महत्व का विशद विश्लेषण कर कहा कि 1952 में आए उपन्यास मैला आँचल में फणीश्वर नाथ रेणु ने बावनदास की हत्या से बता दिया था कि भ्रष्टाचार अब सामाजिक जीवन का अंग बन चुका है जिसे मीडिया भी नहीं तोड़ सकता । उन्होंने इसे जनरुचि, वोट और मुद्दों को प्रभावित करने वाला संकट बताते हुए कहा कि निजीकरण के दौर में यथास्थितिवाद को यह यह संकट बढाता है ।

आयोजन के विशिष्ट अतिथि प्रशासनिक अधिकारी शंकरलाल चौधरी ने कवि पाश की प्रसिद्ध पंक्ति 'सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना' को उद्धृत कर कहा कि निरन्तर भय और असुरक्षा में जी रहे जन समुदाय को शक्तिशाली व्यवस्था विभिन्न तरीकों से नियन्त्रित करती है। उन्होंने कहा कि इस भय को तोड़ने और परिवर्तन की आकांक्षा का सपना देख सकने का वातावरण बनाने की चुनौती मीडिया के समक्ष है। चौधरी ने एक शोध अध्ययन को उद्धृत कर बताया कि हमारे देश की 77 फीसद आबादी बीस रुपए प्रतिदिन की ही क्रय क्षमता रखती है तब मीडिया के सामने समानता और बेहतरी के लिए काम करने का दायित्व और ज्यादा बढ जाता है।

इससे पहले मीडिया अध्ययन केन्द्र के समन्वयक डॉं. पल्लव ने प्रो. रामबक्ष का परिचय दिया और व्याख्यान के विषय की रूपरेखा रखी। डॉं. पल्लव ने केन्द्र द्वारा संचालित पाठ्यक्रमों की विस्तृत जानकारी भी दी। अध्यक्षीय उद्बोधन में माणिक्यलाल वर्मा श्रमजीवी महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. एन. के. पण्ड्या ने कहा कि आज के दौर में ज्ञान के सभी अनुशासनों को अपनी प्रासंगिकता समाज और जीवन के पक्ष में सिद्ध करनी होगी। प्रो. पण्ड्या ने कहा कि सामाजिक सरोकारों वाली पत्रकारिता ने ही राजस्थान विद्यापीठ जैसी संस्थाओं को जन्म दिया है। अंत में केन्द्र के संकाय सदस्य आशीष चास्टा ने सभी का आभार व्यक्त किया। आयोजन में मोहनसिंह मेहता मेमोरियल ट्रस्ट के सचिव नन्दकिशोर शर्मा, प्रो. हेमेन्द्र चण्डालिया, डॉं. मलय पानेरी, डॉं. अवनीश नागर सहित शिक्षक और विद्यार्थी उपस्थित थे।

(डॉ. पल्लव)
समन्वयक

सोमवार, 23 नवंबर 2009

उर्दू रचना गोष्ठी

इन्दौर, 21 नवबंर 2009

जनवादी लेखक संघ के 'मासिक रचना गोष्ठी' कार्यक्रम के अंतर्गत उर्दू रचनाकारों की रचनाओं के पाठ का आयोजन स्थानिय ए आई आई ई ए (एल आय सी) यूनियन कार्यलय में आयोजित किया गया। इस अवसर पर तरक्कीपसंद शायर इसहाक असर, मुश्ताक अंसारी, नईम अनवर, सैय्यद अशरफ मीर व चुन्निलाल वाधवानी की रचनाओं का पाठ हुवा व रचनाओं पर चर्चा हुवी।

कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. देवीप्रसाद मौर्य ने की व संचालन डॉ. अयाज एहमद कुरैशी ने किया। इस अवसर पर नवगठित उर्दू साहित्य परिषद् के गठन की जानकारी उर्दू साहित्य परिषद् इन्दौर के सदर डॉ. अयाज एहमद कुरैशी ने दी।

कार्यक्रम में सनत कुमार, सदाशिव कौतुक, प्रदीप मिश्र, श्रीराम तिवारी, जितेन्द्र चौहान, सत्यनारायण पटेल, राहूलसिंह चौहान, चारूशीला मौर्य व परेश टोकेकर ने शिरकत की।

