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गुरुवार, 16 जुलाई 2009

लोकतंत्र के चौथे खम्भे वालों की सम्पत्ति भी घोषित होनी चाहिये

सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों (कार्यपालिका) के लिए अपनी सम्पत्ति की घोषणा करने का नियम बहुत पहले से ही लागू रहा है पर पिछले कुछ वर्षो के दौरान चुनाव लड़ रहे नेताओं (विधायिका) को अपना उम्मीदवारी का पर्चा दाखिल करते समय अपनी सम्पत्ति की घोषणा करने के साथ उनके ऊपर चल रहे आपराधिक प्रकरणों की जानकारी देना भी अनिवार्य कर दिया गया था। गत दिनों केन्द्रीय कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने प्रैस एसोसियेशन की ओर से आयोजित मुलाकात में कहा कि सरकार सौ दिनों के अन्दर न्यायाधीशों की ओर से सम्पत्तियों और देनदारियों की घोषणा से सम्बंधित एक विधेयक संसद में पेश करेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस मामले में वे न्यायपालिका को पूरे विश्वास में लेकर ही यह कदम उठायेंगे, हम उनसे टकराव के रास्ते पर नहीं हैं। स्मरणीय है कि कलकत्ता हाईकोर्ट के मौजूदा न्यायधीश सौमित्र सेन के खिलाफ दुराचरण के आरोप लगने के बाद ऐसे कानून की जरूरत महसूस की जा रही थी। श्री मोइली का कहना था कि सरकार सौमित्र सेन के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही पूरी करवा कर जनता के बीच पनप रही यह धारणा समाप्त करेगी कि कुछ नहीं होता है। सौमित्र के खिलाफ लगे आरोपों की जॉच के लिए एक समिति का गठन किया गया है जिसमें पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्यन्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर और प्रख्यात अधिवक्ता फाली एस नरीमन के साथ सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीष बी. सुदर्शन रेड्डी को शामिल किया गया है।

ऐसा लगता है कि अब न्यायाधीशों को भी अपनी सम्पत्ति की घोषणा करना ही पड़ेगी। पिछले दिनो सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने सार्वजनिक रूप से यह मान कर कि तीस प्रतिशत जज भ्रष्ट हैं, सारे ही जजों को कटघरे में खड़ा कर दिया था। देश के समस्त न्यायधीशों में से कौन तीस प्रतिशत में आता है और कौन सत्तर प्रतिशत में आता है, यह कहा नहीं जा सकता। यद्यपि यह भी सच है कि केवल सम्पत्ति की घोषणा भर कर देने से ना तो भ्रष्टाचार पर ही लगाम लगेगी और ना ही उनकी सही सम्पत्ति ही सामने आ पायेगी, किंतु अगर गलत सूचना देंगे तो भ्रष्ट जज एक गलती और करेंगे जो उन्हें कानून की गिरफ्त में लाने में मदद देगी। वैसे तो अधिकारियों और नेताओं की सम्पत्ति की घोषणा होने के बाद भी इनका भ्रष्टाचार कम नहीं हआ, अपितु दिन दूना रात चौगुना बढ ही रहा है। हॉ इतना अवश्य ही हुआ है कि इससे नेताओं में एक भय व्याप्त हुआ और उन्होंने जरूरी सावधानियॉ लेना प्रारंभ कर दिया।

