हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक और जनवादी लेखक संघ के पूर्व महासचिव चन्द्रवली सिंह के निधन का दुखद समाचार अभी मिला है। उन्हें विनम्र् श्रद्धांजलि।
वीरेन्द्र जैन
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मंगलवार, 24 मई 2011
शनिवार, 2 अक्टूबर 2010
कवि , रंगकर्मी , नाटककार, अभिव्यक्ति के सम्पादक शिवराम नहीं रहे
ख्यात जनवादी नाटक 'जनता पागल हो गई है' के नाटककार, कवि और मार्क्सवादी चिंतक 'शिवराम' का 1 अक्टूबर 2010 के तीसरे पहर पौने तीन बजे कोटा में हृदयाघात से देहान्त हो गया। वे भारत की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (यूनाइटेड) के पोलिट ब्यूरो के वर्तमान सदस्य व दूरसंचार कर्मचारियों के नेता थे।शिवराम का जन्म 23 दिसंबर 1949 को राजस्थान के करौली नगर में हुआ था। पिता के गांव गढ़ी बांदुवा, करौली और अजमेर में शिक्षा प्राप्त की। फिर वे दूर संचार विभाग में तकनीशियन के पद पर नियुक्त हुए। दो वर्ष पूर्व ही वे सेवा निवृत्त हुए थे।
साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में सांगठनिक काम के महत्व को वे अच्छी तरह जानते थे। आरंभ में प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे। जनवादी लेखक संघ के संस्थापकों में से वे एक थे। लेकिन जल्दी ही सैद्धान्तिक मतभेद के कारण वे अलग हुए और अखिल भारतीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा 'विकल्प' के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। वर्तमान में वे 'विकल्प' के महासचिव थे।
जनवादी लेखक संघ इन्दौर इकाई कवि नाटककार, रंगकर्मी और मजदूरों के जुझारू नेता कामरेड शिवराम को श्रद्घाजली अर्पित करता है।
कामरेड शिवराम को लाल सलाम!
लेबल:
श्रद्धांजलि
रविवार, 15 अगस्त 2010
कामगार कवी नारायण सुर्वे
कामगार कवी के नाम से प्रसिद्घ वरिष्ठ मराठी जनकवी नारायण सुर्वे (८३) का आज सुबह लंबी बिमारी के बाद ठाणे में देहांत हो गया। १५ ऑक्टोबर १९२६ को मुंबई के गिरणगाव में जन्में अनाथ कामरेड़ सुर्वे का बचपन बड़ी मुफलीसी और गरीबी में फुटपाथ पर सोकर छोटे-मोटे काम करते हुवे बीता, इसी बीच आपने कविता लिखना शुरू किया। १९६६ में कामगारों के जीवन पर आधारीत आपका प्रथाम काव्य संग्रह 'माझे विद्यापीठ' प्रकाशित हुआ जिसे बड़ी प्रसिद्घि मिली। इसके अलावा आपके द्घारा लिखित जाहीरनामा (१९७८), ऐसा गा मी ब्रम्ह, सनद, मानुष कलावंत, आणि समाज, सर्व सुर्वे (वसंत शिरवाडकर संपादीत) काव्य संग्रह भी प्रसिद्घ हुवे। अध्यापन कार्य के साथ-साथ आप मुंबई के श्रमिक आंदोलन के साथ निरंतर जुड़े रहे व आपको श्रमिको के हक के लिये लंबे संघर्ष करने वाले जुझारू साथी के रूप में जाना जाता है।कामरेड सुर्वे को १९९८ में पद्मश्री व १९९९ में कबीर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। १९९५ में परभणी में संपन्न मराठी साहित्य सम्मेलन के आप अघ्यक्ष थे।
कामगार नेता व कामगार कवी कामरेड़ नारायण सुर्वे को जनवादी लेखक संघ की श्रंद्घाजली।
कामरेड़ नारायण सुर्वे अमर रहे।
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नारायण गंगाराम सुर्वे,
श्रद्धांजलि
रविवार, 17 जनवरी 2010
कामरेड़ ज्योति बसु को लाल सलाम

कामरेड़ ज्योति बसु का 95 वर्ष की आयु में 17 जनवरी 2010 में निधन हो गया। कामरेड़ बसु ने जिस बहादुरी व धैर्य से बंगाल के वाममोर्चे को अति-वामपंथी व दक्षिणपंथी ताकतो के हमले से बचाकर सफलता के साथ भूमि सुधार कार्यक्रम लागु किया व हिन्दोस्तान में गरीब आम जनता के सरोकारों की हिमायत की वह अपने आप में मिसाल है। कामरेड़ ज्योति बसु ने हिन्दोस्तान में वामपंथी व आम आदमी की राजनीति को जिस मुकाम तक पहुचाया उसे ओर आगे ले जाना ही उन्हें सच्ची श्रद्घाजली होगा।
कामरेड़ ज्योति बसु को लाल सलाम!
कामरेड़ ज्योति बसु अमर रहें!
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दुःख,
श्रद्धांजलि
रविवार, 8 नवंबर 2009
श्रद्घांजलिः का. कुवरपाल सिंह
जानेमाने हिन्दी साहित्यकार व अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पूर्व डीन कामरेड़ कुवरपाल सिंह का लंबी बिमारी के बाद 72 वर्ष की आयु में बीती रात निधन हो गया। आप जनवादी लेखक संघ के संस्थापक सदस्यों में से एक रहे है, तथा वर्तमान में जनवादी लेखक संघ को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में सेवा प्रदान कर रहे थे।
हाल ही में आपके सम्मान में आयोजित कार्यक्रम के दौरान आपने मरणोपरांत वैज्ञानिक अनुसंधान हेतू देहदान करने की इच्छा जाहिर की थी। आपकी अंतीम इच्छा को पूर्ण करते हुवे आपकी देह अ.मु.यू. को सौप दी गयी।
जलेस परिवार कुवरपाल सिंह जी पत्नी नमिता सिंह, उनके पुत्र व पुत्री के प्रति हार्दिक शोक संवेदना व्यक्त करता है।
का. कुवरपाल सिंह अमर रहे।
का. कुवरपाल सिंह को लाल सलाम।
हाल ही में आपके सम्मान में आयोजित कार्यक्रम के दौरान आपने मरणोपरांत वैज्ञानिक अनुसंधान हेतू देहदान करने की इच्छा जाहिर की थी। आपकी अंतीम इच्छा को पूर्ण करते हुवे आपकी देह अ.मु.यू. को सौप दी गयी।
जलेस परिवार कुवरपाल सिंह जी पत्नी नमिता सिंह, उनके पुत्र व पुत्री के प्रति हार्दिक शोक संवेदना व्यक्त करता है।
का. कुवरपाल सिंह अमर रहे।
का. कुवरपाल सिंह को लाल सलाम।
लेबल:
दुःख,
नीव का पत्थर,
श्रद्धांजलि
गुरुवार, 5 नवंबर 2009
मालवा के दुलारे को नमन :
क्या वे सचिन के 17000 रन पूरे करने के लिये प्रतीक्षा कर रहे थे?