परेश टोकेकर कबीरा

गुरुवार, 25 जून 2009

वे लोकचेतना में आधुनिकता के अग्रदूत थे

श्रद्धांजलि : डा. सीताकिशोर खरे
गत २४ जून २००९ की रात्रि में डा. सीता किशोर खरे नहीं रहे। वे दतिया जिले की सेंवढा तहसील में गत पचास वर्षो से साधनारत थे। वे इस दौर के उन दुर्लभ साहित्यकारों में से एक थे जो अपनी प्रतिभा के उचे दाम लगवाने के लिए सुविधा के बाजारों की ओर नहीं भागे अपितु अपने जनपद के लोगों के बीच कठिनाइयों से जूझते रहे। उनका गॉंव ही नहीं अपितु वह पूरा इलाका हई डकैत ग्रस्त इलाका रहा है और अपने स्वाभिमान की रक्षा करने तथा नाकारा कानून व्यवस्था से निराश हो सिन्ध और चम्बल के किनारे जंगलों में उतर कर बागी बन जाना व अपना मकसद पाने के लिए सम्पन्नों की लूट कर लेना आम बात है। उन्होंने इस समस्या को राजधानियों के ए.सी. दफ्तरों में बैठने वाले नेताओं अधिकारियों की तरह न देख कर उसके सामाजिक आर्थिक पहलुओं को देखा और उन पर पूरी संवेदना के साथ कलम चलायी जो उनके सातसौ दोहों के “पानी पानी दार है” संग्रह में संग्रहीत हैं-
तकलीफें तलफत रहत, मजबूरी रिरयात
न्याय नियम चुप होत जब, बन्दूकें बतियात
छल जब जब छलकन लगत, बल जब जब बलखात
हल की मुठिया छोड़ कें, हाथ गहत हथियार
और ऐसा इसलिए होता है क्योंकि-
दौलत के दरबार में, मचौ खूब अंधेर
खारिज करी गरीब की अर्जी आज निबेर
जे इनके ऊॅंचे अटा बादर सें बतियात
आसपास की झोपड़ी, इन्हें ना नैक सुहात
सारा का सारा वातावरण ही ऐसा हो गया है कि-
कछु ऐसौ जा भूमि के पानी कौ परताप
मिसरी घोरौ बात में भभका देत षराप
का पानी में घुर गयौ का माटी की भूल
गुठली गाड़त आम की कड़ कड़ भगत बबूल
इसमें जमीन की गुणवत्ता भी अपनी भूमिका अदा करती है-
माटी जा की भुरभुरी, उपजा में कमजोर
कैसें हुइऐं आदमी, मृदुल और गमखोर
३ दिसम्बर १९३५ को दतिया जिले के ग्राम छोटा आलमपुर में जन्मे डा. सीताकिशोर खरे का बचपन में पेड़ से गिरने पर एक हाथ टूट गया था व समय पर समुचित इलाज की सुविधा उपलब्ध न होने से बने जख्म के कारण उसे काटना ही पड़ा था। अपने एक हाथ के सहारे ही वे मीलों साइकिल चलाते हुये शिक्षा ग्रहण करने जाते थे व अपनी प्रतिभा के कारण उन दिनों भी अध्यापक पद के लिए चुन लिये गये जब विकलांगता को चयन के लिए आरक्षण का आधार नहीं मानी जाता था। अध्यापकी करते हुये भी उन्होंने अध्ययन जारी रखा और एमए पीएचडी की व कालेज के लिए चुने गये जहॉं वे हिन्दी के विभागाध्यक्ष रहे। इस बीच उन्होंने न केवल अपने बन्धु बांधवों को ही पढाया अपितु अपने पूरे परिवेश में शिक्षा और ज्ञान की चेतना जगाने के अग्रदूत बने। अपने ज्ञानगुरू डा. राधारमण वैद्य की प्रेरणा से उन्होंने अपने साथियों और सहपाठियों को आगे बढाया और सामूहिक विकास के साथ काम किया जबकि इस दौर में साहित्यकार दूसरों के कंधे पर सवार होकर अपना स्वार्थ हल करते पाये जाते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने भाषा विज्ञान पर बहुत महत्वपूर्ण काम स्वयं किया तथा अपने साथियों सहयोगियों को भी शोध कार्य में मौलिक और महत्वपूर्ण काम करने के लिए प्रेरित किया। “सर्वनाम, अव्यय और कारक चिन्ह” तथा “दतिया जिले की पाण्डुलिपियों का सर्वेक्षण” उनके कार्यों की प्रकाशित पुस्तकें हैं। कभी उन्होंने अपने प्रिय कवि मुकुट बिहारी सरोज के गीतों पर ग्वालियर के एक दैनिक समाचार पत्र में स्तंभ लिखे थे जिनका नाम था- सूत्र सरोज के, टीका सीताकिशोर की। इन आलेखों का संकलन भी अभी हाल ही में प्रकाशित हुआ है।
डा. सीताकिशोर के गीतों में मुकुट बिहारी सरोज वाली खनक और कड़क पायी जाती रही है, जैसे-
कल अधरों की अधरों से
कुछ कहासुनी हो गयी, तभी तो
ये मंजुल मुस्कान बुराई माने है
या
इतनी उमर हो गयी ये सब करते करते
अब की कैसा बीज बो दिया सारी फसल खराब हो गयी
हम तो ये समझे थे अनुभव
तुम से रोज मिला करता है
पूरा था विश्वास कि सूरज
रोज सुबह निकला करता है
ये सब छल फरेब की बातें
तुमको सरल सुभाव हो गयीं
अब की कैसा बीज बो दिया सारी फसल खराब हो गयी
डा. सीताकिशोर बेहद संकोची, विनम्र, पर स्पष्ट थे। उन्हें किसी तरह के भ्रम नहीं थे व उनके सपनों के पॉंव सामाजिक यथार्थ की चादर से बाहर नहीं जाते थे। गलत रूढियों और परम्पराओं के बारे में उनकी समझ साफ थी पर वे उसे लोक चेतना पर थोपते नहीं थे अपितु उसमें स्वाभाविक विकास के पक्षधर थे। उनका जाना एक सामाजिक सचेतक लोकस्वीकृत साहित्य के अग्रदूत का जाना है। उनकी बात का महत्व था। आज के बहुपुरस्कृत और प्रकाशित स्वार्थी साहित्यकारों की भीड़ के बीच उन जैसी प्रतिभा के साथ इन्सानियत के धनी लोग दुर्लभ हो गये हैं।
वीरेन्द्र जैन

शनिवार, 13 जून 2009

चित्तौड़गढ़ में परिसंवाद

चित्तौड़गढ़। हमारे समय की आवारा पूंजी ऐसे समाज की रचना कर रही है जिसमें भावना और विचार के लिए कोई स्थान नहीं हैं। मनुष्य को पशु श्रेणी से अलग करने वाला तत्व साहित्य ही है जो गुण-दोष के विचार का विवेक देता है, यही कारण है कि इस आवारा पूंजी का साहित्य से बैर है। सुविख्यात हिन्दी आलोचक प्रो. रविभूषण ने 'संभावना' द्वारा आयोजित 'साहित्य और समाज के नये संबंध' विषयक परिसंवाद में उक्त विचार व्यक्त किये। स्वैच्छिक संस्थान प्रयास के सहयोग से आयोजित परिसंवाद में प्रो. रविभूषण ने कहा कि एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य का जुड़ाव न हो इसके लिए भूमण्डलीकरण की तमाम ताकतें सक्रिय हैं। परिवार जैसी मजबूत संस्था हमारे दौर में छिन्न-भिन्न होती नजर आ रही है। उन्होंने कहा कि साहित्य जोड़ने का काम करता है तथा धनवान होने और बेहतर मनुष्य होने का भेद समझाता है। प्रो. रविभूषण ने बढ़ रही व्यावसायिकता को मनुष्यता के लिए खतरनाक बताते हुए कहा कि जीवन व्यापार नहीं है। उन्होंने कहा कि समाज को ऐसी खास दिशा में ले जाने वाली शक्तियों के सामने साहित्य जबरदस्त प्रतिरोध करता है और मनुष्य को व्यापक बनाता है।