दूसरी ओर जब लोकतंत्र के तीन स्तंभों द्वारा अर्जित सम्पत्ति को सार्वजनिक घोषणाओं के दायरे में लाया जा रहा है तो चौथे स्तंभ को ही क्यों मुक्त रखा जाये। पिछले दिनों प्रैस के बारे में जो सूचनाएं आयी हैं और जनसत्ता सहित अनेक वेव पत्रिकाओं ने इस विषय में जो कुछ भी छापा है उससे पता चलता है कि इस बहती गंगा में प्रैस के एक हिस्से के हाथ भी सूखे नहीं हैं। कोई समय था जब प्रैस में छपी खबर का कोई सम्मान था पर इसके व्यवसायीकरण के बाद इस संस्था का जो पतन हुआ है इससे इसे दलाल का दर्जा मिलता गया है। एक सेमिनार में तो मीडियाकर्मियों को 'मीडिया के मीडियेटर' कह कर याद किया गया था। मीडिया के जो संस्थान बकायदा कम्पनी अधिनियमों के अर्न्तगत रजिस्टर्ड हैं और आइ पी ओ लाकर बाजार से पूंजी एकत्रित करते हैं वे केवल एक उद्योग भर हैं! उनके पास समाज हितैशी कोई आदर्श होने का कोई सवाल ही नहीं है अपितु वे तो उसे लगायी गयी पूंजी की वापिसी और असीमित धन कमाने के साधन के रूप में ही देखेंगे! दरअसल वे प्रकाशन का उद्योग चला रहे हैं और उत्पाद का व्यापार कर रहे हैं। इसके लिए वे अखबार को किसी भी स्तर पर गिर कर बेचेंगे तथा जनता के बीच अपनी पहुच सकने की क्षमता की पूरी कीमत वसूलना चाहेंगे। यह कुछ ऐसा है जैसे किसी ने दवाइयों की दुकान में जूतों की दुकान खोल ली हो पर बोर्ड वही पुराना ही लगा रखा हो। जब मालिक चुनावों में पैकेज बेचेंगे तो पत्रकार भी अपने हाथ कैसे साफ रख सकते हैं क्योंकि मालिक तो शब्द जोड़ने और भाषा चित्र बनाने का काम करता नहीं है उसे तो वह काम पत्रकारों से ही कराना पड़ता है। भोपाल में जब एक पत्रकार ने अखबार मालिक से कम तनख्वाह के बारे में शिकायत की तो उसका कहना था कि तुम्हें इतना बड़ा बैनर तो दे दिया है, क्या अब भी तुम्हें ज्यादा वेतन की जरूरत है? बुन्देली में एक कहावत है- सौ के नब्बे कर दो, नाव दरोगा धर दो- अर्थात भले ही वेतन सौ की जगह नब्बे रूप्ये महीने कर दो पर पदनाम दरोगा का मिल जाये तो फिर पैसे तो बनाये ही जा सकते हैं। अच्छे बैनर के लिए लोग इसी कारण से लालायित रहने लगे हैं। अकेले भोपाल में ही ऐसे पचास से अधिक पत्रकार हैं जो आज से पच्चीस-तीस साल पहले साइकिल से चलते थे पर आज वे न केवल करोड़पति हैं अपितु उनके बंगलों में एकाधिक गाड़ियॉं हैं। अपने कर्तव्य के प्रति न्याय न करने के बदले में ही उन्होंने किसी न किसी संस्थान के पद हथिया लिये हैं व प्रमुख स्थलों पर स्थित लाखों रूप्यों की कीमत के सरकारी बंगले उनके अधिकार में हैं जिसका किराया भी वे ठीक से नहीं चुकाते पर कोई भी अधिकारी उनके खिलाफ चूं भी नहीं करता।

प्रैस मालिकों ने सरकार से प्रैस के नाम पर प्रमुख बाजार में प्लाट ले लिये हैं व अपने प्रभाव का स्तेमाल कर बैंकों से भरपूर ऋण ले उन पर बड़े बड़े भवन बना लिए हैं जिन्हें वे प्रैस से भिन्न कामों के कार्यालयों को किराये पर उठाये हुये हैं। प्रैस का दबाव बना कर वे भवन निर्माण आदि ऐसे अनेक तरह के व्यवसायों में लिप्त हैं जहॉ सरकारी हस्तक्षेप अधिक रहता है तथा अपने प्रभाव का स्तेमाल कर कानून का पालन कराने वाले अधिकारियों को धमका कर स्थिति अपने पक्ष में करते रहते हैं। इससे भी वे अटूट काला धन पैदा कर रहे हैं।

कभी कमलेश्वर ने लिखा था कि प्रैस की स्वतंत्रता का मतलब प्रैस मालिकों की स्वतंत्रता नहीं होता अपितु पत्रकार की स्वतंत्रता होती है। प्रैस मालिकों ने प्रैस की सुविधाओं को अपनी व्यापारिक सुरक्षा में बदल लिया है व उनके पास समुचित मात्रा में दो नम्बर के पैसे एकत्रित होते जा रहे हैं इसलिए उनके लिए भी जजों की तरह सम्पत्ति की घोषणा को अनिवार्य किया जाना जरूरी हो गया है।

