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रविवार, 17 जनवरी 2010

कामरेड़ ज्योति बसु को लाल सलाम


कामरेड़ ज्योति बसु का 95 वर्ष की आयु में 17 जनवरी 2010 में निधन हो गया। कामरेड़ बसु ने जिस बहादुरी व धैर्य से बंगाल के वाममोर्चे को अति-वामपंथी व दक्षिणपंथी ताकतो के हमले से बचाकर सफलता के साथ भूमि सुधार कार्यक्रम लागु किया व हिन्दोस्तान में गरीब आम जनता के सरोकारों की हिमायत की वह अपने आप में मिसाल है। कामरेड़ ज्योति बसु ने हिन्दोस्तान में वामपंथी व आम आदमी की राजनीति को जिस मुकाम तक पहुचाया उसे ओर आगे ले जाना ही उन्हें सच्ची श्रद्घाजली होगा।


कामरेड़ ज्योति बसु को लाल सलाम!
कामरेड़ ज्योति बसु अमर रहें!

रविवार, 8 नवंबर 2009

श्रद्घांजलिः का. कुवरपाल सिंह

जानेमाने हिन्दी साहित्यकार व अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पूर्व डीन कामरेड़ कुवरपाल सिंह का लंबी बिमारी के बाद 72 वर्ष की आयु में बीती रात निधन हो गया। आप जनवादी लेखक संघ के संस्थापक सदस्यों में से एक रहे है, तथा वर्तमान में जनवादी लेखक संघ को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में सेवा प्रदान कर रहे थे।

हाल ही में आपके सम्मान में आयोजित कार्यक्रम के दौरान आपने मरणोपरांत वैज्ञानिक अनुसंधान हेतू देहदान करने की इच्छा जाहिर की थी। आपकी अंतीम इच्छा को पूर्ण करते हुवे आपकी देह अ.मु.यू. को सौप दी गयी।

जलेस परिवार कुवरपाल सिंह जी पत्नी नमिता सिंह, उनके पुत्र व पुत्री के प्रति हार्दिक शोक संवेदना व्यक्त करता है।