परिसंवाद में कवि-समालोचक डॉ. सत्यनारायण व्यास ने कहा कि जो साहित्य समाज के लिए उपयोगी न हो उसे साहित्य मानना भूल होगी। प्रेमचन्द की अमर कहानी 'कफन' को याद करते हुए उन्होंने कहा कि 'कफन' जैसी रचनाएँ साहित्य की शक्ति का असली परिचय देती हैं जिसे पढ़ने के बाद दलितों-वंचितों के प्रति हमारी दृष्टि ही बदल जाती है। डॉ. व्यास ने कहा कि साहित्य की प्रकृति कलात्मक होती है लेकिन उसकी परिणति सामाजिक ही हो सकती है। भागीदारी कर रहे डॉ. राजेन्द्र सिंघवी, गोविन्दराम शर्मा और माणिक सोनी के सवालों पर प्रो. रविभूषण ने विस्तृत चर्चा की। प्रयास के सचिव डॉ. नरेन्द्र गुप्ता ने कहा कि आवारा पूंजी हमारे आस-पास समृद्धि का छलावा जरूर पैदा कर रही है लेकिन विश्व बैंक की रिपोर्ट का सच है कि विश्व की अस्सी प्रतिशत पूंजी पर केवल पांच प्रतिशत लोगों ने कब्जा जमा रखा है। उन्होंने इस छलावे को तोड़ने में साहित्य की भूमिका को रेखांकित किया। 'बनास' के सम्पादक डॉ. पल्लव ने शिक्षित समुदाय को सांस्कृतिक जागरूकता के लिए अपने दायित्व को तय करने की आवश्यकता बताई। परिसंवाद में सामाजिक कार्यकर्ता प्रीति ओझा, प्राध्यापक गुणमाला जैन, कन्हैयालाल सांवरिया, रामेश्वरलाल शर्मा ने भी भाग लिया। इस अवसर पर चन्द्रकांता व्यास द्वारा सम्पादित राजस्थानी लोकगीतों के सद्य प्रकाशित संकलन 'माँ के गीत' का विमोचन प्रो. रविभूषण ने किया। श्रीमती व्यास ने पुस्तक के सम्पादन के अपने अनुभव बताते हुए कहा कि सांस्कृतिक प्रदूषण के दिनों में लोक की यह विरासत हमारे लिए पे्ररक सिद्ध होगी। आभार प्रदर्शित करते हुए 'सम्भावना' के अध्यक्ष डॉ. के.सी. शर्मा ने कहा कि साहित्य की भूमिका अब स्वान्तः सुखाय से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण है।

माणिक सोनी, सम्भावना, -16, हाउसिंग बोर्ड, कुम्भानगर, चित्तौड़गढ़-312001

मंगलवार, 9 जून 2009

दुर्घटना दर दुर्घटना - एक क्षोभ भरा दिन

मैं जब सुबह घूमने जाता हूँ तब साथ में मोबाइल नहीं ले जाता ताकि कम से कम एक घंटा तो सुकून से गुजर सके। 8 जून की सुबह जब घूम कर लौटा तो ताला खोलते ही मोबाइल की घंटी सुनाई दी। इतने सुबह मोबाइल पर घंटी आना वैसा ही लगता है जैसे कभी लोगों को तार आने पर लगता होगा। दौड़ कर मोबाइल उठाया और बिना यह देखे कि किस नम्बर से घंटी आ रही है, सुनने के लिए बटन दबा दिया। दूसरी तरफ देश के विख्यात कवि पूर्वसांसद उदयप्रताप सिंह थे। उन्होंने पूछा कहां थे बहुत देर से घंटी कर रहा हूँ, अच्छा सुनो सुबह सुबह तुम्हारे भोपाल में एक कार एक्सीडेंट हो गया है जिसमें कवि ओमप्रकाश आदित्य, नीरजपुरी, और लाढसिंह गुर्जर नहीं रहे व ओम व्यास और जॉनी बैरागी गम्भीर रूप से घायल हैं। ये लोग विदिशा कवि सम्मेलन से लौट रहे थे। इसलिए तुरंत ही वहाँ के पीपुल्स हास्पिटल पहुँचो।

