हिन्दी-आर्य, द्रविड़, आस्ट्रो-एशियाटिक व तिब्बती-बर्मन चारों भाषा परिवारों के आह्वान पर हिन्दोस्तान के कोने-कोने से छोटी-बड़ी तमाम भाषाओं, बोलियो व लिपियो के लमही पहुचने का सिलसिला शुरू हो गया। ना जाने कितने बरसों बाद इनका मिलन हुआ, कई नये सदस्य अपने ही परिवार के अन्य सदस्यों को ठीक से पहचान नहीं पा रहे थे व अपनी अज्ञानता पर शर्मिंदा हो रहे थे, वही दूसरी तरफ कई सदस्य अपने परिवार तथा अन्य परिवारों के सदस्यों से अपनी समानता देख विस्मीत हो रहे थे। आसपास के शासकीय, बचे-खुचे हिन्दी माध्यम के विद्यालय व कला संकाय के शासकीय कॉलेजों की जर्जर इमारतों में मेहमानो के ठहरने की उत्तम व्यवस्था की गयी, वैसे भी पुरे वतन में इनका खालिस ठिकाना सिर्फ यही बचा रह गया है। अतिथि देवों भवः की रवायत का खास ख्याल रखते हुये विशेष अतिथि अंग्रेजी के वास्ते ज़रा फाईवस्टार व्यवस्था की गयी, उसे पास के शहर की सबसे महंगी इंटरनेशनल स्कूल में ठहराया गया।
उदघाटन सत्र के पश्चात तमाम अतिथियों ने भोजन स्थल की ओर रूख किया। जैसा की अमूमन होता है भोजन के दौरान एक अनौपचारिक संवाद की शुरूआत हुवी, जिसमें कई मेहमान जुड़ने लगे। मध्यभारत की प्रमुख बोली निमाडी ने अपना दुखडा सुनाते हुवे कहा कि बड़ी भाषाओं के वर्चस्ववादी रवैये के चलते हमारी कई साथिने दम तोड चुकी है व कई अन्य मृत्यु की कगार पर है। 'जब अपना ही सिक्का खोटा हो तो दूसरों से क्या कहा जाये' हमें बोलने वालों ने ही हमें घरों की चाहरदिवारों में कैद करके रख दिया है। चलो घर में तो वे हमें इस्तेमाल कर भी लेते है लेकिन बाहर हमें इस्तेमाल करने से कतराते है। बिल्कुल ठीक कहती हो सखी, वैसे हमारे चाहने वालो की हालत भी कुछ खास अच्छी नहीं है, उन्हें वो मान-सम्मान नहीं मिलता जो इन बडी भाषाओं के चाहने वालो को मिलता है, भोजपुरी ने हिन्दी की तरफ इशारा करते हुवे कहा। निमाडी व भोजपुरी की देखा देखी बृज, मगही, कन्नोजी, अवधि, बघेली, बुंदेली, मारवाडी, मालवी व अन्य छोटी भाषाओं ने भी खड़ी बोली हिन्दी को ताने मारना शुरू कर दिया। अवधि ने बात काटते हुवे कहा कि बडी भाषाओं पर या छोटी भाषा-बोली बोलने वालों पर दोष मढ़ना उचित नहीं है। वैसे देखा जाये तो भाषा, मातृभाषा या बोलियो सभी के गुणधर्म समान होते हैं, परंतु सामाजिक-राजनीतिक रूप से सक्षम समुदाय या समुह 'भाषा' बोलते है व कम सक्षम अथवा दुर्बल समुदाय 'बोली' बोलते है। अर्थात बोलने वालो की सामाजिक-राजनीतिक हैसियत ही हमारा दर्जा तय कराती है। यही कारण है कि कम सम्माननीय या निचले दर्जे की माने जाने वाली भाषाओं या बोलियों को बोलने वाले हीन भावना से ग्रस्त हो हमसे दूर जाने लगते है, और अंततः हमारी साथिने अकाल ही काल के गाल में समा जाती है। बिहार से आयी अंगिका ने कहा बिल्कुल सही कहा आपने कम प्रतिष्ठित भाषा बोलने वाले संकोच वश यह मानने को तैयार तक नहीं होते की वे कम प्रतिष्ठित अमूक भाषा बोलते है, जब तक कोई मजबूत सामाजित-राजनीतिक कारण न हो वे प्रतिष्ठित भाषा को ही अपनी मातृभाषा बताना ज्यादा उचित समझते है। अंतराल में एक समय ऐसा भी आता है जब वे कम प्रतिष्ठित भाषा या बोली का अपने निजी जीवन तक में इस्तेमाल करना बंद कर देते है। इसी बीच मराठी ने कहा कि राष्ट्रभाषा बोलने वालों की मजबूत सामाजिक-राजनीतिक हैसियत क्षेत्रीय भाषाओं के मन में भी संशय पैदा करती है ठाकरे परिवार व उनके अनुयायी इसी संशय का फायदा अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिये उठाते है। तमिल बोली 'बहुभाषी संस्कृति' हिन्दोस्तान की प्रमुख विशेषताओं मे से एक है, हमारे यहाँ कई लोग ऐसे मिल जायेंगे जो बहुभाषी