वीरेन्द्र जैन
२/१ शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल म.प्र. फोन ९४२५६७४६२९

गुरुवार, 25 जून 2009

वे लोकचेतना में आधुनिकता के अग्रदूत थे

श्रद्धांजलि : डा. सीताकिशोर खरे
गत २४ जून २००९ की रात्रि में डा. सीता किशोर खरे नहीं रहे। वे दतिया जिले की सेंवढा तहसील में गत पचास वर्षो से साधनारत थे। वे इस दौर के उन दुर्लभ साहित्यकारों में से एक थे जो अपनी प्रतिभा के उचे दाम लगवाने के लिए सुविधा के बाजारों की ओर नहीं भागे अपितु अपने जनपद के लोगों के बीच कठिनाइयों से जूझते रहे। उनका गॉंव ही नहीं अपितु वह पूरा इलाका हई डकैत ग्रस्त इलाका रहा है और अपने स्वाभिमान की रक्षा करने तथा नाकारा कानून व्यवस्था से निराश हो सिन्ध और चम्बल के किनारे जंगलों में उतर कर बागी बन जाना व अपना मकसद पाने के लिए सम्पन्नों की लूट कर लेना आम बात है। उन्होंने इस समस्या को राजधानियों के ए.सी. दफ्तरों में बैठने वाले नेताओं अधिकारियों की तरह न देख कर उसके सामाजिक आर्थिक पहलुओं को देखा और उन पर पूरी संवेदना के साथ कलम चलायी जो उनके सातसौ दोहों के “पानी पानी दार है” संग्रह में संग्रहीत हैं-
तकलीफें तलफत रहत, मजबूरी रिरयात
न्याय नियम चुप होत जब, बन्दूकें बतियात
छल जब जब छलकन लगत, बल जब जब बलखात
हल की मुठिया छोड़ कें, हाथ गहत हथियार
और ऐसा इसलिए होता है क्योंकि-
दौलत के दरबार में, मचौ खूब अंधेर
खारिज करी गरीब की अर्जी आज निबेर
जे इनके ऊॅंचे अटा बादर सें बतियात
आसपास की झोपड़ी, इन्हें ना नैक सुहात
सारा का सारा वातावरण ही ऐसा हो गया है कि-
कछु ऐसौ जा भूमि के पानी कौ परताप
मिसरी घोरौ बात में भभका देत षराप
का पानी में घुर गयौ का माटी की भूल
गुठली गाड़त आम की कड़ कड़ भगत बबूल
इसमें जमीन की गुणवत्ता भी अपनी भूमिका अदा करती है-
माटी जा की भुरभुरी, उपजा में कमजोर
कैसें हुइऐं आदमी, मृदुल और गमखोर
३ दिसम्बर १९३५ को दतिया जिले के ग्राम छोटा आलमपुर में जन्मे डा. सीताकिशोर खरे का बचपन में पेड़ से गिरने पर एक हाथ टूट गया था व समय पर समुचित इलाज की सुविधा उपलब्ध न होने से बने जख्म के कारण उसे काटना ही पड़ा था। अपने एक हाथ के सहारे ही वे मीलों साइकिल चलाते हुये शिक्षा ग्रहण करने जाते थे व अपनी प्रतिभा के कारण उन दिनों भी अध्यापक पद के लिए चुन लिये गये जब विकलांगता को चयन के लिए आरक्षण का आधार नहीं मानी जाता था। अध्यापकी करते हुये भी उन्होंने अध्ययन जारी रखा और एमए पीएचडी की व कालेज के लिए चुने गये जहॉं वे हिन्दी के विभागाध्यक्ष रहे। इस बीच उन्होंने न केवल अपने बन्धु बांधवों को ही पढाया अपितु अपने पूरे परिवेश में शिक्षा और ज्ञान की चेतना जगाने के अग्रदूत बने। अपने ज्ञानगुरू डा. राधारमण वैद्य की प्रेरणा से उन्होंने अपने साथियों और सहपाठियों को आगे बढाया और सामूहिक विकास के साथ काम किया जबकि इस दौर में साहित्यकार दूसरों के कंधे पर सवार होकर अपना स्वार्थ हल करते पाये जाते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने भाषा विज्ञान पर बहुत महत्वपूर्ण काम स्वयं किया तथा अपने साथियों सहयोगियों को भी शोध कार्य में मौलिक और महत्वपूर्ण काम करने के लिए प्रेरित किया। “सर्वनाम, अव्यय और कारक चिन्ह” तथा “दतिया जिले की पाण्डुलिपियों का सर्वेक्षण” उनके कार्यों की प्रकाशित पुस्तकें हैं। कभी उन्होंने अपने प्रिय कवि मुकुट बिहारी सरोज के गीतों पर ग्वालियर के एक दैनिक समाचार पत्र में स्तंभ लिखे थे जिनका नाम था- सूत्र सरोज के, टीका सीताकिशोर की। इन आलेखों का संकलन भी अभी हाल ही में प्रकाशित हुआ है।
डा. सीताकिशोर के गीतों में मुकुट बिहारी सरोज वाली खनक और कड़क पायी जाती रही है, जैसे-
कल अधरों की अधरों से
कुछ कहासुनी हो गयी, तभी तो
ये मंजुल मुस्कान बुराई माने है
या
इतनी उमर हो गयी ये सब करते करते
अब की कैसा बीज बो दिया सारी फसल खराब हो गयी
हम तो ये समझे थे अनुभव
तुम से रोज मिला करता है
पूरा था विश्वास कि सूरज
रोज सुबह निकला करता है
ये सब छल फरेब की बातें
तुमको सरल सुभाव हो गयीं
अब की कैसा बीज बो दिया सारी फसल खराब हो गयी
डा. सीताकिशोर बेहद संकोची, विनम्र, पर स्पष्ट थे। उन्हें किसी तरह के भ्रम नहीं थे व उनके सपनों के पॉंव सामाजिक यथार्थ की चादर से बाहर नहीं जाते थे। गलत रूढियों और परम्पराओं के बारे में उनकी समझ साफ थी पर वे उसे लोक चेतना पर थोपते नहीं थे अपितु उसमें स्वाभाविक विकास के पक्षधर थे। उनका जाना एक सामाजिक सचेतक लोकस्वीकृत साहित्य के अग्रदूत का जाना है। उनकी बात का महत्व था। आज के बहुपुरस्कृत और प्रकाशित स्वार्थी साहित्यकारों की भीड़ के बीच उन जैसी प्रतिभा के साथ इन्सानियत के धनी लोग दुर्लभ हो गये हैं।
वीरेन्द्र जैन