मैं सन्न रह गया मैंने पूछा आप कहाँ पर हैं? वे बोले मैं तो दिल्ली में हूँ, वहाँ से अभी अभी अशोक ने खबर दी है। इतना कह कर उन्होंने फोन बन्द कर दिया, संभवत: दूसरों को जरूरी सूचना देने के लिये। पता नहीं चला कि और कौन कौन था एक्सीडेंट किससे हुआ। मैंने अस्पताल जाने से पहले कविमित्र माणिकवर्मा जी की खोज खबर लेनी जरूरी समझी जो थोड़ी ही दूर पर रहते हैं। फोन उनके यहाँ काम करने वाले लड़के ने अटैंड किया और नाम पूछने के बाद बताया कि वे बाथरूम में हैं। मैंने पूछा कि कल विदिशा तो नहीं गये थे तो उसने कहा नहीं। थोड़ी राहत की सांस लेकर मैंने कहा कि बाहर आ जायें तो बात करा देना। मैं तेजी से तैयार हुआ एक मिनिट के लिए अखबार के मुखपृष्ठ पर नजर डाली पर घटना एकदम सुबह की थी और अखबार छपने के बाद की थी इसलिए कहीं कोई खबर होने का सवाल ही नहीं उठता था। बाहर आकर देखा कि स्कूटर अचलनीय स्थिति में है इसलिए तुरंत ही सोचा कि क्यों न कवि मित्र राम मेश्राम से चलने का आग्रह किया जाये और उनकी कार से ही चलें। फोन किया तो वे तुरंत ही तैयार हो गये। किसी तरह उनके घर पहुँचा तो उनकी कार ने भी स्टार्ट हाने में थोड़े नखरे दिखाये पर अंतत: वह चल निकली। वहाँ बाहर प्रदीपचौबे अशोक चक्रधर पूर्व विधायक सुनीलम राजुरकर राज समेत कमिशनर भोपाल, संस्कृति मंत्री , संस्कृति सचिव, आईजी पूलिस आदि उपस्थित थे। पता चला कि मृत देहें तो पोस्टमार्टम और फिर उनके गृह नगर भेजे जाने के लिए सरकारी हमीदिया अस्पताल भेजी जा चुकी हैं और वहाँ पर घायलों को बचाने के भरसक प्रयत्न हो रहे हैं। घायलों में ओम व्यास की हालत काफी गम्भीर है तथा जानी बैरागी, भारत भवन के फोटोग्राफर विजय रोहतगी तथा गाड़ी का ड्राइवर खेमचंद खतरे से बाहर है। मंत्री और वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्तिथि के कारण अस्पताल प्रबंधन भी सक्रिय होकर रूचि ले रहा था व अस्पताल के मैनेजिंग डायरेक्टर स्वयं वहाँ पर थे। लगभग सारे ही उपस्थित लोग लगातार फोन पर बात कर रहे थे इसका असर यह हुआ था कि हम जैसे अनेक लोग वहाँ पर पहुँच सके थे। लगभग एक घंटे वहाँ रूकने के बाद हम लोग हमीदिया अस्पताल की ओर आये जहाँ मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग के डायरेक्टर श्रीराम तिवारी और असिसटेंट डायरेक्टर सुरेश तिवारी समेत लगभग पूरा संस्कृति विभाग उपस्तिथ था। पोस्टमार्टम पूरा हो चुका था और ताबूतों में शव रखे जाने थे, पर ताबूत उठाने वाला कोई नहीं था, एक पुलिस कानिस्टबल झुंझला कर कह रहा था कि ताबूत भी पुलिस ही उठाये। मेंने उसे सहायता देते हुये समझाया कि ये दुर्घटना है और ये सब सरकारी अधिकारी हैं, ये अपने हाथ से ताबूत तो क्या पानी का गिलास भी नहीं उठाते इसलिए मदद तो करनी ही पड़ेगी। उसी समय सूचना मिली कि हबीब तनवीर साहब भी नहीं रहे तो हम लोग ताबूतों को वाहनों में रखवा कर सीधे श्यामला हिल्स के अंसल अपार्टमेंट्स की ओर तेजी से चल दिये। वहाँ हबीब साहब की मृत देह आ चुकी थी और कमला प्रसाद, लज्जाशांकर हरदेनिया मनोज कुलकर्णी, जया मेहता, समेत दसबीस रंगकर्मी उपस्थित थे। जानकर आशचर्य और दुख हुआ कि हबीबजी के साथ काम करने वाले रंगकर्मियों में से भी कुछ अब तक मजहबी बने हुये थे और कोई कह रहा था कि पैर काबे की ओर नहीं करते या गुशल कराना चाहिये। लगता था कि अगले दिन उनके अंतिम संस्कार होने तक वे लोग हबीब जी की देह के साथ वे सब मजहबी खिलवाड़ कर लेना चाहते थे जो उन्होंने जिन्दगी भर नहीं किये थे।

एक कामरेड की देह को साम्प्रदायिक मुस्लिम, मुसलमान बना कर साम्प्रदायिक हिंदुओं के इस तर्क को बल दे रहे थे कि हबीब तनवीर ने पोंगा पंडित नाटक एक मुसलमान की तरह किया था और हिन्दू देवी देवताओं का अपमान किया था।

आठ जून सचमुच मेरे लिए गहरे क्षोभ का दिन रहा।

वीरेन्द्र जैन

रविवार, 12 अप्रैल 2009

श्रद्धांजलि: क्योंकि उनका नाम नईम था


नईम जी नहीं रहे। उनकी मृत्यु अप्रत्याशित नहीं थी अपितु प्रतीक्षित थी।
प्रसिद्ध युवा व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी जिन्होंने अपना व्यंग्य उपन्यास उन्हें ही समर्पित किया था व लिखा था 'पिता तुल्य नईमजी को सादर'। ज्ञान एक अच्छे साहित्यकार ही नहीं अच्छे डाक्टर भी हैं और ह्रदय रोग विशोषज्ञ हैं। मैंने जब नईमजी की बीमारी और उनके अस्पताल में भरती होने की खबर पढी तो सबसे पहला हाथ मेरा टेलीफोन पर ही गया तथा ज्ञान चतुर्वेदी को फोन लगा कर पूछा तो जैसा कि विशवास था उन्हें न केवल पूरी जानकारी ही थी अपितु उनकी पल पल की खबर वे रख रहे थे। उस समय भी ज्ञान का कहना था कि अब वे जिस दशा में हैं, उसमें उन्हें कोई चमत्कार ही बचा सकता है अगर अस्पताल से ठीक होकर वापिस भी आ गये तो भी जीवन निर्जीव सा ही रहेगा। ज्ञान अपने चिकित्सकीय पेशे में भावुक नहीं होते अपितु यथार्थ को बहुत साफ साफ कहते हैं। वे कम ही लोगों को सम्मान दते हैं पर नईमजी को पिता के समान सम्मान देते थे जिसका मैं प्रत्यक्ष गवाह हूँ। पर उस यथार्थ का वे भी क्या करते जो सामने था और उनकी मेडिकल साइंस में साफ दिख रहा था।
एक दूसरे कवि मित्र राम मेश्राम जो मध्यप्रदेश शासन से एक वरिष्ठ अधिकारी के रूप में सेवानिवृत्त हो चुके हैं व अपने सहकर्मी- अधिकारियों के स्वभाव के विपरीत अपनी ईमानदारी, निष्पक्षता, भावुकता और दूसरों की नि:स्वार्थ सहायता के लिए लगभग बदनाम हैं, को फोन लगाया तो पता चला कि खबर उन्हें भी पहले से ही है व संस्कृति सचिव से मिल कर उनकी सहायता के लिए आवेदन भिजवा चुके हैं व उन्हें उम्मीद है कि सहायता स्वीकृत भी हो जायेगी।
एक तीसरे व वरिष्ठ अधिकारी मित्र को फोन लगाकर सूचना दी और जानना चाहा कि यदि आजकल में उनका इंदौर का दौरा होने वाला हो तो मैं उनके साथ इंदौर तक की लिफ्ट लेकर नईमजी को देख आना चाहता हूँ। उनका उत्तर था कि वे परसों ही होकर आये हैं व उनकी दशा अच्छी नहीं कही जा सकती। ये कुछ उदाहरण हिन्दी के शिखरतम नवगीतकार नईमजी की लोकप्रियता और रिशतों के हैं। मैं स्वयं अपने को उनके निकट मानता था पर अगर सूची बनायी जाये तो यह कई हजार तक जा सकती है व इस पंक्ति में कौन कहाँ खड़ा होगा यह कहना बहुत कठिन है।
इस बीच में खबर आती है कि श्री राम मेश्राम के प्रयास सफल हुये हैं व शासन ने नईमजी की स्वास्थ सहायता के लिए एक लाख रूपये की राशि स्वीकृत कर दी है। इस खबर आने के अगले ही दिन बाद मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा नईमजी को देखने जाने व वहीं उक्त राशि विधिवत घोषित होने की खबर आती है जिससे संतोष मिलता है कि प्रति दिन हजारों रूपयों में होने वाले खर्च से कुछ तो राहत मिलेगी। चारण किस्म के कुछ संस्थाबाज अपने आयोजनों में मुख्यमंत्री, संस्कृतिमंत्री और संस्कृति सचिव की जयजयकार करने लगते हैं।
पर यह संतोष का भाव ज्यादा दिन नहीं ठहरता क्योंकि आठ दस दिन बाद ही खबर आती है कि सहायता नहीं पहुँची और उसे आचार संहिता लगने तक विलंबित किया गया व बाद में आचारसंहिता का बहाना बना लिया गया। मध्यप्रदेश में इन दिनों जो सरकार है उससे ऐसी हरकत की ही उम्मीद की जा सकती थी। और हो भी क्यों न क्योंकि नईमजी जिस लेखन के लिए देश भर में जाने जाते थे वह किसी फासिस्ट सरकार को हजम होने वाली चीज नहीं है। उनके गीतों की कुछ पंक्तियों से यह स्पष्ट हो जायेगा-
1
वो तो ये है कि अबोदाना है
बरना ये घर कसाई खाना है
आप झटका, हलाल के कायल
जान तो लोगो मेरी जाना है
2
काशी साधे नहीं सध रही
चलो कबीरा मगहर साधो
सौदा सुलफ कर लिया हो तो
उठ कर अपनी गठरी बांधो
इस बस्ती के बािशिंदे हम
लेकिन सब के सब अनिवासी
फिर चाहे राजे रानी हों
या फिर चाहे हों दासी
कै दिन की लकड़ी की हांड़ी
क्योंकर इसमें खिचड़ी रांधो