वीरेन्द्र जैन्
शायद उन्हें सचिन के 17000 रन पूरे होने की प्रतीक्षा थी। अपने पिछले जन्मदिन पर लिखे कागद कारे में उन्होंने आगामी मृत्यु को सूंघ लेने के साफ साफ संकेत दे दिये थे।
वे ऐसे इकलौते वरिष्ट सम्पादक विचारक चिंतक और सामाजिक कार्यकर्ता थे जिन्हें समाज राजनीति अर्थ व्यवस्था आदि की बराबरी पर क्रिकेट को रखने में कोई परेशानी नहीं होती थी जबकि हम जैसे कई लोग जब किसी विशेष महत्व के विषय पर उनके धारदार लेख की प्रतीक्षा में जनसत्ता का इंतज़ार कर रहे होते, तब प्रथम पृष्ठ पर उतनी ही धार के साथ क्रिकेट पर उनका लेख देख कर कोफ्त होती थी। बाद में पता चला कि वे एक अखकार के सम्पादक के रूप में जन रुचियों के प्रति कितने सम्वेदन शील थे।
एक बार जब वे भारत भवन में आये थे और बातचीत में उनसे उनके सती प्रथा वाले सम्पादकीय के बारे में जिज्ञासा व्यक्त की तो उन्होंने कहा था कि एक सम्पादक का काम भी एक बेट्स मैन की तरह होता है जिसको एक दो सेकिंड में फैसला ले लेना होता है कि इस आती हुयी बाल को खेलना है छोड़ना है, हिट करना है या डिफेंसिव रहना है! और ये एक दो सेकिंड बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। इस त्वरित फैसले में की गयी गलती कई बार खिलाड़ी को भारी भी पड़ जाती है । सम्पादक के लिये भी ऐसे ही क्षण बहुत महत्वपूर्ण होते हैं।
वीरेन्द्र जैन्
शायद उन्हें सचिन के 17000 रन पूरे होने की प्रतीक्षा थी। अपने पिछले जन्मदिन पर लिखे कागद कारे में उन्होंने आगामी मृत्यु को सूंघ लेने के साफ साफ संकेत दे दिये थे।
वे ऐसे इकलौते वरिष्ट सम्पादक विचारक चिंतक और सामाजिक कार्यकर्ता थे जिन्हें समाज राजनीति अर्थ व्यवस्था आदि की बराबरी पर क्रिकेट को रखने में कोई परेशानी नहीं होती थी जबकि हम जैसे कई लोग जब किसी विशेष महत्व के विषय पर उनके धारदार लेख की प्रतीक्षा में जनसत्ता का इंतज़ार कर रहे होते, तब प्रथम पृष्ठ पर उतनी ही धार के साथ क्रिकेट पर उनका लेख देख कर कोफ्त होती थी। बाद में पता चला कि वे एक अखकार के सम्पादक के रूप में जन रुचियों के प्रति कितने सम्वेदन शील थे।
एक बार जब वे भारत भवन में आये थे और बातचीत में उनसे उनके सती प्रथा वाले सम्पादकीय के बारे में जिज्ञासा व्यक्त की तो उन्होंने कहा था कि एक सम्पादक का काम भी एक बेट्स मैन की तरह होता है जिसको एक दो सेकिंड में फैसला ले लेना होता है कि इस आती हुयी बाल को खेलना है छोड़ना है, हिट करना है या डिफेंसिव रहना है! और ये एक दो सेकिंड बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। इस त्वरित फैसले में की गयी गलती कई बार खिलाड़ी को भारी भी पड़ जाती है । सम्पादक के लिये भी ऐसे ही क्षण बहुत महत्वपूर्ण होते हैं।
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श्रद्धांजलि
गुरुवार, 25 जून 2009
वे लोकचेतना में आधुनिकता के अग्रदूत थे
श्रद्धांजलि : डा. सीताकिशोर खरे
गत २४ जून २००९ की रात्रि में डा. सीता किशोर खरे नहीं रहे। वे दतिया जिले की सेंवढा तहसील में गत पचास वर्षो से साधनारत थे। वे इस दौर के उन दुर्लभ साहित्यकारों में से एक थे जो अपनी प्रतिभा के उचे दाम लगवाने के लिए सुविधा के बाजारों की ओर नहीं भागे अपितु अपने जनपद के लोगों के बीच कठिनाइयों से जूझते रहे। उनका गॉंव ही नहीं अपितु वह पूरा इलाका हई डकैत ग्रस्त इलाका रहा है और अपने स्वाभिमान की रक्षा करने तथा नाकारा कानून व्यवस्था से निराश हो सिन्ध और चम्बल के किनारे जंगलों में उतर कर बागी बन जाना व अपना मकसद पाने के लिए सम्पन्नों की लूट कर लेना आम बात है। उन्होंने इस समस्या को राजधानियों के ए.सी. दफ्तरों में बैठने वाले नेताओं अधिकारियों की तरह न देख कर उसके सामाजिक आर्थिक पहलुओं को देखा और उन पर पूरी संवेदना के साथ कलम चलायी जो उनके सातसौ दोहों के “पानी पानी दार है” संग्रह में संग्रहीत हैं-
तकलीफें तलफत रहत, मजबूरी रिरयात
न्याय नियम चुप होत जब, बन्दूकें बतियात
छल जब जब छलकन लगत, बल जब जब बलखात
हल की मुठिया छोड़ कें, हाथ गहत हथियार
और ऐसा इसलिए होता है क्योंकि-
दौलत के दरबार में, मचौ खूब अंधेर
खारिज करी गरीब की अर्जी आज निबेर
जे इनके ऊॅंचे अटा बादर सें बतियात
आसपास की झोपड़ी, इन्हें ना नैक सुहात
सारा का सारा वातावरण ही ऐसा हो गया है कि-
कछु ऐसौ जा भूमि के पानी कौ परताप
मिसरी घोरौ बात में भभका देत षराप
का पानी में घुर गयौ का माटी की भूल
गुठली गाड़त आम की कड़ कड़ भगत बबूल
इसमें जमीन की गुणवत्ता भी अपनी भूमिका अदा करती है-
माटी जा की भुरभुरी, उपजा में कमजोर
कैसें हुइऐं आदमी, मृदुल और गमखोर
३ दिसम्बर १९३५ को दतिया जिले के ग्राम छोटा आलमपुर में जन्मे डा. सीताकिशोर खरे का बचपन में पेड़ से गिरने पर एक हाथ टूट गया था व समय पर समुचित इलाज की सुविधा उपलब्ध न होने से बने जख्म के कारण उसे काटना ही पड़ा था। अपने एक हाथ के सहारे ही वे मीलों साइकिल चलाते हुये शिक्षा ग्रहण करने जाते थे व अपनी प्रतिभा के कारण उन दिनों भी अध्यापक पद के लिए चुन लिये गये जब विकलांगता को चयन के लिए आरक्षण का आधार नहीं मानी जाता था। अध्यापकी करते हुये भी उन्होंने अध्ययन जारी रखा और एमए पीएचडी की व कालेज के लिए चुने गये जहॉं वे हिन्दी के विभागाध्यक्ष रहे। इस बीच उन्होंने न केवल अपने बन्धु बांधवों को ही पढाया अपितु अपने पूरे परिवेश में शिक्षा और ज्ञान की चेतना जगाने के अग्रदूत बने। अपने ज्ञानगुरू डा. राधारमण वैद्य की प्रेरणा से उन्होंने अपने साथियों और सहपाठियों को आगे बढाया और सामूहिक विकास के साथ काम किया जबकि इस दौर में साहित्यकार दूसरों के कंधे पर सवार होकर अपना स्वार्थ हल करते पाये जाते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने भाषा विज्ञान पर बहुत महत्वपूर्ण काम स्वयं किया तथा अपने साथियों सहयोगियों को भी शोध कार्य में मौलिक और महत्वपूर्ण काम करने के लिए प्रेरित किया। “सर्वनाम, अव्यय और कारक चिन्ह” तथा “दतिया जिले की पाण्डुलिपियों का सर्वेक्षण” उनके कार्यों की प्रकाशित पुस्तकें हैं। कभी उन्होंने अपने प्रिय कवि मुकुट बिहारी सरोज के गीतों पर ग्वालियर के एक दैनिक समाचार पत्र में स्तंभ लिखे थे जिनका नाम था- सूत्र सरोज के, टीका सीताकिशोर की। इन आलेखों का संकलन भी अभी हाल ही में प्रकाशित हुआ है।
डा. सीताकिशोर के गीतों में मुकुट बिहारी सरोज वाली खनक और कड़क पायी जाती रही है, जैसे-
कल अधरों की अधरों से
कुछ कहासुनी हो गयी, तभी तो
ये मंजुल मुस्कान बुराई माने है
या
इतनी उमर हो गयी ये सब करते करते
अब की कैसा बीज बो दिया सारी फसल खराब हो गयी
हम तो ये समझे थे अनुभव
तुम से रोज मिला करता है
पूरा था विश्वास कि सूरज
रोज सुबह निकला करता है
ये सब छल फरेब की बातें
तुमको सरल सुभाव हो गयीं
अब की कैसा बीज बो दिया सारी फसल खराब हो गयी