का. कुवरपाल सिंह अमर रहे।
का. कुवरपाल सिंह को लाल सलाम।

गुरुवार, 25 जून 2009

वे लोकचेतना में आधुनिकता के अग्रदूत थे

श्रद्धांजलि : डा. सीताकिशोर खरे
गत २४ जून २००९ की रात्रि में डा. सीता किशोर खरे नहीं रहे। वे दतिया जिले की सेंवढा तहसील में गत पचास वर्षो से साधनारत थे। वे इस दौर के उन दुर्लभ साहित्यकारों में से एक थे जो अपनी प्रतिभा के उचे दाम लगवाने के लिए सुविधा के बाजारों की ओर नहीं भागे अपितु अपने जनपद के लोगों के बीच कठिनाइयों से जूझते रहे। उनका गॉंव ही नहीं अपितु वह पूरा इलाका हई डकैत ग्रस्त इलाका रहा है और अपने स्वाभिमान की रक्षा करने तथा नाकारा कानून व्यवस्था से निराश हो सिन्ध और चम्बल के किनारे जंगलों में उतर कर बागी बन जाना व अपना मकसद पाने के लिए सम्पन्नों की लूट कर लेना आम बात है। उन्होंने इस समस्या को राजधानियों के ए.सी. दफ्तरों में बैठने वाले नेताओं अधिकारियों की तरह न देख कर उसके सामाजिक आर्थिक पहलुओं को देखा और उन पर पूरी संवेदना के साथ कलम चलायी जो उनके सातसौ दोहों के “पानी पानी दार है” संग्रह में संग्रहीत हैं-
तकलीफें तलफत रहत, मजबूरी रिरयात
न्याय नियम चुप होत जब, बन्दूकें बतियात
छल जब जब छलकन लगत, बल जब जब बलखात
हल की मुठिया छोड़ कें, हाथ गहत हथियार
और ऐसा इसलिए होता है क्योंकि-
दौलत के दरबार में, मचौ खूब अंधेर
खारिज करी गरीब की अर्जी आज निबेर
जे इनके ऊॅंचे अटा बादर सें बतियात
आसपास की झोपड़ी, इन्हें ना नैक सुहात
सारा का सारा वातावरण ही ऐसा हो गया है कि-
कछु ऐसौ जा भूमि के पानी कौ परताप
मिसरी घोरौ बात में भभका देत षराप
का पानी में घुर गयौ का माटी की भूल
गुठली गाड़त आम की कड़ कड़ भगत बबूल
इसमें जमीन की गुणवत्ता भी अपनी भूमिका अदा करती है-
माटी जा की भुरभुरी, उपजा में कमजोर
कैसें हुइऐं आदमी, मृदुल और गमखोर
३ दिसम्बर १९३५ को दतिया जिले के ग्राम छोटा आलमपुर में जन्मे डा. सीताकिशोर खरे का बचपन में पेड़ से गिरने पर एक हाथ टूट गया था व समय पर समुचित इलाज की सुविधा उपलब्ध न होने से बने जख्म के कारण उसे काटना ही पड़ा था। अपने एक हाथ के सहारे ही वे मीलों साइकिल चलाते हुये शिक्षा ग्रहण करने जाते थे व अपनी प्रतिभा के कारण उन दिनों भी अध्यापक पद के लिए चुन लिये गये जब विकलांगता को चयन के लिए आरक्षण का आधार नहीं मानी जाता था। अध्यापकी करते हुये भी उन्होंने अध्ययन जारी रखा और एमए पीएचडी की व कालेज के लिए चुने गये जहॉं वे हिन्दी के विभागाध्यक्ष रहे। इस बीच उन्होंने न केवल अपने बन्धु बांधवों को ही पढाया अपितु अपने पूरे परिवेश में शिक्षा और ज्ञान की चेतना जगाने के अग्रदूत बने। अपने ज्ञानगुरू डा. राधारमण वैद्य की प्रेरणा से उन्होंने अपने साथियों और सहपाठियों को आगे बढाया और सामूहिक विकास के साथ काम किया जबकि इस दौर में साहित्यकार दूसरों के कंधे पर सवार होकर अपना स्वार्थ हल करते पाये जाते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने भाषा विज्ञान पर बहुत महत्वपूर्ण काम स्वयं किया तथा अपने साथियों सहयोगियों को भी शोध कार्य में मौलिक और महत्वपूर्ण काम करने के लिए प्रेरित किया। “सर्वनाम, अव्यय और कारक चिन्ह” तथा “दतिया जिले की पाण्डुलिपियों का सर्वेक्षण” उनके कार्यों की प्रकाशित पुस्तकें हैं। कभी उन्होंने अपने प्रिय कवि मुकुट बिहारी सरोज के गीतों पर ग्वालियर के एक दैनिक समाचार पत्र में स्तंभ लिखे थे जिनका नाम था- सूत्र सरोज के, टीका सीताकिशोर की। इन आलेखों का संकलन भी अभी हाल ही में प्रकाशित हुआ है।
डा. सीताकिशोर के गीतों में मुकुट बिहारी सरोज वाली खनक और कड़क पायी जाती रही है, जैसे-
कल अधरों की अधरों से
कुछ कहासुनी हो गयी, तभी तो
ये मंजुल मुस्कान बुराई माने है
या
इतनी उमर हो गयी ये सब करते करते
अब की कैसा बीज बो दिया सारी फसल खराब हो गयी
हम तो ये समझे थे अनुभव
तुम से रोज मिला करता है
पूरा था विश्वास कि सूरज
रोज सुबह निकला करता है
ये सब छल फरेब की बातें
तुमको सरल सुभाव हो गयीं
अब की कैसा बीज बो दिया सारी फसल खराब हो गयी
डा. सीताकिशोर बेहद संकोची, विनम्र, पर स्पष्ट थे। उन्हें किसी तरह के भ्रम नहीं थे व उनके सपनों के पॉंव सामाजिक यथार्थ की चादर से बाहर नहीं जाते थे। गलत रूढियों और परम्पराओं के बारे में उनकी समझ साफ थी पर वे उसे लोक चेतना पर थोपते नहीं थे अपितु उसमें स्वाभाविक विकास के पक्षधर थे। उनका जाना एक सामाजिक सचेतक लोकस्वीकृत साहित्य के अग्रदूत का जाना है। उनकी बात का महत्व था। आज के बहुपुरस्कृत और प्रकाशित स्वार्थी साहित्यकारों की भीड़ के बीच उन जैसी प्रतिभा के साथ इन्सानियत के धनी लोग दुर्लभ हो गये हैं।
वीरेन्द्र जैन