राजे बेईमान
बजीरा बे पेंदी के लोटे
छाये हुये चलन में सिक्के
बड़े ठाठ से खोटे
ठगी पिंडारी के मारे सब
सौदागर हो गये हताहत
चलो कबीरा
ठगुये तस्कर साधो
काशाी साधे नहीं सध रही
चलो कबीरा मगहर साधो
3
प्यासे को पानी
भूखे को दो रोटी
मौला दे! दाता दे
आसमान की बात न जानूँ
जनगण भाग्य विधाता दे

धरती और आकाश न मांगूं
या ईशवरीय प्रकाश न मांगूं
मांगे हूँ दो गज जमीन बस
मैं शााही आवास न मांगूं
पावों को पनहीं
परधनियां मोंटी सोंटी
सिर को साफा छाता दे
4
चिटठी पत्री खतोकिताबत के मौसम कब फिर आयेंगे
रब्बा जाने!
सही इबादत के मौसम
कब फिर आयेंगे
रब्बा जाने!
चेहरे झुलस गये कौमों के लू लपटों में
गंध चिरायंध की आती छपती रपटों में
युद्धक्षेत्र से क्या कम है ये मुल्क हमारा
इससे बदतर
किसी कयामत के मौसम
कब फिर आयेंगे
रब्बा जाने!

अब आप ही बताइये कि ऐसे गीत लिखने वाले नईम साहब को इलाज कराने के लिए वह सरकार क्यों आगे आयेगी जो अपना सारा ध्यान समाज को बांटने में लगाना चाहती है जिसने अरबों रूपयों की जमीन उन स्कूलों और संस्थाओं को दी है जो नफरत फैलाने के उद्योग चला रही हैं व जिसकी सारी राजनीति ही समाज को बांटने पर टिकी हुयी है। ढीलाढाला पापलीन का पाजामा कुर्ता पहिनने वाले नईम साहब किसी दुकान के बनिये से नजर आते थे भले ही वे कालेज के प्राचार्य रह चुके हों, उनके सारे ही गीत विशुद्ध हिंदी के गीत हों और जो अपने छूट गये बुन्देलखण्ड की याद को मालवा की धरती पर भी भुला न पाये हों। जिनको अपने सगे रिशतों से भी बढ कर सम्मान देने वालों में देश के वे बड़े से बड़े साहित्यकार हों जो जिनका जन्म गैर मुस्लिम परिवार में हुआ हो। सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी जिनके सगे साढू भाई हों और साम्प्रदायिक मुसलमान इसलिए तक नाराज हो जाते हों कि उनकी लड़की बिन्दी क्यों लगाती है। जो काष्ठशिल्प की मूर्तियां गढता हो तथा दुनिया भर के प्रगतीशील जनवादी उसे अपना बुजुर्ग मानते हों। और फिर उसका नाम भी नईम हो तो वो स्वाभाविक रूप से इस सरकार के लिए खतरनाक हो सकता है। भले ही प्रचारक अधिकारी ने सस्ती लोकप्रियता के लिए मुख्यमंत्री से घोषणा करवा दी हो पर इस सरकार की असली चाबी तो कहीं और रहती है जब तक वहाँ से अनुमति नहीं मिल जाती तब तक क्या हो सकता है!
वैसे भी सरकारों की कही कितनी बातें सच होती हैं।

वीरेन्द्र जैन
21 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629

सोमवार, 16 मार्च 2009

उदयपुर में सत्यनारायण पटेल का कहानी पाठ

उदयपुर ।
“कहां है आदमी, यहां तो सब कीड़ेमकोड़े है। इनकी औलादें भी ऐसी ही होंगी। कभी नहीं, कभी पनही नहीं पहनेंगे। जिनगीभर उबाणे पगे पटेलों की जी हुजूरी करेंगे।’’