डा. सीताकिशोर बेहद संकोची, विनम्र, पर स्पष्ट थे। उन्हें किसी तरह के भ्रम नहीं थे व उनके सपनों के पॉंव सामाजिक यथार्थ की चादर से बाहर नहीं जाते थे। गलत रूढियों और परम्पराओं के बारे में उनकी समझ साफ थी पर वे उसे लोक चेतना पर थोपते नहीं थे अपितु उसमें स्वाभाविक विकास के पक्षधर थे। उनका जाना एक सामाजिक सचेतक लोकस्वीकृत साहित्य के अग्रदूत का जाना है। उनकी बात का महत्व था। आज के बहुपुरस्कृत और प्रकाशित स्वार्थी साहित्यकारों की भीड़ के बीच उन जैसी प्रतिभा के साथ इन्सानियत के धनी लोग दुर्लभ हो गये हैं।
वीरेन्द्र जैन
गत २४ जून २००९ की रात्रि में डा. सीता किशोर खरे नहीं रहे। वे दतिया जिले की सेंवढा तहसील में गत पचास वर्षो से साधनारत थे। वे इस दौर के उन दुर्लभ साहित्यकारों में से एक थे जो अपनी प्रतिभा के उचे दाम लगवाने के लिए सुविधा के बाजारों की ओर नहीं भागे अपितु अपने जनपद के लोगों के बीच कठिनाइयों से जूझते रहे। उनका गॉंव ही नहीं अपितु वह पूरा इलाका हई डकैत ग्रस्त इलाका रहा है और अपने स्वाभिमान की रक्षा करने तथा नाकारा कानून व्यवस्था से निराश हो सिन्ध और चम्बल के किनारे जंगलों में उतर कर बागी बन जाना व अपना मकसद पाने के लिए सम्पन्नों की लूट कर लेना आम बात है। उन्होंने इस समस्या को राजधानियों के ए.सी. दफ्तरों में बैठने वाले नेताओं अधिकारियों की तरह न देख कर उसके सामाजिक आर्थिक पहलुओं को देखा और उन पर पूरी संवेदना के साथ कलम चलायी जो उनके सातसौ दोहों के “पानी पानी दार है” संग्रह में संग्रहीत हैं-
तकलीफें तलफत रहत, मजबूरी रिरयात
न्याय नियम चुप होत जब, बन्दूकें बतियात
छल जब जब छलकन लगत, बल जब जब बलखात
हल की मुठिया छोड़ कें, हाथ गहत हथियार
और ऐसा इसलिए होता है क्योंकि-
दौलत के दरबार में, मचौ खूब अंधेर
खारिज करी गरीब की अर्जी आज निबेर
जे इनके ऊॅंचे अटा बादर सें बतियात
आसपास की झोपड़ी, इन्हें ना नैक सुहात
सारा का सारा वातावरण ही ऐसा हो गया है कि-
कछु ऐसौ जा भूमि के पानी कौ परताप
मिसरी घोरौ बात में भभका देत षराप
का पानी में घुर गयौ का माटी की भूल
गुठली गाड़त आम की कड़ कड़ भगत बबूल
इसमें जमीन की गुणवत्ता भी अपनी भूमिका अदा करती है-
माटी जा की भुरभुरी, उपजा में कमजोर
कैसें हुइऐं आदमी, मृदुल और गमखोर
३ दिसम्बर १९३५ को दतिया जिले के ग्राम छोटा आलमपुर में जन्मे डा. सीताकिशोर खरे का बचपन में पेड़ से गिरने पर एक हाथ टूट गया था व समय पर समुचित इलाज की सुविधा उपलब्ध न होने से बने जख्म के कारण उसे काटना ही पड़ा था। अपने एक हाथ के सहारे ही वे मीलों साइकिल चलाते हुये शिक्षा ग्रहण करने जाते थे व अपनी प्रतिभा के कारण उन दिनों भी अध्यापक पद के लिए चुन लिये गये जब विकलांगता को चयन के लिए आरक्षण का आधार नहीं मानी जाता था। अध्यापकी करते हुये भी उन्होंने अध्ययन जारी रखा और एमए पीएचडी की व कालेज के लिए चुने गये जहॉं वे हिन्दी के विभागाध्यक्ष रहे। इस बीच उन्होंने न केवल अपने बन्धु बांधवों को ही पढाया अपितु अपने पूरे परिवेश में शिक्षा और ज्ञान की चेतना जगाने के अग्रदूत बने। अपने ज्ञानगुरू डा. राधारमण वैद्य की प्रेरणा से उन्होंने अपने साथियों और सहपाठियों को आगे बढाया और सामूहिक विकास के साथ काम किया जबकि इस दौर में साहित्यकार दूसरों के कंधे पर सवार होकर अपना स्वार्थ हल करते पाये जाते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने भाषा विज्ञान पर बहुत महत्वपूर्ण काम स्वयं किया तथा अपने साथियों सहयोगियों को भी शोध कार्य में मौलिक और महत्वपूर्ण काम करने के लिए प्रेरित किया। “सर्वनाम, अव्यय और कारक चिन्ह” तथा “दतिया जिले की पाण्डुलिपियों का सर्वेक्षण” उनके कार्यों की प्रकाशित पुस्तकें हैं। कभी उन्होंने अपने प्रिय कवि मुकुट बिहारी सरोज के गीतों पर ग्वालियर के एक दैनिक समाचार पत्र में स्तंभ लिखे थे जिनका नाम था- सूत्र सरोज के, टीका सीताकिशोर की। इन आलेखों का संकलन भी अभी हाल ही में प्रकाशित हुआ है।
डा. सीताकिशोर के गीतों में मुकुट बिहारी सरोज वाली खनक और कड़क पायी जाती रही है, जैसे-
कल अधरों की अधरों से
कुछ कहासुनी हो गयी, तभी तो
ये मंजुल मुस्कान बुराई माने है
या
इतनी उमर हो गयी ये सब करते करते
अब की कैसा बीज बो दिया सारी फसल खराब हो गयी
हम तो ये समझे थे अनुभव
तुम से रोज मिला करता है
पूरा था विश्वास कि सूरज
रोज सुबह निकला करता है
ये सब छल फरेब की बातें
तुमको सरल सुभाव हो गयीं
अब की कैसा बीज बो दिया सारी फसल खराब हो गयी
डा. सीताकिशोर बेहद संकोची, विनम्र, पर स्पष्ट थे। उन्हें किसी तरह के भ्रम नहीं थे व उनके सपनों के पॉंव सामाजिक यथार्थ की चादर से बाहर नहीं जाते थे। गलत रूढियों और परम्पराओं के बारे में उनकी समझ साफ थी पर वे उसे लोक चेतना पर थोपते नहीं थे अपितु उसमें स्वाभाविक विकास के पक्षधर थे। उनका जाना एक सामाजिक सचेतक लोकस्वीकृत साहित्य के अग्रदूत का जाना है। उनकी बात का महत्व था। आज के बहुपुरस्कृत और प्रकाशित स्वार्थी साहित्यकारों की भीड़ के बीच उन जैसी प्रतिभा के साथ इन्सानियत के धनी लोग दुर्लभ हो गये हैं।
वीरेन्द्र जैन
लेबल:
जलेस खबर,
जलेस साथी,
दुःख,
विरेन्द्र जैन,
श्रद्धांजलि
शनिवार, 13 जून 2009
गॉंव का नाम थियेटर मोर नाम हबीब
हबीब तनवीर नहीं रहे। वे उम्र के छियासीवें साल में भी नाटक कर रहे थे।अभी पिछले ही दिनो उन्होंने भारत भवन में अपना नाटक चरनदास चोर किया था तथा उसमें भूमिका की थी।
वे इतने विख्यात थे कि सामान्य ज्ञान रखने वाला हर व्यक्ति उनके बारे में सब कुछ जानता रहा है। कौन नहीं जानता कि उनका जन्म रायपुर में हुआ था और तारीख थी १९२३ के सितम्बर की पहली तारीख। उनके पिता हफीज मुहम्मद खान थे। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा रायपुर के लॉरी मारिस हाई स्कूल में हुयी जहॉ से मैट्रिक पास करके आगे पढने के लिए नागपुर गये और १९४४ में इक्कीस वर्ष की उम्र में मेरिस कालेज नागपुर से उन्होंने बीए पास किया। बाद में एमए करने के लिए वे अलीगढ गये जहॉं से एमए का पहला साल पास करने के बाद पढाई छूट गयी। वे नाटक लिखते थे, निर्देशन करते थे, उन्होंने शायरी भी की और अभिनय भी किया। यह सबकुछ उन्होंने अपने प्रदेश और देश के स्तर पर ही नहीं किया अपितु अर्न्तराष्ट्रीय ख्याति भी अर्जित की। वे सम्मानों और पुरस्कारों के पीछे कभी नहीं दौड़े पर सम्मान उनके पास जाकर खुद को सम्मानित महसूस करते होंगे। १९६९ में उन्हें प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला तो १९७२ से १९७८ के दौरान वे देश के सर्वोच्च सदन राज्य सभा के लिए नामित रहे। १९८३ में पद्मश्री मिली, १९९६ में संगीत नाटक अकादमी की फैलोशिप मिली तो २००२ में पद्मभूषण मिला। १९८२ में एडनवर्ग में आयोजित अर्न्तराष्ट्रीय ड्रामा फेस्टीबल में उनके नाटक 'चरनदास चोर' को पहला पुरस्कार मिला।