है एक से अधिक भाषायें बोलते, लिखते व पढते हैं। अब हिन्दी क्षेत्र में रह रहे मराठी, बंगाली, गुजराती, पंजाबी, तमिल या मलयाली भाषियों को ही लो वे अपनी मातृभाषा के साथ स्थानीय भाषा का भी इस्तेमाल करते आये है। कई मराठी, बंगाली, मलयाली या अन्य भाषीयों ने अपनी-अपनी मातृभाषाओं के समान हिन्दी की भी निस्वार्थ सेवा की है। रही बात क्षेत्रीय या छोटी भाषाओं के विलुप्ति की तो उन्हें बचाने की ज़िम्मेदारी राज्यों की है, आज़ाद हिन्दोस्तान में राज्यों का पुनर्गठन भाषा के आधार पर इसीलिए तो किया गया। हिन्दोस्तान के संविधान में कई ऐसे प्रावधान है जिनके चलते किसी एक भाषा का वर्चस्व स्थापित हो सकना संभव नहीं है, संविधान सभी भाषाओं के लिये समान अधिकारों की घोषणा करता है। परंतु प्रमुख राजनीतिक दलों के स्वार्थी रवैये ने भाषावाद की समस्या को जन्म दिया। मराठी ने बात बढाते हुवे कहा कांग्रेस ने शिवसेना जैसे भाषायी फासीवाद को ट्रेड यूनियन आंदोलन कुचलने के लिये खुब इस्तेमाल किया, इसी भाषावाद ने आगे चलकर मुझे मजबूत करने के बहाने महाराष्ट्र की कई छोटी भाषाओं को लील लिया, इन मरदूदो की कारस्थानी ने मुझे बहुत शर्मिंदा किया है। राज्य अपनी भाषा के साथ किसी दूसरी भाषा को सहायक आधिकारिक भाषा बनाये जाने के लिये मुक्त है लेकिन विडंबना यह है कि ये दर्जा अभिजातवर्गीय भाषा अंग्रेजी को मिला हुवा है। लेकिन ये भाषायी ठेकेदार साम्राज्यवाद द्वारा थोपी अंग्रेजी के खिलाफ एक शब्द भी कहने की जुर्रत तक नहीं करते है, यही इनका दोगलापन उजागर हो जाता है। बंगाली ने कहा अगर राज्य चाहे तो बड़ी भाषाओं को आगे बढ़ाने के साथ-साथ आदिवासीयों की भाषाओं को भी संरक्षित कर सकते है, अब त्रिपुरा का ही उदाहरण ले जहाँ की वामपंथी सरकार ने आधिकारिक भाषा बंगाली के साथ आदिवासीयों की भाषा काकबोराक को सहायक आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलवाया। 1961 की जनगणना में जहां मात्र तीन महिलाओं ने काकबोराक को अपनी मातृभाषा के रूप में स्वीकार किया वहीं यह संख्या 2001 की जनगणना में बढ़कर 761964 हो गयी। त्रिपुरा की वामपंथी सरकार के इस फैसले का रियांग आदिवासीयों ने विरोध किया जिनकी मातृभाषा रियांग, काईब्रू या ब्रू है। 2001 के जनगणना के आकड़ों के अनुसार रियांग बोलने वालों की संख्या 76450 हैं। एन.एल.एफ.टी. व बी.एन.एल.एफ. जैसे उग्रवादी संगठनों ने रियांग को काकबोराक के विरूद्ध खड़ा करने का षडयंत्र तक रचा, मौका ताड़ प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने एन.एल.एफ.टी. के राजनीतिक संगठन आ.पी.एफ.टी. से चुनावी तालमेल तक करने से गुरेज नहीं किया, लेकिन त्रिपुरा की समझदार जनता ने इस चाल को नाकाम कर दिया। अनौपचारिक संवाद अब एक गंभीर बहस में तब्दील हो चुका था, हिन्दी ने बहस में शरीक होते हुवे कहा कि साथिनों यह एक गलत धारणा है कि हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा हैं। भारत का संविधान हिन्दी के राष्ट्रभाषा होने की नहीं बल्कि आधिकारिक व अंग्रेजी के सहायक आधिकारिक भाषा होने की घोषणा करता है। इसी तरह राष्ट्रीय या क्षेत्रीय भाषा जैसा कुछ भी संविधान ने परिभाषित नहीं किया। तमिल ने बिल्कुल सही कहा कि हमारा संविधान भाषाओं के लोकतंत्रीकरण की गारंटी देता है, संविधान के हिसाब से सभी भाषायें समान है। वैसे देखा जाये तो मेरी हालत भी चिंताजनक ही मानी जायेगी, हिन्दी की जगह अधिकांशतः अंग्रेजी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया जाता रहा है। बाजारवाद ने ऐसा चक्कर चलाया की हिन्दी माध्यम से पढ़े विद्यार्थीयो के लिये रोज़गार के अवसर न रहे, व