मंगलवार, 9 जून 2009

दुर्घटना दर दुर्घटना - एक क्षोभ भरा दिन

मैं जब सुबह घूमने जाता हूँ तब साथ में मोबाइल नहीं ले जाता ताकि कम से कम एक घंटा तो सुकून से गुजर सके। 8 जून की सुबह जब घूम कर लौटा तो ताला खोलते ही मोबाइल की घंटी सुनाई दी। इतने सुबह मोबाइल पर घंटी आना वैसा ही लगता है जैसे कभी लोगों को तार आने पर लगता होगा। दौड़ कर मोबाइल उठाया और बिना यह देखे कि किस नम्बर से घंटी आ रही है, सुनने के लिए बटन दबा दिया। दूसरी तरफ देश के विख्यात कवि पूर्वसांसद उदयप्रताप सिंह थे। उन्होंने पूछा कहां थे बहुत देर से घंटी कर रहा हूँ, अच्छा सुनो सुबह सुबह तुम्हारे भोपाल में एक कार एक्सीडेंट हो गया है जिसमें कवि ओमप्रकाश आदित्य, नीरजपुरी, और लाढसिंह गुर्जर नहीं रहे व ओम व्यास और जॉनी बैरागी गम्भीर रूप से घायल हैं। ये लोग विदिशा कवि सम्मेलन से लौट रहे थे। इसलिए तुरंत ही वहाँ के पीपुल्स हास्पिटल पहुँचो।

मैं सन्न रह गया मैंने पूछा आप कहाँ पर हैं? वे बोले मैं तो दिल्ली में हूँ, वहाँ से अभी अभी अशोक ने खबर दी है। इतना कह कर उन्होंने फोन बन्द कर दिया, संभवत: दूसरों को जरूरी सूचना देने के लिये। पता नहीं चला कि और कौन कौन था एक्सीडेंट किससे हुआ। मैंने अस्पताल जाने से पहले कविमित्र माणिकवर्मा जी की खोज खबर लेनी जरूरी समझी जो थोड़ी ही दूर पर रहते हैं। फोन उनके यहाँ काम करने वाले लड़के ने अटैंड किया और नाम पूछने के बाद बताया कि वे बाथरूम में हैं। मैंने पूछा कि कल विदिशा तो नहीं गये थे तो उसने कहा नहीं। थोड़ी राहत की सांस लेकर मैंने कहा कि बाहर आ जायें तो बात करा देना। मैं तेजी से तैयार हुआ एक मिनिट के लिए अखबार के मुखपृष्ठ पर नजर डाली पर घटना एकदम सुबह की थी और अखबार छपने के बाद की थी इसलिए कहीं कोई खबर होने का सवाल ही नहीं उठता था। बाहर आकर देखा कि स्कूटर अचलनीय स्थिति में है इसलिए तुरंत ही सोचा कि क्यों न कवि मित्र राम मेश्राम से चलने का आग्रह किया जाये और उनकी कार से ही चलें। फोन किया तो वे तुरंत ही तैयार हो गये। किसी तरह उनके घर पहुँचा तो उनकी कार ने भी स्टार्ट हाने में थोड़े नखरे दिखाये पर अंतत: वह चल निकली। वहाँ बाहर प्रदीपचौबे अशोक चक्रधर पूर्व विधायक सुनीलम राजुरकर राज समेत कमिशनर भोपाल, संस्कृति मंत्री , संस्कृति सचिव, आईजी पूलिस आदि उपस्थित थे। पता चला कि मृत देहें तो पोस्टमार्टम और फिर उनके गृह नगर भेजे जाने के लिए सरकारी हमीदिया अस्पताल भेजी जा चुकी हैं और वहाँ पर घायलों को बचाने के भरसक प्रयत्न हो रहे हैं। घायलों में ओम व्यास की हालत काफी गम्भीर है तथा जानी बैरागी, भारत भवन के फोटोग्राफर विजय रोहतगी तथा गाड़ी का ड्राइवर खेमचंद खतरे से बाहर है। मंत्री और वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्तिथि के कारण अस्पताल प्रबंधन भी सक्रिय होकर रूचि ले रहा था व अस्पताल के मैनेजिंग डायरेक्टर स्वयं वहाँ पर थे। लगभग सारे ही उपस्थित लोग लगातार फोन पर बात कर रहे थे इसका असर यह हुआ था कि हम जैसे अनेक लोग वहाँ पर पहुँच सके थे। लगभग एक घंटे वहाँ रूकने के बाद हम लोग हमीदिया अस्पताल की ओर आये जहाँ मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग के डायरेक्टर श्रीराम तिवारी और असिसटेंट डायरेक्टर सुरेश तिवारी समेत लगभग पूरा संस्कृति विभाग उपस्तिथ था। पोस्टमार्टम पूरा हो चुका था और ताबूतों में शव रखे जाने थे, पर ताबूत उठाने वाला कोई नहीं था, एक पुलिस कानिस्टबल झुंझला कर कह रहा था कि ताबूत भी पुलिस ही उठाये। मेंने उसे सहायता देते हुये समझाया कि ये दुर्घटना है और ये सब सरकारी अधिकारी हैं, ये अपने हाथ से ताबूत तो क्या पानी का गिलास भी नहीं उठाते इसलिए मदद तो करनी ही पड़ेगी। उसी समय सूचना मिली कि हबीब तनवीर साहब भी नहीं रहे तो हम लोग ताबूतों को वाहनों में रखवा कर सीधे श्यामला हिल्स के अंसल अपार्टमेंट्स की ओर तेजी से चल दिये। वहाँ हबीब साहब की मृत देह आ चुकी थी और कमला प्रसाद, लज्जाशांकर हरदेनिया मनोज कुलकर्णी, जया मेहता, समेत दसबीस रंगकर्मी उपस्थित थे। जानकर आशचर्य और दुख हुआ कि हबीबजी के साथ काम करने वाले रंगकर्मियों में से भी कुछ अब तक मजहबी बने हुये थे और कोई कह रहा था कि पैर काबे की ओर नहीं करते या गुशल कराना चाहिये। लगता था कि अगले दिन उनके अंतिम संस्कार होने तक वे लोग हबीब जी की देह के साथ वे सब मजहबी खिलवाड़ कर लेना चाहते थे जो उन्होंने जिन्दगी भर नहीं किये थे।