वे नाटककार के रूप में इतने मशहूर हुये कि अब कम ही लोग जानते हैं कि पेशावर से आये हुये हफीज मुहम्मद खान के बेटे हबीब अहमद खान ने शुरू में शायरी भी की और अपना उपनाम 'तनवीर' रख लिया जिसका मतलब होता है रौशनी या चमक। बाद में उनके कामों की जिस चमक से दुनिया रौशन हुयी उससे पता चलता है कि उन्होंने अपना नाम सही चुना था। कम ही लोगों को पता होगा कि १९४५ में बम्बई में आल इन्डिया रेडियो में प्रोड्यूसर हो गये, पर उनके उस बम्बई जो तब मुम्बई नहीं हुयी थी, जाने के पीछे आल इन्डिया रेडियो की नौकरी नहीं थी अपितु उनका आकर्षण अभिनय का क्षेत्र था। पहले उन्होंने वहॉ फिल्मों में गीत लिखे और कुछ फिल्मों में अभिनय किया। इसी दौरान उनके जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ आया और वे प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ कर इप्टा ( इन्डियन पीपुल्स थियेटर एशोसियेशन)के सक्रिय सदस्य बन गये, पर जब स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इप्टा के नेतृत्वकारी साथियों को जेल जाना पड़ा तो उनसे इप्टा का कार्यभार सम्हालने के लिए कहा गया। ये दिन ही आज के हबीब तनवीर को हबीब तनवीर बनाने के दिन थे। कह सकते हैं कि उनके जीवन की यह एक अगली पाठशाला थी।
१९५४ में वे फिल्मी नगरी को अलविदा कह के दिल्ली आ गये और कदेसिया जैदी के हिन्दुस्तानी थियेटर में काम किया। इस दौरान उन्होंने चिल्ड्रन थियेटर के लिए बहुत काम किया और अनेक नाटक लिखे। इसी दौरान उनकी मुलाकात मोनिका मिश्रा से हुयी जिनसे उन्होंने बाद में विवाह किया। इस विवाह में ना तो पहले धर्म कभी बाधा बना और ना ही बाद में क्योंकि दोनों ही धर्म के नापाक बंधनों से मुक्त हो चुके थे। इसी दौरान उन्होंने गालिब की परंपरा के १८वीं सदी के कवि नजीर अकबराबादी के जीवन पर आधारित नाटक 'आगरा बाजार' का निर्माण किया जिसने बाद में पूरी दूनिया में धूम मचायी। नाटक में उन्होंने जामियामिलिया के छात्रों और ओखला के स्थानीय लोगों के सहयोग और उनके लोकजीवन को सीधे उतार दिया। दुनिया के इतिहास में यह पहला प्रयोग था जिसका मंच सबसे बड़ा था क्योंकि यह नाटक स्थानीय बाजार में मंचित हुआ। सच तो यह है कि इसीकी सफलता के बाद उन्होंने अपने नाटकों में छत्तीसगढ के लोककलाकारों के सहयोग से नाटक करने को प्रोत्साहित किया जिसमें उनमें अपार सफलता मिली।
इस सफलता के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। १९५५ में जब वे कुल इकतीस साल के थे तब वे इंगलैंड गये जहॉं उन्होंने रायल एकेडमी आफ ड्रामटिक आर्ट में अभिनय और निर्देशन का प्रशिक्षण दिया। १९५६ में उन्होंने यही काम ओल्ड विक थियेटर स्कूल के लिए यही काम किया। अगले दो साल उन्होंने पूरे यूरोप का दौरा करके विभिन्न स्थानों पर चल रहे नाटकों की गतिविधियों का अध्ययन किया। वे बर्लिन में लगभग अठारह माह रहे जहॉं उन्हें बर्तोल ब्रेख्त के नाटकों को देखने का अवसर मिला जो बर्नेलियर एन्सेम्बले के निर्देषन में खेले जा रहे थे। इन नाटकों ने हबीब तनवीर को पका दिया और वे अद्वित्तीय बन गये। स्थानीय मुहावरों का नाटकों में प्रयोग करना उन्होंने यहीं से सीखा जिसने उन्हें स्थानीय कलाकारों और उनकी भाषा के मुहावरों के प्रयोग के प्रति जागृत किया। यही कारण है कि उनके नाटक जडों के नाटक की तरह पहचाने गये जो अपनी सरलता और अंदाज में, प्रदर्शन और तकनीक में, तथा मजबूत प्रयोगशीलता में अनूठे रहे।
वतन की वापिसी के बाद उन्होंने नाटकों के लिए टीम जुटायी और प्रदर्षन प्रारंभ किये। १९५८ में उन्होंने छत्तीसगढी में पहला नाटक 'मिट्ठी की गाड़ी' का निर्माण किया जो शूद्रक के संस्कृत नाटक 'मृच्छिकटकम ' का अनुवाद था। इसकी व्यापक सफलता ने उनकी नाटक कम्पनी 'नया थियेटर' की नींव डाली और १९५९ में उन्होंने संयक्त मध्यप्रदेष की राजधानी भोपाल में इसकी स्थापना की। 1970 से 1973 के दौरान उन्होंने पूरी तरह से अपना ध्यान लोक पर केन्द्रित किया और छत्तीसगढ में पुराने नाटकों के साथ इतने प्रयोग किये कि नाटकों के बहुत सारे साधन और तौर तरीकों में क्रान्तिकारी परिवर्तन कर डाले। इसी दौरान उन्होंने पंडवानी गायकी के बारे में भी नाटकों के कई प्रयोग किये। इसी दौरान उन्होंने छत्तीसगढ के नाचा का प्रयोग करते हुये 'गांव का नाम ससुराल, मोर नाम दामाद' की रचना की। बाद में श्याम बेनेगल ने स्मिता पाटिल और लालूराम को लेकर इस पर फिल्म भी बनायी थी।
हबीबजी प्रतिभाशाली थे, सक्षम थे, साहसी थे, प्रयोगधर्मी थे, क्रान्तिकारी थे। उनके 'चरणदास चोर' से लेकर, पोंगा पंडित, जिन लाहौर नहिं देख्या, कामदेव का सपना, बसंत रितु का अपना' जहरीली हवा, राजरक्त समेत अनेकानेक नाटकों में उनकी प्रतिभा दिखायी देती है जिसे दुनिया भर के लोगों ने पहचाना है। उन्होंने रिचर्ड एडिनबरो की फिल्म गांधी से लेकर दस से अधिक फिल्मों में काम किया है तो वहीं २००५ में संजय महर्षि और सुधन्वा देशपांडे ने उन पर एक डाकूमेंटरी बनायी जिसका नाम रखा 'गॉव का नाम थियेटर, मोर नाम हबीब'। यह टाइटिल उनके बारे में बहुत कुछ कह देता है, पर दुनिया की इस इतनी बड़ी शख्सियत के बारे में आप कुछ भी कह लीजिये हमेशा ही कुछ अनकहा छूट ही जायेगा।
वीरेन्द्र जैन
२/१ शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल म.प्र.
फोन ९४२५६७४६२९
वे इतने विख्यात थे कि सामान्य ज्ञान रखने वाला हर व्यक्ति उनके बारे में सब कुछ जानता रहा है। कौन नहीं जानता कि उनका जन्म रायपुर में हुआ था और तारीख थी १९२३ के सितम्बर की पहली तारीख। उनके पिता हफीज मुहम्मद खान थे। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा रायपुर के लॉरी मारिस हाई स्कूल में हुयी जहॉ से मैट्रिक पास करके आगे पढने के लिए नागपुर गये और १९४४ में इक्कीस वर्ष की उम्र में मेरिस कालेज नागपुर से उन्होंने बीए पास किया। बाद में एमए करने के लिए वे अलीगढ गये जहॉं से एमए का पहला साल पास करने के बाद पढाई छूट गयी। वे नाटक लिखते थे, निर्देशन करते थे, उन्होंने शायरी भी की और अभिनय भी किया। यह सबकुछ उन्होंने अपने प्रदेश और देश के स्तर पर ही नहीं किया अपितु अर्न्तराष्ट्रीय ख्याति भी अर्जित की। वे सम्मानों और पुरस्कारों के पीछे कभी नहीं दौड़े पर सम्मान उनके पास जाकर खुद को सम्मानित महसूस करते होंगे। १९६९ में उन्हें प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला तो १९७२ से १९७८ के दौरान वे देश के सर्वोच्च सदन राज्य सभा के लिए नामित रहे। १९८३ में पद्मश्री मिली, १९९६ में संगीत नाटक अकादमी की फैलोशिप मिली तो २००२ में पद्मभूषण मिला। १९८२ में एडनवर्ग में आयोजित अर्न्तराष्ट्रीय ड्रामा फेस्टीबल में उनके नाटक 'चरनदास चोर' को पहला पुरस्कार मिला।