रोज़गार के लिये प्रमुख शर्त अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान बन गया। इसके चलते हिन्दी से विद्यार्थी दूर होते जा रहे है व शनैः शनैः मैं अपने ही देश में बेघर होने को मजबूर हो गयी। सभी की बातें सुनकर बड़े ही अदब के साथ उर्दू ने कहना शुरू किया, बाजारवाद के चलते चाहे जो संकट पैदा हो गया हो लेकिन कम-अस-कम सभी भाषाओं के लिये कहने को अपना घर तो है, लेकिन मुझे अपने वतन से उजाड़ कर एक देश के तख्त पर बिठाया गया जहाँ में बेगानी तन्हा जिंदगी जी रही हूँ और यहाँ मैरे खुद के वतन में फ़िरकापरस्त ताक़तें मुझे मज़हब के नाम पर बांटते फिर रही है। मुझे मेरी ही बहनों हिन्दी, हिन्दोस्तानी से लडवाया जा रहा है, उधर हिन्दी वाले मुझे मज़हबी आधार पर हिकारत की नजर से देखते है। मेरी सुन्दर लिपी पर नागरी लिपी थोपे जाने की कोशिशें भी चल रहीं है, इस तरह तो मेरा वजूद ही समाप्त हो जायेगा। दिनहीन अवस्था में कुर्सी पर बैठी मोढी लिपी ने टूटती जबान में कहा कि लिपी बदलने की प्रक्रिया से भाषा का विकास होता है या नहीं ये तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन इससे एक पुरी लिपी के फना हो जाने का अंदेशा जरूर रहता है। यह अनुसंधान का विषय है कि आज़ादी के बाद मुझे नागरी से बदलने का मराठी के विकास में कितना फायदा हुवा। मेंरा तो ये कहना है कि लिप्यांतर के स्थान पर लिपी सीखने को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये, भले ही यह कितना ही कठिन या अव्यवहारिक रास्ता क्यो न लगता हो।
भोजनस्थल खाली हो चला था, सभी कार्यक्रम के द्वितीय सत्र में शामिल होने जा चुके थे। बहस में शामिल भाषाओं, बोलियों व लिपियों ने भी कार्यक्रम स्थल की तरफ रूख किया। जाते-जाते अंग्रेजी हिन्दी व उर्दू से कहते हुवे जा रही थी कि तुम लोग बहुत खुशकिस्मत हो जो तुम्हे इस बहुभाषी देश के हृदयस्थल में स्थान मिला, तुम आम आदमी की जबान हो। मेरा क्या है मैं तो यहा अभिजात्य वर्ग की ...। खैर संस्कृत का इतिहास सभी को ज्ञात है, इसने सिर्फ शासक व उच्च अभिजातवर्ग की सेवा की। एक समय यह दबंगो की प्रमुख भाषा थी लेकिन आज कुछ दक्षिणपंथी सिरफिरों के अलावा इसे अपनी मातृभाषा कहने वाला शायद ही कोई बचा होगा, लेकिन प्राचीनकाल में कमतर दर्जे की समझे जानेवाली प्राकृत जरूर बची रह गयी।
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शनिवार, 5 दिसंबर 2009
शुक्रवार, 27 नवंबर 2009
भाषा की लड़ाई की आड़ में

कांग्रेस को नये नये दैत्य पैदा करने और उनसे खेलने का पुराना शोक है। ये दैत्य पहले तो उसके अपने अंदर की कलह से पैदा होते और उन्हीं से निपटने के काम आते थे। चाहे भिण्डरांवाले हों या बाल ठाकरे। लेकिन इस बार मनसे का नया दैत्य उसने शिवसेना की काट के लिए पैदा किया है। महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में इस कार्ड से कांग्रेस ने शिवसेना को किनारे लगा दिया है। लेकिन हर दैत्य हमेशा अपने मालिक का कहा नहीं मानता। एक दिन वह मालिक से आजाद होने लगता है और तब वह अपने ही मालिक को खाने लगता है। मालिक जब पकड़ में नहीं आता तो वह मालिक के चमचों का शिकार करता है और जब उनसे भी पेट नहीं भरता तो वह निर्दोष जनता का खून बहाने लगता है। इस बार के महाराष्ट्र चुनाव में मनसे की आड़ में कांग्रेस ने शिवसेना को किनारे लगा दिया है। लेकिन राज ठाकरे की म न से अब अपने मास्टर से अलग होने को कसमसा रही है। उसे पता है कि शिवसेना का शेर बूढ़ा हो चुका है और जिस शावक को जंगल का राज सौंपा गया है वह गीदड़ों का दूध पीकर पला है। राज ठाकरे सिर्फ मुंबई में कुछ सीट प्राप्त