शनिवार, 13 जून 2009

गॉंव का नाम थियेटर मोर नाम हबीब

हबीब तनवीर नहीं रहे। वे उम्र के छियासीवें साल में भी नाटक कर रहे थे।अभी पिछले ही दिनो उन्होंने भारत भवन में अपना नाटक चरनदास चोर किया था तथा उसमें भूमिका की थी।

वे इतने विख्यात थे कि सामान्य ज्ञान रखने वाला हर व्यक्ति उनके बारे में सब कुछ जानता रहा है। कौन नहीं जानता कि उनका जन्म रायपुर में हुआ था और तारीख थी १९२३ के सितम्बर की पहली तारीख। उनके पिता हफीज मुहम्मद खान थे। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा रायपुर के लॉरी मारिस हाई स्कूल में हुयी जहॉ से मैट्रिक पास करके आगे पढने के लिए नागपुर गये और १९४४ में इक्कीस वर्ष की उम्र में मेरिस कालेज नागपुर से उन्होंने बीए पास किया। बाद में एमए करने के लिए वे अलीगढ गये जहॉं से एमए का पहला साल पास करने के बाद पढाई छूट गयी। वे नाटक लिखते थे, निर्देशन करते थे, उन्होंने शायरी भी की और अभिनय भी किया। यह सबकुछ उन्होंने अपने प्रदेश और देश के स्तर पर ही नहीं किया अपितु अर्न्तराष्ट्रीय ख्याति भी अर्जित की। वे सम्मानों और पुरस्कारों के पीछे कभी नहीं दौड़े पर सम्मान उनके पास जाकर खुद को सम्मानित महसूस करते होंगे। १९६९ में उन्हें प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला तो १९७२ से १९७८ के दौरान वे देश के सर्वोच्च सदन राज्य सभा के लिए नामित रहे। १९८३ में पद्मश्री मिली, १९९६ में संगीत नाटक अकादमी की फैलोशिप मिली तो २००२ में पद्मभूषण मिला। १९८२ में एडनवर्ग में आयोजित अर्न्तराष्ट्रीय ड्रामा फेस्टीबल में उनके नाटक 'चरनदास चोर' को पहला पुरस्कार मिला।