गाँवों में जातीय और आर्थिक शोषण के यथार्थ का जीवन्त चित्र प्रस्तुत करने वाली कहानी ‘पनही’ पढते चर्चित युवा कथाकार सत्यनारायण पटेल ने अंत में कथा नायक के इस कथन से समाहार किया ‘अब मेरा मुंह वया देख रहे हो, जाओ टापरे में जो कुछ हो लाठी, हंसिया लेकर तैयार रहो, पटेलों के छोरे आते ही होंगे और हां, उबाणे पगे मत आजो कोई।’ पटेल की इस कहानी का अंत प्रबल जन प्रतिरोध की अभिव्यक्ति से हुआ है जो अब कैसी भी धौंस को बर्दाश्त नहीं करेगा।
जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय के जनपद विभाग द्वारा आयोजित इस कहानी पाठ के पश्चात हुई चर्चा में वरिष्ठ कवि नन्द चतुर्वेदी ने कहा कि ‘पनही’ एक शक्तिशाली कहानी है जो दबे हुए व्यक्ति को वाणी दे सकने वाली चेतना का उद्घाटन करती है। उन्होंने कहा कि इधर का कहानीकार मध्यम वर्ग की चालाकियों से भरा नजर आ रहा है। ऐसे में पटेल की कहानियॉ आश्वस्ति देने वाली हैं कि कई तरह के पटेलों से लड़ रहे लोगों के स्वर देने की सामथ्र्य अभी मौजूद है। नंद बाबू ने ग्लोबलाइजेशन के नये खतरों में स्थानीयता की रक्षा को बड़ी चुनौती बताया। वरिष्ठ उपन्यासकार राजेन्द्र मोहन भटनागर ने पटेल को बधाई दी कि उन्होंने गांव को अपने रचनाकर्म की विषय वस्तु बनाया। उन्होंने कहा कि ‘पनही’ की सफलता इस बात में है कि यह श्रोताओं को शहर से निकालकर ठेठ गांव में ले जाती है। सुखाड़िया विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के प्रो.आशुतोष मोहन ने इसे छोटे कैनवास के बावजूद सघन कथा बताया जो अपने भीतर औपन्यासिक गुंजाइश रखती है। उन्होंने नायिका पीराक के चित्रण में आई ऐन्द्रिकता को विरल अनुभव बताते हुए कहानी में छिपे अनेक संकेतों की भी व्याख्या की। उर्दू कथाकार डॉ.सर्वतुन्निसा खान ने कहा कि समकालीन कथा लेखन की एकरसता में जीवन के बहुविध रंगों की छटा गायब हो रही है ऐसे में गांव की कहानी आना खुशगवार है। खान ने कहानी की भाषा को देशज अनुभवों की समृद्ध उपज बताया। राजस्थान विद्यापीठ के सहआचार्य डॉ. मलय पानेरी ने कहा कि सामंतवाद का पहिया स्वतः जाम नहीं होगा अपितु उसके लिए संघर्ष करना होगा। डॉ. पानेरी ने कहानी को ग्रामीण निम्न वर्गीय जीवन का यथार्थ बताया। ‘बनास’ के संपादक डॉ. पल्लव ने देशज कथा रूप और शोषण की उदम चेष्टा को सत्यनारायण पटेल की कहानियों की मुख्य विशेषता बताया। इससे पहले जनपद विभाग के निदेशक पुरुषोतम शर्मा ने अतिथियों का स्वागत किया और जनपद विभाग की गतिविधियों की जानकारी दी। वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी रामचन्द्र नन्दवाना ने दलित उत्पीड़न के प्रतिरोध के अपने अनुभव सुनाए। अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ समालोचक प्रो. नवल किशोर ने कहा कि भूमंडलीकरण की चकाचौंध में साहित्य में ही जगह बची है जो पूरन और पीराक जैसे दबे कुचले लोगों की बात कर सके। उन्होंने कहा कि अच्छे लेखक की पहचान यह है कि वह बदलते समय को पकड़े और उसे सार्थक कला रूप दे। उन्होंने सत्यनारायण पटेल की कहानियों को इस चेतना से सम्पन्न बताते हुए कहा कि छोटी छोटी अस्मिताओं के नाम पर बंटने से ज्यादा जरूरी है कि हम बड़ी लड़ाई के लिए तैयार हों। आयोजन में लोककलाविद डॉ. महेन्द्र भाणावत, डॉ. एल.आर. पटेल, विभा रश्मि, दुर्गेश नन्दवाना, भंवर सेठ, हिम्मत सेठ, अर्जुन मंत्री, लक्ष्मीलाल देवड़ा, गणेश लाल बण्डेला सहित बड़ी संख्या में युवा पाठक उपस्थित थे।
अंत में विद्यापीठ के सांस्कृतिक सचिव डॉ. लक्ष्मीनारायण नन्दवाना ने आभार व्यक्त किया।

गणेशलाल मीणा
152, टैगोर नगर, हिरण मगरी, से. 4, उदयपुर 313 002
प्रेक्षक: पल्लव (ईमेल: pallavkidak@gmail.com, फ़ोन: ०९४१४७३२२५८)

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2009

मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन भोपाल के वागीश्वरी सम्मान के अवसर पर कुछ बातें

दिनांक २४ एवं २५.०१.२००९ को भोपाल में एक आयोजन हुआ । आयोजन था मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन भोपाल के वागीश्वरी सम्मान का । २००८ का यह सम्मान कहानी विधा के लिए श्री सत्यनारायण पटेल (इंदौर) को उनके कहानी संकलन "भेम का भेरू मांगता कुल्हाडी इमान" तथा श्री भालचंद्र जोशी (खरगोन) को उनके कहानी संग्रह "चरसा" पर दिया गया। कविता के लिए श्री दिनेश कुशवाह (रीवा) को उनके कविता संग्रह "इसी काया में मोक्ष " पर दिया गया । आलोचना के लिए अमरकांत के कथा साहित्य पर काम करने के लिए डॉ.बहादुर सिंह परमार (छतरपुर) को दिया गया ।