करने से संतुष्ट होने वाले नहीं है। उन्हें महाराष्ट्र की सत्ता चाहिये। इसके लिए वह वे सारे हथकण्डे अपनायेंगे जो कभी शिवसेना ने अपनाये थे। पहला ट्रेलर दिखाया जा चुका है। पूरी फिल्म दिखाई जाना बाकी है। जिस समय महाराष्ट्र निर्माण सेना के नव निर्वाचित बांके अबु आजमी को हिन्दी में शपथ लेने से रोकने के लिए उनका माइक तोड़ रहे थे, उन पर प्रहार कर रहे थे तब शिवसेना और भाजपा चुप थी। इस चुप्पी ने खेल को थोड़ा और अधिक दिलचस्प बना दिया है। भाजपा और शिवसेना कांग्रेस के खेल को जानती है। कांग्रेस को एक न एक दिन राज ठाकरे से अपने हाथ खींचना ही पड़ेंगे और उस दिन राज ठाकरे को अपने लिए नये सहोदरों की जरूरत होगी। भाजपा ने संघ के फासिस्ट सोच से धैर्य का पाठ तो पढ़ा ही है।
राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नव निर्वाचित बाहुबलियों की हरकत ने हिन्दी भाषा समाज के स्वाभिमान को बहुत आहत किया है। यह सब इस बात से भी आहत हुआ है कि म न से ने अंग्रेजी में शपथ लेने वालों को नहीं रोका। सिर्फ हिन्दी में शपथ लेने का विरोध किया। आहत स्वाभिमान हिन्दी क्षेत्र में भी उपद्रव की राजनीति को जन्म देगा। छुटपुट घटनाएं प्रतिक्रिया स्वरूप उत्तरप्रदेश में हुई भी हैं। लेकिन भाषा की राजनीति की मूल गड़बड़ कहां है, इस पर आज भी कोई बात करने को तैयार नहीं है, और अगर बात कर भी रहा है तो उसको सुधारने को कोई तैयार नहीं है। सोचा जाना चाहिए कि हमेशा हिन्दी का ही विरोध क्यों होता है? हिन्दी की स्थिति स्वयं हिन्दी प्रदेश में कोई बहुत अच्छी नहीं है। हिन्दी प्रदेश में भी हिन्दी का नहीं अंग्रेजी का ही वर्चस्व कायम है। चाहे तमिलनाडु हो, बंगाल हो, पंजाब हो या अब महाराष्ट्र हर जगह हिन्दी का विरोध होता है। छत्तीसगढ़ जब मध्यप्रदेश से अलग हुआ तो उसने भी हिन्दी की जगह छत्तीसगढ़ी को प्रमुखता देने का आग्रह किया। पिछले दिनों तो हिन्दी क्षेत्र के दलितों तक ने यह कहा कि दलितों को अपनी मुक्ति के लिए अंग्रेजी-माता को अपनाना चाहिए। हिन्दी दिवस की जगह अंग्रेजी माता का दिवस मनाया जाना चाहिए। राष्ट्रीय राजनीति में हिन्दी क्षेत्र का वर्चस्व हिन्दी भाषा के प्रति अन्य भाषा-भाषियों में एक भय पैदा करता है। हिन्दी उसे एक साम्राज्यवादी-विस्तारवादी-भाषा की तरह नजर आती है, जो मौका मिलते ही उनके अस्तित्व को नष्ट कर देगी। यह भय बहुत हवाई नहीं है। इसके कुछ ठोस कारण है। स्वयं हिन्दी क्षेत्र ने अपने इलाकों की बोलियों को बचाने और विकसित करने के लिए कोई बहुत ठोस कदम नहीं उठाये। मध्यप्रदेश में ही पांच सौ से अधिक जनबोलियां दम तोड़ चुकी है। बोलियों के साथ जुड़ी संस्कृतियों के संरक्षण की कोशिशें भी नाकाफी ही कहीं जायेंगी। और इन सबके मूल में है हिन्दी क्षेत्र की शिक्षा प्रणाली में त्रिभाषा के साथ किया गया व्यवहार। हिन्दी क्षेत्र ने बहुत मक्कारी के साथ तीसरी भाषा के रूप में संस्कृत को अपने यहां लागू कर दिया। उसने अपने क्षेत्र के स्कूलों में किसी प्रांतीय भाषा को सीखने का प्रावाधान पैदा नहीं किया। अगर हिन्दी क्षेत्र चाहता तो वह अपने सारे स्कूलों को बाईस भागों में बांटकर भारत की सारी भाषाये तीसरी भाषा के रूप में पढ़ा सकता था। पर उसने ऐसा नहीं किया। आज आपको हिन्दी के ऐसे अनेक विद्वान मिल जायेंगे जो तमिल भाषी या बंगला और मराठी भाषी हों या अन्य किसी भारतीय भाषा के हों, पर क्या हम एक ऐसे विद्वान का नाम पता कर सकते हैं जो मूलतः हिन्दी भाषी हो पर वह किसी अन्य भारतीय भाषा का विद्वान हो? अपने अहंकार से बाहर आये बिना हम महाराष्ट्र विधानसभा में हुई घटना की पुनरावृत्ति को नहीं रोक पाएंगे। समय आ गया है जब प्रदेश की शिक्षा नीति में भाषा के सवाल पर आमूल चूल परिवर्तन किया जाना जरूरी है।