वे नाटककार के रूप में इतने मशहूर हुये कि अब कम ही लोग जानते हैं कि पेशावर से आये हुये हफीज मुहम्मद खान के बेटे हबीब अहमद खान ने शुरू में शायरी भी की और अपना उपनाम 'तनवीर' रख लिया जिसका मतलब होता है रौशनी या चमक। बाद में उनके कामों की जिस चमक से दुनिया रौशन हुयी उससे पता चलता है कि उन्होंने अपना नाम सही चुना था। कम ही लोगों को पता होगा कि १९४५ में बम्बई में आल इन्डिया रेडियो में प्रोड्यूसर हो गये, पर उनके उस बम्बई जो तब मुम्बई नहीं हुयी थी, जाने के पीछे आल इन्डिया रेडियो की नौकरी नहीं थी अपितु उनका आकर्षण अभिनय का क्षेत्र था। पहले उन्होंने वहॉ फिल्मों में गीत लिखे और कुछ फिल्मों में अभिनय किया। इसी दौरान उनके जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ आया और वे प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ कर इप्टा ( इन्डियन पीपुल्स थियेटर एशोसियेशन)के सक्रिय सदस्य बन गये, पर जब स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इप्टा के नेतृत्वकारी साथियों को जेल जाना पड़ा तो उनसे इप्टा का कार्यभार सम्हालने के लिए कहा गया। ये दिन ही आज के हबीब तनवीर को हबीब तनवीर बनाने के दिन थे। कह सकते हैं कि उनके जीवन की यह एक अगली पाठशाला थी।
१९५४ में वे फिल्मी नगरी को अलविदा कह के दिल्ली आ गये और कदेसिया जैदी के हिन्दुस्तानी थियेटर में काम किया। इस दौरान उन्होंने चिल्ड्रन थियेटर के लिए बहुत काम किया और अनेक नाटक लिखे। इसी दौरान उनकी मुलाकात मोनिका मिश्रा से हुयी जिनसे उन्होंने बाद में विवाह किया। इस विवाह में ना तो पहले धर्म कभी बाधा बना और ना ही बाद में क्योंकि दोनों ही धर्म के नापाक बंधनों से मुक्त हो चुके थे। इसी दौरान उन्होंने गालिब की परंपरा के १८वीं सदी के कवि नजीर अकबराबादी के जीवन पर आधारित नाटक 'आगरा बाजार' का निर्माण किया जिसने बाद में पूरी दूनिया में धूम मचायी। नाटक में उन्होंने जामियामिलिया के छात्रों और ओखला के स्थानीय लोगों के सहयोग और उनके लोकजीवन को सीधे उतार दिया। दुनिया के इतिहास में यह पहला प्रयोग था जिसका मंच सबसे बड़ा था क्योंकि यह नाटक स्थानीय बाजार में मंचित हुआ। सच तो यह है कि इसीकी सफलता के बाद उन्होंने अपने नाटकों में छत्तीसगढ के लोककलाकारों के सहयोग से नाटक करने को प्रोत्साहित किया जिसमें उनमें अपार सफलता मिली।