दो दिवसीय इस कार्यक्रम में डॉ.नामवर सिंह सहित कई ख्यात साहित्यकारों ने इस आयोजन की शोभा बढ़ाई। जिसमे सर्वश्री चंद्रकांत पाटिल (मराठी कवि), चंद्रकांत देवताले ,विजय कुमार, भगवत रावत, आग्नेय, डॉ.कमलाप्रसाद (महामंत्री ,साहित्य सम्मेलन), अक्षय कुमार जैन (अध्यक्ष, साहित्य सम्मेलन), राजेश जोशी , कुमार अम्बुज , लीलाधर मंडलोई , राजेंद्र शर्मा , निलेश रघुवंशी, डॉ.उर्मिला शिरीष, हरि भटनागर , मुकेश वर्मा , भालचंद्र जोशी ,सत्यनारायण पटेल, दिनेश कुशवाह, बहादुर सिंह परमार, जीतेन्द्र चौहान, रवीन्द्र स्वप्निल प्रजापति, आदि कई साहित्यकार उपस्थित थे ।

दिनांक २४.०१.०९ को पहला सत्र कविता पर केंद्रित था । दूसरे सत्र में पुरस्कार प्रदान किए गए तथा कई पुस्तकों का विमोचन किया गया । इस अवसर पर हिन्दी के महत्वपूर्ण कवि केदारनाथ अग्रवाल की कविता पुस्तकों का लोकार्पण भी किया गया जो अपने आप में एक महत्वपूर्ण घटना है ।

दिनांक २५.०१.२००९ को पहले सत्र में कई महत्वपूर्ण साहित्यकारों ने अपनी पसंद की तीन कविताओं पर बात की ।श्री कुमार अम्बुज ने हरिओम राजोरिया की कविता "चंदूलाल कटनीवाले" श्री विवेक गुप्ता की कविता "वह एक घर था एसा " श्री बोधिसत्व की कविता "माँ का नाच" को उल्लेखनीय बताया। दूसरे सत्र में कविता पाठ हुआ जिसमे कवियों ने अपनी कविताओं का पाठ किया ।

साभार: http://bahadur-patel.blogspot.com/2009/01/blog-post_26.html

मंगलवार, 4 नवंबर 2008

नया पथ : जुलाई–सितंबर ’08 अंक


संपादकीय
आवाज़ जो गूंजती रहेगी
महमूद दरवेश : चंचल चौहान
महमूद दरवेश की कविता : 'मैं फि़लिस्तीन का आशिक़'
तजु‍र्मा : एजाज़ अहमद
अहमद फ़राज़ : सुरेश कुमार
अहमद फ़राज़ की तीन कविताएं
वेणुगोपाल की दो कविताएं
प्रस्तुति : सुधा सिंह

परत–दर–परत विमर्श
एस.डब्ल्यू. फ़ैलन के कोश की भूमिका
अंग्रेज़ी से अनुवाद: ऐना रुथ जे व रविकांत
फ़ैलन की भूमिका पर टिप्पणी : रविकांत
दिल्ली की ज़बान : सुहैल हाशमी
अनुवाद : कांतिमोहन ‘सोज़’
देहली कालेज: ज्ञानविज्ञान की शुरुआत : मधु प्रसाद
अनुवाद : नरेश ‘नदीम’
सदाबहार हिंदुस्तानी ज़बान : आलोक राय
अनुवाद : संजीव कुमार
हिंदी–उर्दू के बीच संवाद : कृष्णबलदेव वैद
हिंदी उर्दू के साथ साथ : अशोक वाजपेयी
ये अपनी ज़बान है : मंगलेश डबराल
उर्दू रंगमंच : जावेद मलिक
कवि सम्मेलन और मुशायरा : कांतिमोहन ‘सोज़’
फि़ल्मी गीतों की मिलीजुली ज़बान : जवरीमल्ल पारख

साझा समाज : साझा अहसास

बनारस : तीन कविताएं 1. गालिब 2. भारतेंदु 3. केदारनाथ सिंह
विधवा : तीन कविताएं 1. बेवा : हाली 2. विधवा : निराला 3. बेवा : नज़ीर बनारसी

विरासत : आज़ादी के दौर की कुछ उर्दू नज्में
ब्रिटिश शासन : अकबर इलाहाबादी
कराइन कह रहे हैं : अकबर इलाहाबादी
जावेद नामा : इक़बाल
टिप्पणी : आफ़ाक़ अहमद
सरमाया–ओ–मेहनत : इक़बाल
पयामे वफ़ा : चकबस्त
मज़ालिमे पंजाब : जफ़र अली खां
जोश की दो नज्में, अली सरदार जाफ़री, मजाज़, जगन्नाथ आज़ाद, साहिर लुधियानवी, तिलोकचंद महरूम
व फ़ैज़ की एक एक कविता

बहस के इर्द–गिर्द

हिंदी क्षेत्र की बोलियां : दिनेशकुमार शुक्ल
वे ख्वाब देखते हैं ... : बुद्धिनाथ मिश्र
19 वीं सदी में परिस्थितियां और भाषा विवाद : वैभव सिंह

नया पथ का पता : 8 ​विट्ठलभाई पटेल हाउस, नयी दिल्‍ली–110001
नया पथ : जुलाई–सितंबर ’08 अंक निम्न पते पर भी उपलब्ध है।
परेश टोकेकर कबीरा
सचिव, जनवादी लेखक संघ, इन्दौर
293, अनूप नगर
इन्दौर, म.प्र.
फोन: 0731-2551357, 9425956686
ईमेल: jlsindore@gmail.com