राजेश जोशी
पाक्षिक लोकजतन से साभार (वर्षः दस, अंकः इक्कीस, 16 से 30 नवम्बर 2009)
राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नव निर्वाचित बाहुबलियों की हरकत ने हिन्दी भाषा समाज के स्वाभिमान को बहुत आहत किया है। यह सब इस बात से भी आहत हुआ है कि म न से ने अंग्रेजी में शपथ लेने वालों को नहीं रोका। सिर्फ हिन्दी में शपथ लेने का विरोध किया। आहत स्वाभिमान हिन्दी क्षेत्र में भी उपद्रव की राजनीति को जन्म देगा। छुटपुट घटनाएं प्रतिक्रिया स्वरूप उत्तरप्रदेश में हुई भी हैं। लेकिन भाषा की राजनीति की मूल गड़बड़ कहां है, इस पर आज भी कोई बात करने को तैयार नहीं है, और अगर बात कर भी रहा है तो उसको सुधारने को कोई तैयार नहीं है। सोचा जाना चाहिए कि हमेशा हिन्दी का ही विरोध क्यों होता है? हिन्दी की स्थिति स्वयं हिन्दी प्रदेश में कोई बहुत अच्छी नहीं है। हिन्दी प्रदेश में भी हिन्दी का नहीं अंग्रेजी का ही वर्चस्व कायम है। चाहे तमिलनाडु हो, बंगाल हो, पंजाब हो या अब महाराष्ट्र हर जगह हिन्दी का विरोध होता है। छत्तीसगढ़ जब मध्यप्रदेश से अलग हुआ तो उसने भी हिन्दी की जगह छत्तीसगढ़ी को प्रमुखता देने का आग्रह किया। पिछले दिनों तो हिन्दी क्षेत्र के दलितों तक ने यह कहा कि दलितों को अपनी मुक्ति के लिए अंग्रेजी-माता को अपनाना चाहिए। हिन्दी दिवस की जगह अंग्रेजी माता का दिवस मनाया जाना चाहिए। राष्ट्रीय राजनीति में हिन्दी क्षेत्र का वर्चस्व हिन्दी भाषा के प्रति अन्य भाषा-भाषियों में एक भय पैदा करता है। हिन्दी उसे एक साम्राज्यवादी-विस्तारवादी-भाषा की तरह नजर आती है, जो मौका मिलते ही उनके अस्तित्व को नष्ट कर देगी। यह भय बहुत हवाई नहीं है। इसके कुछ ठोस कारण है। स्वयं हिन्दी क्षेत्र ने अपने इलाकों की बोलियों को बचाने और विकसित करने के लिए कोई बहुत ठोस कदम नहीं उठाये। मध्यप्रदेश में ही पांच सौ से अधिक जनबोलियां दम तोड़ चुकी है। बोलियों के साथ जुड़ी संस्कृतियों के संरक्षण की कोशिशें भी नाकाफी ही कहीं जायेंगी। और इन सबके मूल में है हिन्दी क्षेत्र की शिक्षा प्रणाली में त्रिभाषा के साथ किया गया व्यवहार। हिन्दी क्षेत्र ने बहुत मक्कारी के साथ तीसरी भाषा के रूप में संस्कृत को अपने यहां लागू कर दिया। उसने अपने क्षेत्र के स्कूलों में किसी प्रांतीय भाषा को सीखने का प्रावाधान पैदा नहीं किया। अगर हिन्दी क्षेत्र चाहता तो वह अपने सारे स्कूलों को बाईस भागों में बांटकर भारत की सारी भाषाये तीसरी भाषा के रूप में पढ़ा सकता था। पर उसने ऐसा नहीं किया। आज आपको हिन्दी के ऐसे अनेक विद्वान मिल जायेंगे जो तमिल भाषी या बंगला और मराठी भाषी हों या अन्य किसी भारतीय भाषा के हों, पर क्या हम एक ऐसे विद्वान का नाम पता कर सकते हैं जो मूलतः हिन्दी भाषी हो पर वह किसी अन्य भारतीय भाषा का विद्वान हो? अपने अहंकार से बाहर आये बिना हम महाराष्ट्र विधानसभा में हुई घटना की पुनरावृत्ति को नहीं रोक पाएंगे। समय आ गया है जब प्रदेश की शिक्षा नीति में भाषा के सवाल पर आमूल चूल परिवर्तन किया जाना जरूरी है।
राजेश जोशी
पाक्षिक लोकजतन से साभार (वर्षः दस, अंकः इक्कीस, 16 से 30 नवम्बर 2009)
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व्यंग्य राजनीति
सोमवार, 27 जुलाई 2009
वे हिन्दुस्तानी के लेखक थे और पक्षधर भी
प्रेमचन्द की जयंती पर
वे हिन्दुस्तानी के लेखक थे और पक्षधर भी
वीरेन्द्र जैन