इस सफलता के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। १९५५ में जब वे कुल इकतीस साल के थे तब वे इंगलैंड गये जहॉं उन्होंने रायल एकेडमी आफ ड्रामटिक आर्ट में अभिनय और निर्देशन का प्रशिक्षण दिया। १९५६ में उन्होंने यही काम ओल्ड विक थियेटर स्कूल के लिए यही काम किया। अगले दो साल उन्होंने पूरे यूरोप का दौरा करके विभिन्न स्थानों पर चल रहे नाटकों की गतिविधियों का अध्ययन किया। वे बर्लिन में लगभग अठारह माह रहे जहॉं उन्हें बर्तोल ब्रेख्त के नाटकों को देखने का अवसर मिला जो बर्नेलियर एन्सेम्बले के निर्देषन में खेले जा रहे थे। इन नाटकों ने हबीब तनवीर को पका दिया और वे अद्वित्तीय बन गये। स्थानीय मुहावरों का नाटकों में प्रयोग करना उन्होंने यहीं से सीखा जिसने उन्हें स्थानीय कलाकारों और उनकी भाषा के मुहावरों के प्रयोग के प्रति जागृत किया। यही कारण है कि उनके नाटक जडों के नाटक की तरह पहचाने गये जो अपनी सरलता और अंदाज में, प्रदर्शन और तकनीक में, तथा मजबूत प्रयोगशीलता में अनूठे रहे।

वतन की वापिसी के बाद उन्होंने नाटकों के लिए टीम जुटायी और प्रदर्षन प्रारंभ किये। १९५८ में उन्होंने छत्तीसगढी में पहला नाटक 'मिट्ठी की गाड़ी' का निर्माण किया जो शूद्रक के संस्कृत नाटक 'मृच्छिकटकम ' का अनुवाद था। इसकी व्यापक सफलता ने उनकी नाटक कम्पनी 'नया थियेटर' की नींव डाली और १९५९ में उन्होंने संयक्त मध्यप्रदेष की राजधानी भोपाल में इसकी स्थापना की। 1970 से 1973 के दौरान उन्होंने पूरी तरह से अपना ध्यान लोक पर केन्द्रित किया और छत्तीसगढ में पुराने नाटकों के साथ इतने प्रयोग किये कि नाटकों के बहुत सारे साधन और तौर तरीकों में क्रान्तिकारी परिवर्तन कर डाले। इसी दौरान उन्होंने पंडवानी गायकी के बारे में भी नाटकों के कई प्रयोग किये। इसी दौरान उन्होंने छत्तीसगढ के नाचा का प्रयोग करते हुये 'गांव का नाम ससुराल, मोर नाम दामाद' की रचना की। बाद में श्याम बेनेगल ने स्मिता पाटिल और लालूराम को लेकर इस पर फिल्म भी बनायी थी।

हबीबजी प्रतिभाशाली थे, सक्षम थे, साहसी थे, प्रयोगधर्मी थे, क्रान्तिकारी थे। उनके 'चरणदास चोर' से लेकर, पोंगा पंडित, जिन लाहौर नहिं देख्या, कामदेव का सपना, बसंत रितु का अपना' जहरीली हवा, राजरक्त समेत अनेकानेक नाटकों में उनकी प्रतिभा दिखायी देती है जिसे दुनिया भर के लोगों ने पहचाना है। उन्होंने रिचर्ड एडिनबरो की फिल्म गांधी से लेकर दस से अधिक फिल्मों में काम किया है तो वहीं २००५ में संजय महर्षि और सुधन्वा देशपांडे ने उन पर एक डाकूमेंटरी बनायी जिसका नाम रखा 'गॉव का नाम थियेटर, मोर नाम हबीब'। यह टाइटिल उनके बारे में बहुत कुछ कह देता है, पर दुनिया की इस इतनी बड़ी शख्सियत के बारे में आप कुछ भी कह लीजिये हमेशा ही कुछ अनकहा छूट ही जायेगा।

वीरेन्द्र जैन
२/१ शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल म.प्र.
फोन ९४२५६७४६२९