शुक्रवार, 12 सितंबर 2008

परमाणु करार से नहीं होगा बिजली संकट का समाधान

Sep 06, 02:04 am
देवघर। परमाणु करार देश के बहुसंख्यक लोगों के हित में नहीं है। उससे देश को नुकसान उठाना पड़ेगा। इस संधि के बाद देश में परमाणु बिजली उत्पादन में वृद्धि होने व देश की बिजली समस्या का समाधान होने की बात कहना मिथ्या है। इस संधि के 20 वर्षो के बाद बिजली उत्पादन में मात्र 6 फीसदी वृद्धि होगी, जो देश भर के लिए अपर्याप्त साबित होगी। ये बातें शुक्रवार को इस विषय पर आयोजित जनवादी लेखक संघ की देवघर जिला इकाई की बैठक में वक्ताओं ने कही। उसकी अध्यक्षता अब्दुरशीद रहमानी ने की। उसका संचालन सुधीर रंजन ने किया। उसमें वक्ताओं ने कहा कि वास्तविकता यह है कि इस संधि के बाद भारत अमेरिका की साम्राज्यवादी नीति के चंगुल में फंस जायेगा। अमेरिका के पुराने व बेकार पड़े परमाणु सयंत्र भारत में बेची जा सकेगी और भारत परमाणु परीक्षण निषेध जैसी वर्जनाओं के दायरे में आ जायेगा। वक्ताओं ने यह भी कहा कि भारत को इस वक्त बिहार में आयी बाढ़ पीड़ितों व क्षेत्रों के बचाव पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। उन्होंने परमाणु संधि को देश हित के खिलाफ बताने व केंद्र से समर्थन वापस लेने के सीपीएम के फैसले को भी सही बताया। उक्त विचार व्यक्त करनेवालों में धनंजय प्रसाद, श्री रहमानी, श्री रंजन, फाल्गुनी मरीक, राजेन्द्र, लखन यादव, डी भैया, उमेश कुमार, निरंजन कुमार, मो. तौकिर, बहादुर राउत, प्रेमशीला गुप्ता, नूरजहां बेगम, अतिकुर रहमान आदि शामिल थे।

(in.jagran.yahoo.com से साभार)

गुरुवार, 11 सितंबर 2008

जलेस इन्दौर की मासिक रचना गोष्ठी सम्पन्न

30 अगस्त 08, इन्दौर
जनवादी लेखक संघ इन्दौर के तत्वाधान में आयोजित "मासिक रचना गोष्ठी" कार्यक्रम के अंतर्गत कहानीकार श्याम यादव और कवि ओम ठाकुर ने शिरकत की।


ओम ठाकुर (रचना पाठ करते हुवे), श्याम यादव (मध्य में) व सनत कुमार


श्याम यादव ने प्रार्थना और शनीमहराज कहानिया का पाठ किया । कहानी पाठ के बाद इन पर हुई चर्चा में साहित्य सुधीजनों ने अपनी राय जाहिर करते हुए कहा की कहानी के रचना धर्म को छोड़ दिया जाये तो ये कहानिया समाज के उस चेहरे को उजागर करने में कामयाब हुई है जो समाज का अंग है और समाज के तथाकथित ठेकेदार उन्हें दरकिनार करते रहे है । कहानीकार का मकसद समाज को राह दिखाना नही होता वह तो उन सचाईयों को समाज के सामने लाने का काम करता है जिसे परे रख कर ये ठेकेदार अपने अपने उल्लू सीधा करने में लगे रहते है । प्रार्थना में जहा चप्पल जैसी छोटी सी चीज के सामने भगवान की आस्था के हिल जाने का वर्णन है तो शनी महराज में उस नन्हे से बालक का अंतर्द्वंद उजागर किया है जो अपने पिता की मोत के बाद अपनी माँ और बहन के पेट को भरने के लिए सड़क पर भगवान के नाम और विभिन्न स्वरूपों का सहारा ले कर पैसे कमाने की जुगाड़ करते हुए ख़ुद मौत के मुह में चला जाता है। उसकी मौत के साथ ही कहानी ख़त्म तो हो जाती है मगर कहानीकार एक सवाल समाज के सामने उछाल देता है की क्या उस बालक को इस समाज में लिखने पढने और जीने का हक है की नही। कहानीकार का कहना है कि लेखक का मकसद समाज को कोई संदेश देना नही अपितु उस सच्चाई से अवगत कराना है जो समाज में है और हम उसे देख कर भी अनदेखा कर देते है ।

इस अवसर पर कवि ओम ठाकुर ने घर और खेत, मेरे घर का रास्ता, औरत तुम्हें सलाम, मिली चाय कथ्थयी कुछ ज्यादा चीनी वाली रेल्वे स्टेशन के बाहर आवारा लड़के, कोंल्हू का बेल, तितली, डोंगियो से शब्द, आग की तासीर के विरूद्ध, आदिवासी बाला इत्यादि कविताओ का पाठ किया। वरिष्ठ कवि त्रिलोचन व शमशेर की पसंद ठाकुर की रचनाओ पर चर्चा के दौरान कवि प्रेमियो ने कवि के आशावादी फलसफे की भूरी-भूरी सराहना की। कवि का मानना है कि दुनिया बदल सकती है बशर्ते इसे बदलने की सोंच पैदा की जाये। तितली कविता के माध्यम से बालमन के अंदर झाकने के कवि के प्रयास को श्रोताओ ने पसंद किया।

कार्यक्रम की शुरूआत में वरिष्ठ वामपंथी नेता का. हरकिशन सिंह सुरजीत, फिलीस्तीनी शायर महमूद दरवेश व पाकिस्तानी शायर अहमद फराज को श्रंद्धाजली अर्पित की गयी। इस अवसर पर इन्दौर के तमाम जनवादी-प्रगतिशील ताकतो की तरफ से जनवादी लेखक संघ इन्दौर व प्रगतिशील लेखक संघ इन्दौर ने एम.एफ.हुसैन की प्रदर्शनी पर फासीवादी ताकतो द्वारा हमले के विराध में संयुक्त व्यक्तव्य जारी कर सहमत की प्रदर्शनी पर हिन्दू संगठनो द्वारा किये आंतकी हमले की भ्रत्सना करते हुवे दोषियो को गिरफ्तार कर उचित दंड दिये जाने की मांग की।

कार्यक्रम में विलास गुप्ते, सत्यनारायण पटेल, ड़ा भरत सिन्हा, पुरषोत्तम दुबे, सनत कुमार, चारूशीला मौर्य, प्रदीप मिश्र, प्रदीपकांत, चुन्नीलाल वाधवानी, शशिभूषण सहित अनेक साहित्यप्रेमी व बडी संख्या में एम.फील. के विद्यार्थी उपस्थित थे। जलेस इन्दौर इकाई के अध्यक्ष सनतकुमार ने वक्ताओ का स्वागत किया संचालन सचिव परेश टोकेकर ने किया व आभार सहसचिव चारूशीला मौर्य ने व्यक्त किया।