जब समाज को बांटने वाली शक्तियां अपना काम कर रही होती हैं तो वे उसे कई स्तरों पर बांटती हैं। दूसरी ओर समाज को एकता के सूत्र में बांधने वाली शक्तियां उसे सभी स्तरों पर बंटने से रोकती हैं हमारे देश के संदर्भ में मुंशी प्रेमचन्द समाज को एकता के सूत्र में बांधने वाली भाषा में साहित्य रचने वाले सबसे सटीक उदाहरण की तरह सामने आते हैं। एक धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था में ऐसा ही लेखक साहित्य का सर्वोच्च प्रतीक बन सकता है। उनकी प्रासंगिकता का यह सबसे बड़ा कारण है।
प्रेमचन्द हिन्दी के नहीं हिन्दुस्तानी के लेखक हैं जिन्होंने सबसे पहले अपनी हिन्दुस्तानी कहानियों को उर्दू लिपि में लिखा और बाद में नागरी लिपि में। यही कारण है कि उनका संपूर्ण साहित्य साथ ही साथ उर्दू लिपि में भी अनुवादित या कहें लिप्यांतर हुआ है। उनके भाषा सम्बन्धी विचार इस बात की पुष्टि करते हैं। वे कहते हैं कि ''राष्ट्रभाषा के नाम से हमारी कोई बहस नहीं है इसे हिन्दी कहिये, हिन्दुस्तानी कहिये, या उर्दू कहिये, चीज एक है। राष्ट्रभाषा केवल रईसों और अमीरों की भाषा नहीं हो सकती। उसे किसानों और मजदूरों की भी बनना पड़ेगा। जैसे रईसों और अमीरों से राष्ट्र नहीं बनता उसी तरह उनकी गोद में पली हुई भाषा ही राष्ट्रभाषा नहीं हो सकती।''
प्रेमचन्द न केवल कहानियों के विषय के कारण अपितु उनमें प्रयुक्त अपनी बोलचाल की भाषा के कारण भी जन-जन के प्रिय कथाकार बने हैं। वे कहते हैं कि ''लिखित भाषा की यह खूबी है कि बोलचाल की भाषा से मिले। इस आर्दश से वह जितनी दूर जाती है इतनी ही अस्वाभाविक हो जाती है''। इसी बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए एक जगह वे कहते हैं कि '' सवाल यह उठता है कि जिस कौमी भाषा पर इतना जोर दिया जा रहा है उसका स्वरूप क्या है। हमें खेद है कि अभी तक हम इसकी कोई खास सूरत नहीं बना सके हैं, इसलिए कि जो लोग उसका रूप बना सकते थे वे अंग्रेजों के पुजारी थे और हैं, मगर उसकी कसौटी यही है कि उसे ज्यादा से ज्यादा लोग समझ सकें। हमारी कोई सूबे वाली भाषा इस कसौटी पर पूरी नहीं उतरती। सिर्फ हिंदुस्तानी उतरती है, क्योंकि मेरे खयाल में हिन्दी और उर्दू एक ज़बान है। क्रिया और कर्ता, फेल और फाइल जब एक हैं, तो उनके एक होने में कोई सन्देह नहीं हो सकता। उर्दू वह हिन्दुस्तानी जबान है जिसमें अरबी फारसी के लफ्ज ज्यादा हों, उसी तरह हिंदी वह हिंदुस्तानी है जिसमें संस्कृत के शब्द ज्यादा हों। लेकिन जिस तरह अंग्रेजी में चाहे लेटिन या ग्रीक शब्द अधिक हों या एंग्लो सैक्सन, दोनों ही अंग्रेजी हैं, उसी भांति हिन्दुस्तानी भी अन्य भाषाओं के शब्दों के मिल जाने से कोई भिन्न भाषा नहीं हो जाती। साधारण बातचीत में तो हम हिंदुस्तानी का व्यवहार करते ही हैं। थोड़ी सी कोशिश से हम इसका व्यवहार उन सभी कामों में कर सकते हैं जिनसे जनता का सम्बन्ध है।
प्रेमचन्द ग्रामीण जीवन के सबसे बड़े चितेरे थे किंतु उनकी निगाह में पूरा देश और पूरा समाज रहता था इसलिए उन्होंने अपनी भाषा को बोलचाल की सरल भाषा रखते हुये भी आंचलिक नहीं होने दिया। दक्षिण भारत राष्ट्रभाषा प्रचार सभा के एक व्याख्यान में उन्होंने कहा था '' जीवित भाषा तो जीवित देह की तरह बनती रहती है। भाषा सुंदरी को कोठरी में रख कर आप उसका सतीत्व तो बचा सकते हैं,लेकिन उसके स्वास्थ का मूल्य देकर। उसकी आत्मा इतनी बलवान बनाइये कि वह अपने सतीत्व और स्वास्थ की रक्षा कर सके। बेशक हमें ऐसे ग्रामीण शब्दों को दूर रखना होगा जो किसी खास इलाके में बोले जाते हें। हमारा आर्दश तो यह होना चाहिए कि हमारी भाषा अधिक से अधिक आदमी समझ सकें। अगर इस आर्दश को हम अपने सामने रखें तो लिखते समय भी हम शब्द चातुरी के मोह में न पड़ेंगे।