वे नाटककार के रूप में इतने मशहूर हुये कि अब कम ही लोग जानते हैं कि पेशावर से आये हुये हफीज मुहम्मद खान के बेटे हबीब अहमद खान ने शुरू में शायरी भी की और अपना उपनाम 'तनवीर' रख लिया जिसका मतलब होता है रौशनी या चमक। बाद में उनके कामों की जिस चमक से दुनिया रौशन हुयी उससे पता चलता है कि उन्होंने अपना नाम सही चुना था। कम ही लोगों को पता होगा कि १९४५ में बम्बई में आल इन्डिया रेडियो में प्रोड्यूसर हो गये, पर उनके उस बम्बई जो तब मुम्बई नहीं हुयी थी, जाने के पीछे आल इन्डिया रेडियो की नौकरी नहीं थी अपितु उनका आकर्षण अभिनय का क्षेत्र था। पहले उन्होंने वहॉ फिल्मों में गीत लिखे और कुछ फिल्मों में अभिनय किया। इसी दौरान उनके जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ आया और वे प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ कर इप्टा ( इन्डियन पीपुल्स थियेटर एशोसियेशन)के सक्रिय सदस्य बन गये, पर जब स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इप्टा के नेतृत्वकारी साथियों को जेल जाना पड़ा तो उनसे इप्टा का कार्यभार सम्हालने के लिए कहा गया। ये दिन ही आज के हबीब तनवीर को हबीब तनवीर बनाने के दिन थे। कह सकते हैं कि उनके जीवन की यह एक अगली पाठशाला थी।
१९५४ में वे फिल्मी नगरी को अलविदा कह के दिल्ली आ गये और कदेसिया जैदी के हिन्दुस्तानी थियेटर में काम किया। इस दौरान उन्होंने चिल्ड्रन थियेटर के लिए बहुत काम किया और अनेक नाटक लिखे। इसी दौरान उनकी मुलाकात मोनिका मिश्रा से हुयी जिनसे उन्होंने बाद में विवाह किया। इस विवाह में ना तो पहले धर्म कभी बाधा बना और ना ही बाद में क्योंकि दोनों ही धर्म के नापाक बंधनों से मुक्त हो चुके थे। इसी दौरान उन्होंने गालिब की परंपरा के १८वीं सदी के कवि नजीर अकबराबादी के जीवन पर आधारित नाटक 'आगरा बाजार' का निर्माण किया जिसने बाद में पूरी दूनिया में धूम मचायी। नाटक में उन्होंने जामियामिलिया के छात्रों और ओखला के स्थानीय लोगों के सहयोग और उनके लोकजीवन को सीधे उतार दिया। दुनिया के इतिहास में यह पहला प्रयोग था जिसका मंच सबसे बड़ा था क्योंकि यह नाटक स्थानीय बाजार में मंचित हुआ। सच तो यह है कि इसीकी सफलता के बाद उन्होंने अपने नाटकों में छत्तीसगढ के लोककलाकारों के सहयोग से नाटक करने को प्रोत्साहित किया जिसमें उनमें अपार सफलता मिली।
इस सफलता के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। १९५५ में जब वे कुल इकतीस साल के थे तब वे इंगलैंड गये जहॉं उन्होंने रायल एकेडमी आफ ड्रामटिक आर्ट में अभिनय और निर्देशन का प्रशिक्षण दिया। १९५६ में उन्होंने यही काम ओल्ड विक थियेटर स्कूल के लिए यही काम किया। अगले दो साल उन्होंने पूरे यूरोप का दौरा करके विभिन्न स्थानों पर चल रहे नाटकों की गतिविधियों का अध्ययन किया। वे बर्लिन में लगभग अठारह माह रहे जहॉं उन्हें बर्तोल ब्रेख्त के नाटकों को देखने का अवसर मिला जो बर्नेलियर एन्सेम्बले के निर्देषन में खेले जा रहे थे। इन नाटकों ने हबीब तनवीर को पका दिया और वे अद्वित्तीय बन गये। स्थानीय मुहावरों का नाटकों में प्रयोग करना उन्होंने यहीं से सीखा जिसने उन्हें स्थानीय कलाकारों और उनकी भाषा के मुहावरों के प्रयोग के प्रति जागृत किया। यही कारण है कि उनके नाटक जडों के नाटक की तरह पहचाने गये जो अपनी सरलता और अंदाज में, प्रदर्शन और तकनीक में, तथा मजबूत प्रयोगशीलता में अनूठे रहे।
वतन की वापिसी के बाद उन्होंने नाटकों के लिए टीम जुटायी और प्रदर्षन प्रारंभ किये। १९५८ में उन्होंने छत्तीसगढी में पहला नाटक 'मिट्ठी की गाड़ी' का निर्माण किया जो शूद्रक के संस्कृत नाटक 'मृच्छिकटकम ' का अनुवाद था। इसकी व्यापक सफलता ने उनकी नाटक कम्पनी 'नया थियेटर' की नींव डाली और १९५९ में उन्होंने संयक्त मध्यप्रदेष की राजधानी भोपाल में इसकी स्थापना की। 1970 से 1973 के दौरान उन्होंने पूरी तरह से अपना ध्यान लोक पर केन्द्रित किया और छत्तीसगढ में पुराने नाटकों के साथ इतने प्रयोग किये कि नाटकों के बहुत सारे साधन और तौर तरीकों में क्रान्तिकारी परिवर्तन कर डाले। इसी दौरान उन्होंने पंडवानी गायकी के बारे में भी नाटकों के कई प्रयोग किये। इसी दौरान उन्होंने छत्तीसगढ के नाचा का प्रयोग करते हुये 'गांव का नाम ससुराल, मोर नाम दामाद' की रचना की। बाद में श्याम बेनेगल ने स्मिता पाटिल और लालूराम को लेकर इस पर फिल्म भी बनायी थी।
हबीबजी प्रतिभाशाली थे, सक्षम थे, साहसी थे, प्रयोगधर्मी थे, क्रान्तिकारी थे। उनके 'चरणदास चोर' से लेकर, पोंगा पंडित, जिन लाहौर नहिं देख्या, कामदेव का सपना, बसंत रितु का अपना' जहरीली हवा, राजरक्त समेत अनेकानेक नाटकों में उनकी प्रतिभा दिखायी देती है जिसे दुनिया भर के लोगों ने पहचाना है। उन्होंने रिचर्ड एडिनबरो की फिल्म गांधी से लेकर दस से अधिक फिल्मों में काम किया है तो वहीं २००५ में संजय महर्षि और सुधन्वा देशपांडे ने उन पर एक डाकूमेंटरी बनायी जिसका नाम रखा 'गॉव का नाम थियेटर, मोर नाम हबीब'। यह टाइटिल उनके बारे में बहुत कुछ कह देता है, पर दुनिया की इस इतनी बड़ी शख्सियत के बारे में आप कुछ भी कह लीजिये हमेशा ही कुछ अनकहा छूट ही जायेगा।
वीरेन्द्र जैन
२/१ शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल म.प्र.
फोन ९४२५६७४६२९
लेबल:
विरेन्द्र जैन,
श्रद्धांजलि,
स्मृति
मंगलवार, 9 जून 2009
दुर्घटना दर दुर्घटना - एक क्षोभ भरा दिन
मैं जब सुबह घूमने जाता हूँ तब साथ में मोबाइल नहीं ले जाता ताकि कम से कम एक घंटा तो सुकून से गुजर सके। 8 जून की सुबह जब घूम कर लौटा तो ताला खोलते ही मोबाइल की घंटी सुनाई दी। इतने सुबह मोबाइल पर घंटी आना वैसा ही लगता है जैसे कभी लोगों को तार आने पर लगता होगा। दौड़ कर मोबाइल उठाया और बिना यह देखे कि किस नम्बर से घंटी आ रही है, सुनने के लिए बटन दबा दिया। दूसरी तरफ देश के विख्यात कवि पूर्वसांसद उदयप्रताप सिंह थे। उन्होंने पूछा कहां थे बहुत देर से घंटी कर रहा हूँ, अच्छा सुनो सुबह सुबह तुम्हारे भोपाल में एक कार एक्सीडेंट हो गया है जिसमें कवि ओमप्रकाश आदित्य, नीरजपुरी, और लाढसिंह गुर्जर नहीं रहे व ओम व्यास और जॉनी बैरागी गम्भीर रूप से घायल हैं। ये लोग विदिशा कवि सम्मेलन से लौट रहे थे। इसलिए तुरंत ही वहाँ के पीपुल्स हास्पिटल पहुँचो।