एक कामरेड की देह को साम्प्रदायिक मुस्लिम, मुसलमान बना कर साम्प्रदायिक हिंदुओं के इस तर्क को बल दे रहे थे कि हबीब तनवीर ने पोंगा पंडित नाटक एक मुसलमान की तरह किया था और हिन्दू देवी देवताओं का अपमान किया था।

आठ जून सचमुच मेरे लिए गहरे क्षोभ का दिन रहा।

वीरेन्द्र जैन

सोमवार, 8 जून 2009

हबीब तनवीर नहीं रहे

"पोंगा पंडित", "जिस लाहोर नहीं देख्यों", "चरणदास चोर", "आगरा बाजार" जैसे नाटको को मंचित-निर्देशीत करने वाले वरिष्ठ रंगकर्मी हबीब तनवीर के निधन पर जनवादी लेखक संघ, इन्दौर अफसोस जाहिर करता है।

रविवार, 12 अप्रैल 2009

श्रद्धांजलि: क्योंकि उनका नाम नईम था


नईम जी नहीं रहे। उनकी मृत्यु अप्रत्याशित नहीं थी अपितु प्रतीक्षित थी।
प्रसिद्ध युवा व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी जिन्होंने अपना व्यंग्य उपन्यास उन्हें ही समर्पित किया था व लिखा था 'पिता तुल्य नईमजी को सादर'। ज्ञान एक अच्छे साहित्यकार ही नहीं अच्छे डाक्टर भी हैं और ह्रदय रोग विशोषज्ञ हैं। मैंने जब नईमजी की बीमारी और उनके अस्पताल में भरती होने की खबर पढी तो सबसे पहला हाथ मेरा टेलीफोन पर ही गया तथा ज्ञान चतुर्वेदी को फोन लगा कर पूछा तो जैसा कि विशवास था उन्हें न केवल पूरी जानकारी ही थी अपितु उनकी पल पल की खबर वे रख रहे थे। उस समय भी ज्ञान का कहना था कि अब वे जिस दशा में हैं, उसमें उन्हें कोई चमत्कार ही बचा सकता है अगर अस्पताल से ठीक होकर वापिस भी आ गये तो भी जीवन निर्जीव सा ही रहेगा। ज्ञान अपने चिकित्सकीय पेशे में भावुक नहीं होते अपितु यथार्थ को बहुत साफ साफ कहते हैं। वे कम ही लोगों को सम्मान दते हैं पर नईमजी को पिता के समान सम्मान देते थे जिसका मैं प्रत्यक्ष गवाह हूँ। पर उस यथार्थ का वे भी क्या करते जो सामने था और उनकी मेडिकल साइंस में साफ दिख रहा था।
एक दूसरे कवि मित्र राम मेश्राम जो मध्यप्रदेश शासन से एक वरिष्ठ अधिकारी के रूप में सेवानिवृत्त हो चुके हैं व अपने सहकर्मी- अधिकारियों के स्वभाव के विपरीत अपनी ईमानदारी, निष्पक्षता, भावुकता और दूसरों की नि:स्वार्थ सहायता के लिए लगभग बदनाम हैं, को फोन लगाया तो पता चला कि खबर उन्हें भी पहले से ही है व संस्कृति सचिव से मिल कर उनकी सहायता के लिए आवेदन भिजवा चुके हैं व उन्हें उम्मीद है कि सहायता स्वीकृत भी हो जायेगी।
एक तीसरे व वरिष्ठ अधिकारी मित्र को फोन लगाकर सूचना दी और जानना चाहा कि यदि आजकल में उनका इंदौर का दौरा होने वाला हो तो मैं उनके साथ इंदौर तक की लिफ्ट लेकर नईमजी को देख आना चाहता हूँ। उनका उत्तर था कि वे परसों ही होकर आये हैं व उनकी दशा अच्छी नहीं कही जा सकती। ये कुछ उदाहरण हिन्दी के शिखरतम नवगीतकार नईमजी की लोकप्रियता और रिशतों के हैं। मैं स्वयं अपने को उनके निकट मानता था पर अगर सूची बनायी जाये तो यह कई हजार तक जा सकती है व इस पंक्ति में कौन कहाँ खड़ा होगा यह कहना बहुत कठिन है।