एक धर्मनिरपेक्ष लेखक में ही यह शक्ति हो सकती है कि वह हर तरह की संकीर्णता को नकार कर उन्हें डांट पिला सके। प्रेमचन्द हिन्दी को संस्कृतनिष्ठ बनाकर शुद्ध हिंदी बनाने वालों पर ही अपना गुस्सा व्यक्त नहीं करते अपितु उर्दू वालों को भी उसी अधिकार से फटकारते हैंं ''इधर तो हम राष्ट्र राष्ट्र का गुल मचाते हैं, उधर अपनी ज़बानों के दरवाजे पर संगीन लिए खड़े रहते हैं कि कोई उनकी तरफ आंख न उठा सके। हिन्दी में हम उर्दू शब्दों को बिना तकल्लुफ स्थान देते हैं, लेकिन उर्दू के लेखक संस्कृत के मामूली शब्दों को भी अंदर नहीं आने देतें वह चुन चुन कर हिन्दी की जगह फारसी और अरबी शब्दों का स्तेमाल करते हैं। जरा जरा से मुजक्कर और मुअन्नस के भेद पर तूफान मच जाया करता है। उर्दू ज़बान सिरात का पुल बन कर रह गयी है जिससे जरा सा इधर उधर हुए और जहन्नुम में पहुंचे।
प्रेमचन्द के कथन की आत्मा को फिल्मी जगत ने पहचाना और माना है। यही कारण है कि आज सिनेमा, साहित्य से अधिक लोकप्रिय और सम्प्रेषणीय होता है क्योंकि उसकी भाषा न हिन्दी होती है और न उर्दू होती है अपितु हिन्दुस्तानी होती है। इसी तरह हिन्दुस्तानी फिल्म (भले ही उसका लोकप्रिय नाम हिन्दी फिल्म हो) के र्दशकों में भी कोई भाषा और धर्म का भेद भाव नहीं होता। समाज को बांटने के लाख प्रयत्नों के बाद भी आज तक हमारा संगीत हिंदुस्तानी संगीत है और वह हिंदी संगीत या उर्दू संगीत नहीं बना। प्रेमचन्द इस बात को समझते थे, मानते थे और व्यवहार में लाते थे। जनता की एकता का सच्चा पक्षधर उसकी एकजुट अभिव्यक्ति तथा उस अभिव्यक्ति के लिए एक भाषा का पक्षधर भी होगा। प्रेमचन्द ऐसे ही थे इसलिए महान थे और बने रहेंगे।
वे हिन्दुस्तानी के लेखक थे और पक्षधर भी
वीरेन्द्र जैन
जब समाज को बांटने वाली शक्तियां अपना काम कर रही होती हैं तो वे उसे कई स्तरों पर बांटती हैं। दूसरी ओर समाज को एकता के सूत्र में बांधने वाली शक्तियां उसे सभी स्तरों पर बंटने से रोकती हैं हमारे देश के संदर्भ में मुंशी प्रेमचन्द समाज को एकता के सूत्र में बांधने वाली भाषा में साहित्य रचने वाले सबसे सटीक उदाहरण की तरह सामने आते हैं। एक धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था में ऐसा ही लेखक साहित्य का सर्वोच्च प्रतीक बन सकता है। उनकी प्रासंगिकता का यह सबसे बड़ा कारण है।
प्रेमचन्द हिन्दी के नहीं हिन्दुस्तानी के लेखक हैं जिन्होंने सबसे पहले अपनी हिन्दुस्तानी कहानियों को उर्दू लिपि में लिखा और बाद में नागरी लिपि में। यही कारण है कि उनका संपूर्ण साहित्य साथ ही साथ उर्दू लिपि में भी अनुवादित या कहें लिप्यांतर हुआ है। उनके भाषा सम्बन्धी विचार इस बात की पुष्टि करते हैं। वे कहते हैं कि ''राष्ट्रभाषा के नाम से हमारी कोई बहस नहीं है इसे हिन्दी कहिये, हिन्दुस्तानी कहिये, या उर्दू कहिये, चीज एक है। राष्ट्रभाषा केवल रईसों और अमीरों की भाषा नहीं हो सकती। उसे किसानों और मजदूरों की भी बनना पड़ेगा। जैसे रईसों और अमीरों से राष्ट्र नहीं बनता उसी तरह उनकी गोद में पली हुई भाषा ही राष्ट्रभाषा नहीं हो सकती।''