मैं सन्न रह गया मैंने पूछा आप कहाँ पर हैं? वे बोले मैं तो दिल्ली में हूँ, वहाँ से अभी अभी अशोक ने खबर दी है। इतना कह कर उन्होंने फोन बन्द कर दिया, संभवत: दूसरों को जरूरी सूचना देने के लिये। पता नहीं चला कि और कौन कौन था एक्सीडेंट किससे हुआ। मैंने अस्पताल जाने से पहले कविमित्र माणिकवर्मा जी की खोज खबर लेनी जरूरी समझी जो थोड़ी ही दूर पर रहते हैं। फोन उनके यहाँ काम करने वाले लड़के ने अटैंड किया और नाम पूछने के बाद बताया कि वे बाथरूम में हैं। मैंने पूछा कि कल विदिशा तो नहीं गये थे तो उसने कहा नहीं। थोड़ी राहत की सांस लेकर मैंने कहा कि बाहर आ जायें तो बात करा देना। मैं तेजी से तैयार हुआ एक मिनिट के लिए अखबार के मुखपृष्ठ पर नजर डाली पर घटना एकदम सुबह की थी और अखबार छपने के बाद की थी इसलिए कहीं कोई खबर होने का सवाल ही नहीं उठता था। बाहर आकर देखा कि स्कूटर अचलनीय स्थिति में है इसलिए तुरंत ही सोचा कि क्यों न कवि मित्र राम मेश्राम से चलने का आग्रह किया जाये और उनकी कार से ही चलें। फोन किया तो वे तुरंत ही तैयार हो गये। किसी तरह उनके घर पहुँचा तो उनकी कार ने भी स्टार्ट हाने में थोड़े नखरे दिखाये पर अंतत: वह चल निकली। वहाँ बाहर प्रदीपचौबे अशोक चक्रधर पूर्व विधायक सुनीलम राजुरकर राज समेत कमिशनर भोपाल, संस्कृति मंत्री , संस्कृति सचिव, आईजी पूलिस आदि उपस्थित थे। पता चला कि मृत देहें तो पोस्टमार्टम और फिर उनके गृह नगर भेजे जाने के लिए सरकारी हमीदिया अस्पताल भेजी जा चुकी हैं और वहाँ पर घायलों को बचाने के भरसक प्रयत्न हो रहे हैं। घायलों में ओम व्यास की हालत काफी गम्भीर है तथा जानी बैरागी, भारत भवन के फोटोग्राफर विजय रोहतगी तथा गाड़ी का ड्राइवर खेमचंद खतरे से बाहर है। मंत्री और वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्तिथि के कारण अस्पताल प्रबंधन भी सक्रिय होकर रूचि ले रहा था व अस्पताल के मैनेजिंग डायरेक्टर स्वयं वहाँ पर थे। लगभग सारे ही उपस्थित लोग लगातार फोन पर बात कर रहे थे इसका असर यह हुआ था कि हम जैसे अनेक लोग वहाँ पर पहुँच सके थे। लगभग एक घंटे वहाँ रूकने के बाद हम लोग हमीदिया अस्पताल की ओर आये जहाँ मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग के डायरेक्टर श्रीराम तिवारी और असिसटेंट डायरेक्टर सुरेश तिवारी समेत लगभग पूरा संस्कृति विभाग उपस्तिथ था। पोस्टमार्टम पूरा हो चुका था और ताबूतों में शव रखे जाने थे, पर ताबूत उठाने वाला कोई नहीं था, एक पुलिस कानिस्टबल झुंझला कर कह रहा था कि ताबूत भी पुलिस ही उठाये। मेंने उसे सहायता देते हुये समझाया कि ये दुर्घटना है और ये सब सरकारी अधिकारी हैं, ये अपने हाथ से ताबूत तो क्या पानी का गिलास भी नहीं उठाते इसलिए मदद तो करनी ही पड़ेगी। उसी समय सूचना मिली कि हबीब तनवीर साहब भी नहीं रहे तो हम लोग ताबूतों को वाहनों में रखवा कर सीधे श्यामला हिल्स के अंसल अपार्टमेंट्स की ओर तेजी से चल दिये। वहाँ हबीब साहब की मृत देह आ चुकी थी और कमला प्रसाद, लज्जाशांकर हरदेनिया मनोज कुलकर्णी, जया मेहता, समेत दसबीस रंगकर्मी उपस्थित थे। जानकर आशचर्य और दुख हुआ कि हबीबजी के साथ काम करने वाले रंगकर्मियों में से भी कुछ अब तक मजहबी बने हुये थे और कोई कह रहा था कि पैर काबे की ओर नहीं करते या गुशल कराना चाहिये। लगता था कि अगले दिन उनके अंतिम संस्कार होने तक वे लोग हबीब जी की देह के साथ वे सब मजहबी खिलवाड़ कर लेना चाहते थे जो उन्होंने जिन्दगी भर नहीं किये थे।
एक कामरेड की देह को साम्प्रदायिक मुस्लिम, मुसलमान बना कर साम्प्रदायिक हिंदुओं के इस तर्क को बल दे रहे थे कि हबीब तनवीर ने पोंगा पंडित नाटक एक मुसलमान की तरह किया था और हिन्दू देवी देवताओं का अपमान किया था।
आठ जून सचमुच मेरे लिए गहरे क्षोभ का दिन रहा।
वीरेन्द्र जैन
मैं सन्न रह गया मैंने पूछा आप कहाँ पर हैं? वे बोले मैं तो दिल्ली में हूँ, वहाँ से अभी अभी अशोक ने खबर दी है। इतना कह कर उन्होंने फोन बन्द कर दिया, संभवत: दूसरों को जरूरी सूचना देने के लिये। पता नहीं चला कि और कौन कौन था एक्सीडेंट किससे हुआ। मैंने अस्पताल जाने से पहले कविमित्र माणिकवर्मा जी की खोज खबर लेनी जरूरी समझी जो थोड़ी ही दूर पर रहते हैं। फोन उनके यहाँ काम करने वाले लड़के ने अटैंड किया और नाम पूछने के बाद बताया कि वे बाथरूम में हैं। मैंने पूछा कि कल विदिशा तो नहीं गये थे तो उसने कहा नहीं। थोड़ी राहत की सांस लेकर मैंने कहा कि बाहर आ जायें तो बात करा देना। मैं तेजी से तैयार हुआ एक मिनिट के लिए अखबार के मुखपृष्ठ पर नजर डाली पर घटना एकदम सुबह की थी और अखबार छपने के बाद की थी इसलिए कहीं कोई खबर होने का सवाल ही नहीं उठता था। बाहर आकर देखा कि स्कूटर अचलनीय स्थिति में है इसलिए तुरंत ही सोचा कि क्यों न कवि मित्र राम मेश्राम से चलने का आग्रह किया जाये और उनकी कार से ही चलें। फोन किया तो वे तुरंत ही तैयार हो गये। किसी तरह उनके घर पहुँचा तो उनकी कार ने भी स्टार्ट हाने में थोड़े नखरे दिखाये पर अंतत: वह चल निकली। वहाँ बाहर प्रदीपचौबे अशोक चक्रधर पूर्व विधायक सुनीलम राजुरकर राज समेत कमिशनर भोपाल, संस्कृति मंत्री , संस्कृति सचिव, आईजी पूलिस आदि उपस्थित थे। पता चला कि मृत देहें तो पोस्टमार्टम और फिर उनके गृह नगर भेजे जाने के लिए सरकारी हमीदिया अस्पताल भेजी जा चुकी हैं और वहाँ पर घायलों को बचाने के भरसक प्रयत्न हो रहे हैं। घायलों में ओम व्यास की हालत काफी गम्भीर है तथा जानी बैरागी, भारत भवन के फोटोग्राफर विजय रोहतगी तथा गाड़ी का ड्राइवर खेमचंद खतरे से बाहर है। मंत्री और वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्तिथि के कारण अस्पताल प्रबंधन भी सक्रिय होकर रूचि ले रहा था व अस्पताल के मैनेजिंग डायरेक्टर स्वयं वहाँ पर थे। लगभग सारे ही उपस्थित लोग लगातार फोन पर बात कर रहे थे इसका असर यह हुआ था कि हम जैसे अनेक लोग वहाँ पर पहुँच सके थे। लगभग एक घंटे वहाँ रूकने के बाद हम लोग हमीदिया अस्पताल की ओर आये जहाँ मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग के डायरेक्टर श्रीराम तिवारी और असिसटेंट डायरेक्टर सुरेश तिवारी समेत लगभग पूरा संस्कृति विभाग उपस्तिथ था। पोस्टमार्टम पूरा हो चुका था और ताबूतों में शव रखे जाने थे, पर ताबूत उठाने वाला कोई नहीं था, एक पुलिस कानिस्टबल झुंझला कर कह रहा था कि ताबूत भी पुलिस ही उठाये। मेंने उसे सहायता देते हुये समझाया कि ये दुर्घटना है और ये सब सरकारी अधिकारी हैं, ये अपने हाथ से ताबूत तो क्या पानी का गिलास भी नहीं उठाते इसलिए मदद तो करनी ही पड़ेगी। उसी समय सूचना मिली कि हबीब तनवीर साहब भी नहीं रहे तो हम लोग ताबूतों को वाहनों में रखवा कर सीधे श्यामला हिल्स के अंसल अपार्टमेंट्स की ओर तेजी से चल दिये। वहाँ हबीब साहब की मृत देह आ चुकी थी और कमला प्रसाद, लज्जाशांकर हरदेनिया मनोज कुलकर्णी, जया मेहता, समेत दसबीस रंगकर्मी उपस्थित थे। जानकर आशचर्य और दुख हुआ कि हबीबजी के साथ काम करने वाले रंगकर्मियों में से भी कुछ अब तक मजहबी बने हुये थे और कोई कह रहा था कि पैर काबे की ओर नहीं करते या गुशल कराना चाहिये। लगता था कि अगले दिन उनके अंतिम संस्कार होने तक वे लोग हबीब जी की देह के साथ वे सब मजहबी खिलवाड़ कर लेना चाहते थे जो उन्होंने जिन्दगी भर नहीं किये थे।