इस बीच में खबर आती है कि श्री राम मेश्राम के प्रयास सफल हुये हैं व शासन ने नईमजी की स्वास्थ सहायता के लिए एक लाख रूपये की राशि स्वीकृत कर दी है। इस खबर आने के अगले ही दिन बाद मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा नईमजी को देखने जाने व वहीं उक्त राशि विधिवत घोषित होने की खबर आती है जिससे संतोष मिलता है कि प्रति दिन हजारों रूपयों में होने वाले खर्च से कुछ तो राहत मिलेगी। चारण किस्म के कुछ संस्थाबाज अपने आयोजनों में मुख्यमंत्री, संस्कृतिमंत्री और संस्कृति सचिव की जयजयकार करने लगते हैं।
पर यह संतोष का भाव ज्यादा दिन नहीं ठहरता क्योंकि आठ दस दिन बाद ही खबर आती है कि सहायता नहीं पहुँची और उसे आचार संहिता लगने तक विलंबित किया गया व बाद में आचारसंहिता का बहाना बना लिया गया। मध्यप्रदेश में इन दिनों जो सरकार है उससे ऐसी हरकत की ही उम्मीद की जा सकती थी। और हो भी क्यों न क्योंकि नईमजी जिस लेखन के लिए देश भर में जाने जाते थे वह किसी फासिस्ट सरकार को हजम होने वाली चीज नहीं है। उनके गीतों की कुछ पंक्तियों से यह स्पष्ट हो जायेगा-
1
वो तो ये है कि अबोदाना है
बरना ये घर कसाई खाना है
आप झटका, हलाल के कायल
जान तो लोगो मेरी जाना है
2
काशी साधे नहीं सध रही
चलो कबीरा मगहर साधो
सौदा सुलफ कर लिया हो तो
उठ कर अपनी गठरी बांधो
इस बस्ती के बािशिंदे हम
लेकिन सब के सब अनिवासी
फिर चाहे राजे रानी हों
या फिर चाहे हों दासी
कै दिन की लकड़ी की हांड़ी
क्योंकर इसमें खिचड़ी रांधो

राजे बेईमान
बजीरा बे पेंदी के लोटे
छाये हुये चलन में सिक्के
बड़े ठाठ से खोटे
ठगी पिंडारी के मारे सब
सौदागर हो गये हताहत
चलो कबीरा
ठगुये तस्कर साधो
काशाी साधे नहीं सध रही
चलो कबीरा मगहर साधो
3
प्यासे को पानी
भूखे को दो रोटी
मौला दे! दाता दे
आसमान की बात न जानूँ
जनगण भाग्य विधाता दे

धरती और आकाश न मांगूं
या ईशवरीय प्रकाश न मांगूं
मांगे हूँ दो गज जमीन बस
मैं शााही आवास न मांगूं
पावों को पनहीं
परधनियां मोंटी सोंटी
सिर को साफा छाता दे
4
चिटठी पत्री खतोकिताबत के मौसम कब फिर आयेंगे
रब्बा जाने!
सही इबादत के मौसम
कब फिर आयेंगे
रब्बा जाने!
चेहरे झुलस गये कौमों के लू लपटों में
गंध चिरायंध की आती छपती रपटों में
युद्धक्षेत्र से क्या कम है ये मुल्क हमारा
इससे बदतर
किसी कयामत के मौसम
कब फिर आयेंगे
रब्बा जाने!