प्रेमचन्द न केवल कहानियों के विषय के कारण अपितु उनमें प्रयुक्त अपनी बोलचाल की भाषा के कारण भी जन-जन के प्रिय कथाकार बने हैं। वे कहते हैं कि ''लिखित भाषा की यह खूबी है कि बोलचाल की भाषा से मिले। इस आर्दश से वह जितनी दूर जाती है इतनी ही अस्वाभाविक हो जाती है''। इसी बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए एक जगह वे कहते हैं कि '' सवाल यह उठता है कि जिस कौमी भाषा पर इतना जोर दिया जा रहा है उसका स्वरूप क्या है। हमें खेद है कि अभी तक हम इसकी कोई खास सूरत नहीं बना सके हैं, इसलिए कि जो लोग उसका रूप बना सकते थे वे अंग्रेजों के पुजारी थे और हैं, मगर उसकी कसौटी यही है कि उसे ज्यादा से ज्यादा लोग समझ सकें। हमारी कोई सूबे वाली भाषा इस कसौटी पर पूरी नहीं उतरती। सिर्फ हिंदुस्तानी उतरती है, क्योंकि मेरे खयाल में हिन्दी और उर्दू एक ज़बान है। क्रिया और कर्ता, फेल और फाइल जब एक हैं, तो उनके एक होने में कोई सन्देह नहीं हो सकता। उर्दू वह हिन्दुस्तानी जबान है जिसमें अरबी फारसी के लफ्ज ज्यादा हों, उसी तरह हिंदी वह हिंदुस्तानी है जिसमें संस्कृत के शब्द ज्यादा हों। लेकिन जिस तरह अंग्रेजी में चाहे लेटिन या ग्रीक शब्द अधिक हों या एंग्लो सैक्सन, दोनों ही अंग्रेजी हैं, उसी भांति हिन्दुस्तानी भी अन्य भाषाओं के शब्दों के मिल जाने से कोई भिन्न भाषा नहीं हो जाती। साधारण बातचीत में तो हम हिंदुस्तानी का व्यवहार करते ही हैं। थोड़ी सी कोशिश से हम इसका व्यवहार उन सभी कामों में कर सकते हैं जिनसे जनता का सम्बन्ध है।
प्रेमचन्द ग्रामीण जीवन के सबसे बड़े चितेरे थे किंतु उनकी निगाह में पूरा देश और पूरा समाज रहता था इसलिए उन्होंने अपनी भाषा को बोलचाल की सरल भाषा रखते हुये भी आंचलिक नहीं होने दिया। दक्षिण भारत राष्ट्रभाषा प्रचार सभा के एक व्याख्यान में उन्होंने कहा था '' जीवित भाषा तो जीवित देह की तरह बनती रहती है। भाषा सुंदरी को कोठरी में रख कर आप उसका सतीत्व तो बचा सकते हैं,लेकिन उसके स्वास्थ का मूल्य देकर। उसकी आत्मा इतनी बलवान बनाइये कि वह अपने सतीत्व और स्वास्थ की रक्षा कर सके। बेशक हमें ऐसे ग्रामीण शब्दों को दूर रखना होगा जो किसी खास इलाके में बोले जाते हें। हमारा आर्दश तो यह होना चाहिए कि हमारी भाषा अधिक से अधिक आदमी समझ सकें। अगर इस आर्दश को हम अपने सामने रखें तो लिखते समय भी हम शब्द चातुरी के मोह में न पड़ेंगे।
एक धर्मनिरपेक्ष लेखक में ही यह शक्ति हो सकती है कि वह हर तरह की संकीर्णता को नकार कर उन्हें डांट पिला सके। प्रेमचन्द हिन्दी को संस्कृतनिष्ठ बनाकर शुद्ध हिंदी बनाने वालों पर ही अपना गुस्सा व्यक्त नहीं करते अपितु उर्दू वालों को भी उसी अधिकार से फटकारते हैंं ''इधर तो हम राष्ट्र राष्ट्र का गुल मचाते हैं, उधर अपनी ज़बानों के दरवाजे पर संगीन लिए खड़े रहते हैं कि कोई उनकी तरफ आंख न उठा सके। हिन्दी में हम उर्दू शब्दों को बिना तकल्लुफ स्थान देते हैं, लेकिन उर्दू के लेखक संस्कृत के मामूली शब्दों को भी अंदर नहीं आने देतें वह चुन चुन कर हिन्दी की जगह फारसी और अरबी शब्दों का स्तेमाल करते हैं। जरा जरा से मुजक्कर और मुअन्नस के भेद पर तूफान मच जाया करता है। उर्दू ज़बान सिरात का पुल बन कर रह गयी है जिससे जरा सा इधर उधर हुए और जहन्नुम में पहुंचे।
प्रेमचन्द के कथन की आत्मा को फिल्मी जगत ने पहचाना और माना है। यही कारण है कि आज सिनेमा, साहित्य से अधिक लोकप्रिय और सम्प्रेषणीय होता है क्योंकि उसकी भाषा न हिन्दी होती है और न उर्दू होती है अपितु हिन्दुस्तानी होती है। इसी तरह हिन्दुस्तानी फिल्म (भले ही उसका लोकप्रिय नाम हिन्दी फिल्म हो) के र्दशकों में भी कोई भाषा और धर्म का भेद भाव नहीं होता। समाज को बांटने के लाख प्रयत्नों के बाद भी आज तक हमारा संगीत हिंदुस्तानी संगीत है और वह हिंदी संगीत या उर्दू संगीत नहीं बना। प्रेमचन्द इस बात को समझते थे, मानते थे और व्यवहार में लाते थे। जनता की एकता का सच्चा पक्षधर उसकी एकजुट अभिव्यक्ति तथा उस अभिव्यक्ति के लिए एक भाषा का पक्षधर भी होगा। प्रेमचन्द ऐसे ही थे इसलिए महान थे और बने रहेंगे।
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