एक कामरेड की देह को साम्प्रदायिक मुस्लिम, मुसलमान बना कर साम्प्रदायिक हिंदुओं के इस तर्क को बल दे रहे थे कि हबीब तनवीर ने पोंगा पंडित नाटक एक मुसलमान की तरह किया था और हिन्दू देवी देवताओं का अपमान किया था।
आठ जून सचमुच मेरे लिए गहरे क्षोभ का दिन रहा।
वीरेन्द्र जैन
लेबल:
जलेस खबर,
दुःख,
विरेन्द्र जैन,
श्रद्धांजलि,
स्मृति
सोमवार, 8 जून 2009
हबीब तनवीर नहीं रहे
"पोंगा पंडित", "जिस लाहोर नहीं देख्यों", "चरणदास चोर", "आगरा बाजार" जैसे नाटको को मंचित-निर्देशीत करने वाले वरिष्ठ रंगकर्मी हबीब तनवीर के निधन पर जनवादी लेखक संघ, इन्दौर अफसोस जाहिर करता है।
लेबल:
दुःख,
नीव का पत्थर,
श्रद्धांजलि,
स्मृति
रविवार, 12 अप्रैल 2009
श्रद्धांजलि: क्योंकि उनका नाम नईम था

नईम जी नहीं रहे। उनकी मृत्यु अप्रत्याशित नहीं थी अपितु प्रतीक्षित थी।
प्रसिद्ध युवा व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी जिन्होंने अपना व्यंग्य उपन्यास उन्हें ही समर्पित किया था व लिखा था 'पिता तुल्य नईमजी को सादर'। ज्ञान एक अच्छे साहित्यकार ही नहीं अच्छे डाक्टर भी हैं और ह्रदय रोग विशोषज्ञ हैं। मैंने जब नईमजी की बीमारी और उनके अस्पताल में भरती होने की खबर पढी तो सबसे पहला हाथ मेरा टेलीफोन पर ही गया तथा ज्ञान चतुर्वेदी को फोन लगा कर पूछा तो जैसा कि विशवास था उन्हें न केवल पूरी जानकारी ही थी अपितु उनकी पल पल की खबर वे रख रहे थे। उस समय भी ज्ञान का कहना था कि अब वे जिस दशा में हैं, उसमें उन्हें कोई चमत्कार ही बचा सकता है अगर अस्पताल से ठीक होकर वापिस भी आ गये तो भी जीवन निर्जीव सा ही रहेगा। ज्ञान अपने चिकित्सकीय पेशे में भावुक नहीं होते अपितु यथार्थ को बहुत साफ साफ कहते हैं। वे कम ही लोगों को सम्मान दते हैं पर नईमजी को पिता के समान सम्मान देते थे जिसका मैं प्रत्यक्ष गवाह हूँ। पर उस यथार्थ का वे भी क्या करते जो सामने था और उनकी मेडिकल साइंस में साफ दिख रहा था।
एक दूसरे कवि मित्र राम मेश्राम जो मध्यप्रदेश शासन से एक वरिष्ठ अधिकारी के रूप में सेवानिवृत्त हो चुके हैं व अपने सहकर्मी- अधिकारियों के स्वभाव के विपरीत अपनी ईमानदारी, निष्पक्षता, भावुकता और दूसरों की नि:स्वार्थ सहायता के लिए लगभग बदनाम हैं, को फोन लगाया तो पता चला कि खबर उन्हें भी पहले से ही है व संस्कृति सचिव से मिल कर उनकी सहायता के लिए आवेदन भिजवा चुके हैं व उन्हें उम्मीद है कि सहायता स्वीकृत भी हो जायेगी।
एक तीसरे व वरिष्ठ अधिकारी मित्र को फोन लगाकर सूचना दी और जानना चाहा कि यदि आजकल में उनका इंदौर का दौरा होने वाला हो तो मैं उनके साथ इंदौर तक की लिफ्ट लेकर नईमजी को देख आना चाहता हूँ। उनका उत्तर था कि वे परसों ही होकर आये हैं व उनकी दशा अच्छी नहीं कही जा सकती। ये कुछ उदाहरण हिन्दी के शिखरतम नवगीतकार नईमजी की लोकप्रियता और रिशतों के हैं। मैं स्वयं अपने को उनके निकट मानता था पर अगर सूची बनायी जाये तो यह कई हजार तक जा सकती है व इस पंक्ति में कौन कहाँ खड़ा होगा यह कहना बहुत कठिन है।
इस बीच में खबर आती है कि श्री राम मेश्राम के प्रयास सफल हुये हैं व शासन ने नईमजी की स्वास्थ सहायता के लिए एक लाख रूपये की राशि स्वीकृत कर दी है। इस खबर आने के अगले ही दिन बाद मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा नईमजी को देखने जाने व वहीं उक्त राशि विधिवत घोषित होने की खबर आती है जिससे संतोष मिलता है कि प्रति दिन हजारों रूपयों में होने वाले खर्च से कुछ तो राहत मिलेगी। चारण किस्म के कुछ संस्थाबाज अपने आयोजनों में मुख्यमंत्री, संस्कृतिमंत्री और संस्कृति सचिव की जयजयकार करने लगते हैं।
पर यह संतोष का भाव ज्यादा दिन नहीं ठहरता क्योंकि आठ दस दिन बाद ही खबर आती है कि सहायता नहीं पहुँची और उसे आचार संहिता लगने तक विलंबित किया गया व बाद में आचारसंहिता का बहाना बना लिया गया। मध्यप्रदेश में इन दिनों जो सरकार है उससे ऐसी हरकत की ही उम्मीद की जा सकती थी। और हो भी क्यों न क्योंकि नईमजी जिस लेखन के लिए देश भर में जाने जाते थे वह किसी फासिस्ट सरकार को हजम होने वाली चीज नहीं है। उनके गीतों की कुछ पंक्तियों से यह स्पष्ट हो जायेगा-
1
वो तो ये है कि अबोदाना है
बरना ये घर कसाई खाना है
आप झटका, हलाल के कायल
जान तो लोगो मेरी जाना है
2
काशी साधे नहीं सध रही
चलो कबीरा मगहर साधो
सौदा सुलफ कर लिया हो तो
उठ कर अपनी गठरी बांधो
इस बस्ती के बािशिंदे हम
लेकिन सब के सब अनिवासी
फिर चाहे राजे रानी हों
या फिर चाहे हों दासी
कै दिन की लकड़ी की हांड़ी
क्योंकर इसमें खिचड़ी रांधो
राजे बेईमान
बजीरा बे पेंदी के लोटे
छाये हुये चलन में सिक्के
बड़े ठाठ से खोटे
ठगी पिंडारी के मारे सब
सौदागर हो गये हताहत
चलो कबीरा
ठगुये तस्कर साधो
काशाी साधे नहीं सध रही
चलो कबीरा मगहर साधो
3
प्यासे को पानी
भूखे को दो रोटी
मौला दे! दाता दे
आसमान की बात न जानूँ
जनगण भाग्य विधाता दे
धरती और आकाश न मांगूं
या ईशवरीय प्रकाश न मांगूं
मांगे हूँ दो गज जमीन बस
मैं शााही आवास न मांगूं
पावों को पनहीं
परधनियां मोंटी सोंटी
सिर को साफा छाता दे
4
चिटठी पत्री खतोकिताबत के मौसम कब फिर आयेंगे
रब्बा जाने!
सही इबादत के मौसम
कब फिर आयेंगे
रब्बा जाने!
चेहरे झुलस गये कौमों के लू लपटों में
गंध चिरायंध की आती छपती रपटों में
युद्धक्षेत्र से क्या कम है ये मुल्क हमारा
इससे बदतर
किसी कयामत के मौसम
कब फिर आयेंगे
रब्बा जाने!
अब आप ही बताइये कि ऐसे गीत लिखने वाले नईम साहब को इलाज कराने के लिए वह सरकार क्यों आगे आयेगी जो अपना सारा ध्यान समाज को बांटने में लगाना चाहती है जिसने अरबों रूपयों की जमीन उन स्कूलों और संस्थाओं को दी है जो नफरत फैलाने के उद्योग चला रही हैं व जिसकी सारी राजनीति ही समाज को बांटने पर टिकी हुयी है। ढीलाढाला पापलीन का पाजामा कुर्ता पहिनने वाले नईम साहब किसी दुकान के बनिये से नजर आते थे भले ही वे कालेज के प्राचार्य रह चुके हों, उनके सारे ही गीत विशुद्ध हिंदी के गीत हों और जो अपने छूट गये बुन्देलखण्ड की याद को मालवा की धरती पर भी भुला न पाये हों। जिनको अपने सगे रिशतों से भी बढ कर सम्मान देने वालों में देश के वे बड़े से बड़े साहित्यकार हों जो जिनका जन्म गैर मुस्लिम परिवार में हुआ हो। सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी जिनके सगे साढू भाई हों और साम्प्रदायिक मुसलमान इसलिए तक नाराज हो जाते हों कि उनकी लड़की बिन्दी क्यों लगाती है। जो काष्ठशिल्प की मूर्तियां गढता हो तथा दुनिया भर के प्रगतीशील जनवादी उसे अपना बुजुर्ग मानते हों। और फिर उसका नाम भी नईम हो तो वो स्वाभाविक रूप से इस सरकार के लिए खतरनाक हो सकता है। भले ही प्रचारक अधिकारी ने सस्ती लोकप्रियता के लिए मुख्यमंत्री से घोषणा करवा दी हो पर इस सरकार की असली चाबी तो कहीं और रहती है जब तक वहाँ से अनुमति नहीं मिल जाती तब तक क्या हो सकता है!