अब आप ही बताइये कि ऐसे गीत लिखने वाले नईम साहब को इलाज कराने के लिए वह सरकार क्यों आगे आयेगी जो अपना सारा ध्यान समाज को बांटने में लगाना चाहती है जिसने अरबों रूपयों की जमीन उन स्कूलों और संस्थाओं को दी है जो नफरत फैलाने के उद्योग चला रही हैं व जिसकी सारी राजनीति ही समाज को बांटने पर टिकी हुयी है। ढीलाढाला पापलीन का पाजामा कुर्ता पहिनने वाले नईम साहब किसी दुकान के बनिये से नजर आते थे भले ही वे कालेज के प्राचार्य रह चुके हों, उनके सारे ही गीत विशुद्ध हिंदी के गीत हों और जो अपने छूट गये बुन्देलखण्ड की याद को मालवा की धरती पर भी भुला न पाये हों। जिनको अपने सगे रिशतों से भी बढ कर सम्मान देने वालों में देश के वे बड़े से बड़े साहित्यकार हों जो जिनका जन्म गैर मुस्लिम परिवार में हुआ हो। सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी जिनके सगे साढू भाई हों और साम्प्रदायिक मुसलमान इसलिए तक नाराज हो जाते हों कि उनकी लड़की बिन्दी क्यों लगाती है। जो काष्ठशिल्प की मूर्तियां गढता हो तथा दुनिया भर के प्रगतीशील जनवादी उसे अपना बुजुर्ग मानते हों। और फिर उसका नाम भी नईम हो तो वो स्वाभाविक रूप से इस सरकार के लिए खतरनाक हो सकता है। भले ही प्रचारक अधिकारी ने सस्ती लोकप्रियता के लिए मुख्यमंत्री से घोषणा करवा दी हो पर इस सरकार की असली चाबी तो कहीं और रहती है जब तक वहाँ से अनुमति नहीं मिल जाती तब तक क्या हो सकता है!
वैसे भी सरकारों की कही कितनी बातें सच होती हैं।

वीरेन्द्र जैन
21 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629

गुरुवार, 9 अप्रैल 2009

नवगीतकार नईम का जाना दुखी कर गया

नवगीत के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर , गज़लकार एवं काष्ठशिल्पी नईम लंबे समय से बीमार थे । वे इंदौर के एक निजी अस्पताल में इलाज के दौरान आज दिनांक ९.०४.२००९ को इस दुनिया में नहीं रहे । वे देवास में रहे । देवास को उन्होंने अपनी कर्मभूमि बनाया । हिन्दी साहित्य में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा । वे आज हमारे बीच नहीं है। लेकिन उनका लेखन हमेशा हमारे बीच उन्हें मौजूद रखेगा । उन्हें हम सभी साहित्यिक साथियों की और से विनम्र अश्रुपूरित श्रद्धांजलि पेश है । उन्हें दिनांक १०.०४.२००९ शुक्रवार को सुबह ११ बजे अन्तिम बिदाई दी जायेगी ।
श्रद्धांजलि देते हुए उनका एक गीत प्रस्तुत है।

नवगीत


खाली हाथ लिए आया था
खाली ही दिन चला गया ।

वो क्या आया, हम ही बस यूँ ही आये थे
भीतर से आधे बाहर से किंतु सवाये थे
फंसा निरर्थकता के पाटों में
अपने हाथों दला गया ।

राजी नहीं हुआ भरने को अपना ही मन,
हुआ माटिया हाथ लगाये सोने सा धन
अपना भाड़ न फोड़ सका
औरों के हाथों तला गया ।

चले गए यूँ ही दिन खाली चले गए खाली,
उतर गई बालों की स्याही, चेहरे की लाली
बिना बुलाये आया था जो
बिना रुके ही भला गया ।

बहादुर पटेल