वैसे भी सरकारों की कही कितनी बातें सच होती हैं।
एक दूसरे कवि मित्र राम मेश्राम जो मध्यप्रदेश शासन से एक वरिष्ठ अधिकारी के रूप में सेवानिवृत्त हो चुके हैं व अपने सहकर्मी- अधिकारियों के स्वभाव के विपरीत अपनी ईमानदारी, निष्पक्षता, भावुकता और दूसरों की नि:स्वार्थ सहायता के लिए लगभग बदनाम हैं, को फोन लगाया तो पता चला कि खबर उन्हें भी पहले से ही है व संस्कृति सचिव से मिल कर उनकी सहायता के लिए आवेदन भिजवा चुके हैं व उन्हें उम्मीद है कि सहायता स्वीकृत भी हो जायेगी।
एक तीसरे व वरिष्ठ अधिकारी मित्र को फोन लगाकर सूचना दी और जानना चाहा कि यदि आजकल में उनका इंदौर का दौरा होने वाला हो तो मैं उनके साथ इंदौर तक की लिफ्ट लेकर नईमजी को देख आना चाहता हूँ। उनका उत्तर था कि वे परसों ही होकर आये हैं व उनकी दशा अच्छी नहीं कही जा सकती। ये कुछ उदाहरण हिन्दी के शिखरतम नवगीतकार नईमजी की लोकप्रियता और रिशतों के हैं। मैं स्वयं अपने को उनके निकट मानता था पर अगर सूची बनायी जाये तो यह कई हजार तक जा सकती है व इस पंक्ति में कौन कहाँ खड़ा होगा यह कहना बहुत कठिन है।
इस बीच में खबर आती है कि श्री राम मेश्राम के प्रयास सफल हुये हैं व शासन ने नईमजी की स्वास्थ सहायता के लिए एक लाख रूपये की राशि स्वीकृत कर दी है। इस खबर आने के अगले ही दिन बाद मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा नईमजी को देखने जाने व वहीं उक्त राशि विधिवत घोषित होने की खबर आती है जिससे संतोष मिलता है कि प्रति दिन हजारों रूपयों में होने वाले खर्च से कुछ तो राहत मिलेगी। चारण किस्म के कुछ संस्थाबाज अपने आयोजनों में मुख्यमंत्री, संस्कृतिमंत्री और संस्कृति सचिव की जयजयकार करने लगते हैं।
पर यह संतोष का भाव ज्यादा दिन नहीं ठहरता क्योंकि आठ दस दिन बाद ही खबर आती है कि सहायता नहीं पहुँची और उसे आचार संहिता लगने तक विलंबित किया गया व बाद में आचारसंहिता का बहाना बना लिया गया। मध्यप्रदेश में इन दिनों जो सरकार है उससे ऐसी हरकत की ही उम्मीद की जा सकती थी। और हो भी क्यों न क्योंकि नईमजी जिस लेखन के लिए देश भर में जाने जाते थे वह किसी फासिस्ट सरकार को हजम होने वाली चीज नहीं है। उनके गीतों की कुछ पंक्तियों से यह स्पष्ट हो जायेगा-
1
वो तो ये है कि अबोदाना है
बरना ये घर कसाई खाना है
आप झटका, हलाल के कायल
जान तो लोगो मेरी जाना है
2
काशी साधे नहीं सध रही
चलो कबीरा मगहर साधो
सौदा सुलफ कर लिया हो तो
उठ कर अपनी गठरी बांधो
इस बस्ती के बािशिंदे हम
लेकिन सब के सब अनिवासी
फिर चाहे राजे रानी हों
या फिर चाहे हों दासी
कै दिन की लकड़ी की हांड़ी
क्योंकर इसमें खिचड़ी रांधो
राजे बेईमान
बजीरा बे पेंदी के लोटे
छाये हुये चलन में सिक्के
बड़े ठाठ से खोटे
ठगी पिंडारी के मारे सब
सौदागर हो गये हताहत
चलो कबीरा
ठगुये तस्कर साधो
काशाी साधे नहीं सध रही
चलो कबीरा मगहर साधो
3
प्यासे को पानी
भूखे को दो रोटी
मौला दे! दाता दे
आसमान की बात न जानूँ
जनगण भाग्य विधाता दे
धरती और आकाश न मांगूं
या ईशवरीय प्रकाश न मांगूं
मांगे हूँ दो गज जमीन बस
मैं शााही आवास न मांगूं
पावों को पनहीं
परधनियां मोंटी सोंटी
सिर को साफा छाता दे
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चिटठी पत्री खतोकिताबत के मौसम कब फिर आयेंगे
रब्बा जाने!
सही इबादत के मौसम
कब फिर आयेंगे
रब्बा जाने!
चेहरे झुलस गये कौमों के लू लपटों में
गंध चिरायंध की आती छपती रपटों में
युद्धक्षेत्र से क्या कम है ये मुल्क हमारा
इससे बदतर
किसी कयामत के मौसम
कब फिर आयेंगे
रब्बा जाने!
अब आप ही बताइये कि ऐसे गीत लिखने वाले नईम साहब को इलाज कराने के लिए वह सरकार क्यों आगे आयेगी जो अपना सारा ध्यान समाज को बांटने में लगाना चाहती है जिसने अरबों रूपयों की जमीन उन स्कूलों और संस्थाओं को दी है जो नफरत फैलाने के उद्योग चला रही हैं व जिसकी सारी राजनीति ही समाज को बांटने पर टिकी हुयी है। ढीलाढाला पापलीन का पाजामा कुर्ता पहिनने वाले नईम साहब किसी दुकान के बनिये से नजर आते थे भले ही वे कालेज के प्राचार्य रह चुके हों, उनके सारे ही गीत विशुद्ध हिंदी के गीत हों और जो अपने छूट गये बुन्देलखण्ड की याद को मालवा की धरती पर भी भुला न पाये हों। जिनको अपने सगे रिशतों से भी बढ कर सम्मान देने वालों में देश के वे बड़े से बड़े साहित्यकार हों जो जिनका जन्म गैर मुस्लिम परिवार में हुआ हो। सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी जिनके सगे साढू भाई हों और साम्प्रदायिक मुसलमान इसलिए तक नाराज हो जाते हों कि उनकी लड़की बिन्दी क्यों लगाती है। जो काष्ठशिल्प की मूर्तियां गढता हो तथा दुनिया भर के प्रगतीशील जनवादी उसे अपना बुजुर्ग मानते हों। और फिर उसका नाम भी नईम हो तो वो स्वाभाविक रूप से इस सरकार के लिए खतरनाक हो सकता है। भले ही प्रचारक अधिकारी ने सस्ती लोकप्रियता के लिए मुख्यमंत्री से घोषणा करवा दी हो पर इस सरकार की असली चाबी तो कहीं और रहती है जब तक वहाँ से अनुमति नहीं मिल जाती तब तक क्या हो सकता है!
वैसे भी सरकारों की कही कितनी बातें सच होती हैं।
वीरेन्द्र जैन
21 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629
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गुरुवार, 9 अप्रैल 2009
नवगीतकार नईम का जाना दुखी कर गया
नवगीत के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर , गज़लकार एवं काष्ठशिल्पी नईम लंबे समय से बीमार थे । वे इंदौर के एक निजी अस्पताल में इलाज के दौरान आज दिनांक ९.०४.२००९ को इस दुनिया में नहीं रहे । वे देवास में रहे । देवास को उन्होंने अपनी कर्मभूमि बनाया । हिन्दी साहित्य में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा । वे आज हमारे बीच नहीं है। लेकिन उनका लेखन हमेशा हमारे बीच उन्हें मौजूद रखेगा । उन्हें हम सभी साहित्यिक साथियों की और से विनम्र अश्रुपूरित श्रद्धांजलि पेश है । उन्हें दिनांक १०.०४.२००९ शुक्रवार को सुबह ११ बजे अन्तिम बिदाई दी जायेगी ।
श्रद्धांजलि देते हुए उनका एक गीत प्रस्तुत है।
नवगीत
खाली हाथ लिए आया था
खाली ही दिन चला गया ।
वो क्या आया, हम ही बस यूँ ही आये थे
भीतर से आधे बाहर से किंतु सवाये थे
फंसा निरर्थकता के पाटों में
अपने हाथों दला गया ।
राजी नहीं हुआ भरने को अपना ही मन,
हुआ माटिया हाथ लगाये सोने सा धन
अपना भाड़ न फोड़ सका
औरों के हाथों तला गया ।
चले गए यूँ ही दिन खाली चले गए खाली,
उतर गई बालों की स्याही, चेहरे की लाली
बिना बुलाये आया था जो
बिना रुके ही भला गया ।
बहादुर पटेल
श्रद्धांजलि देते हुए उनका एक गीत प्रस्तुत है।
नवगीत
खाली हाथ लिए आया था
खाली ही दिन चला गया ।
वो क्या आया, हम ही बस यूँ ही आये थे
भीतर से आधे बाहर से किंतु सवाये थे
फंसा निरर्थकता के पाटों में
अपने हाथों दला गया ।
राजी नहीं हुआ भरने को अपना ही मन,
हुआ माटिया हाथ लगाये सोने सा धन
अपना भाड़ न फोड़ सका
औरों के हाथों तला गया ।
चले गए यूँ ही दिन खाली चले गए खाली,
उतर गई बालों की स्याही, चेहरे की लाली
बिना बुलाये आया था जो
बिना रुके ही भला गया ।
बहादुर पटेल
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