मंगलवार, 9 जून 2009

दुर्घटना दर दुर्घटना - एक क्षोभ भरा दिन

मैं जब सुबह घूमने जाता हूँ तब साथ में मोबाइल नहीं ले जाता ताकि कम से कम एक घंटा तो सुकून से गुजर सके। 8 जून की सुबह जब घूम कर लौटा तो ताला खोलते ही मोबाइल की घंटी सुनाई दी। इतने सुबह मोबाइल पर घंटी आना वैसा ही लगता है जैसे कभी लोगों को तार आने पर लगता होगा। दौड़ कर मोबाइल उठाया और बिना यह देखे कि किस नम्बर से घंटी आ रही है, सुनने के लिए बटन दबा दिया। दूसरी तरफ देश के विख्यात कवि पूर्वसांसद उदयप्रताप सिंह थे। उन्होंने पूछा कहां थे बहुत देर से घंटी कर रहा हूँ, अच्छा सुनो सुबह सुबह तुम्हारे भोपाल में एक कार एक्सीडेंट हो गया है जिसमें कवि ओमप्रकाश आदित्य, नीरजपुरी, और लाढसिंह गुर्जर नहीं रहे व ओम व्यास और जॉनी बैरागी गम्भीर रूप से घायल हैं। ये लोग विदिशा कवि सम्मेलन से लौट रहे थे। इसलिए तुरंत ही वहाँ के पीपुल्स हास्पिटल पहुँचो।

मैं सन्न रह गया मैंने पूछा आप कहाँ पर हैं? वे बोले मैं तो दिल्ली में हूँ, वहाँ से अभी अभी अशोक ने खबर दी है। इतना कह कर उन्होंने फोन बन्द कर दिया, संभवत: दूसरों को जरूरी सूचना देने के लिये। पता नहीं चला कि और कौन कौन था एक्सीडेंट किससे हुआ। मैंने अस्पताल जाने से पहले कविमित्र माणिकवर्मा जी की खोज खबर लेनी जरूरी समझी जो थोड़ी ही दूर पर रहते हैं। फोन उनके यहाँ काम करने वाले लड़के ने अटैंड किया और नाम पूछने के बाद बताया कि वे बाथरूम में हैं। मैंने पूछा कि कल विदिशा तो नहीं गये थे तो उसने कहा नहीं। थोड़ी राहत की सांस लेकर मैंने कहा कि बाहर आ जायें तो बात करा देना। मैं तेजी से तैयार हुआ एक मिनिट के लिए अखबार के मुखपृष्ठ पर नजर डाली पर घटना एकदम सुबह की थी और अखबार छपने के बाद की थी इसलिए कहीं कोई खबर होने का सवाल ही नहीं उठता था। बाहर आकर देखा कि स्कूटर अचलनीय स्थिति में है इसलिए तुरंत ही सोचा कि क्यों न कवि मित्र राम मेश्राम से चलने का आग्रह किया जाये और उनकी कार से ही चलें। फोन किया तो वे तुरंत ही तैयार हो गये। किसी तरह उनके घर पहुँचा तो उनकी कार ने भी स्टार्ट हाने में थोड़े नखरे दिखाये पर अंतत: वह चल निकली। वहाँ बाहर प्रदीपचौबे अशोक चक्रधर पूर्व विधायक सुनीलम राजुरकर राज समेत कमिशनर भोपाल, संस्कृति मंत्री , संस्कृति सचिव, आईजी पूलिस आदि उपस्थित थे। पता चला कि मृत देहें तो पोस्टमार्टम और फिर उनके गृह नगर भेजे जाने के लिए सरकारी हमीदिया अस्पताल भेजी जा चुकी हैं और वहाँ पर घायलों को बचाने के भरसक प्रयत्न हो रहे हैं। घायलों में ओम व्यास की हालत काफी गम्भीर है तथा जानी बैरागी, भारत भवन के फोटोग्राफर विजय रोहतगी तथा गाड़ी का ड्राइवर खेमचंद खतरे से बाहर है। मंत्री और वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्तिथि के कारण अस्पताल प्रबंधन भी सक्रिय होकर रूचि ले रहा था व अस्पताल के मैनेजिंग डायरेक्टर स्वयं वहाँ पर थे। लगभग सारे ही उपस्थित लोग लगातार फोन पर बात कर रहे थे इसका असर यह हुआ था कि हम जैसे अनेक लोग वहाँ पर पहुँच सके थे। लगभग एक घंटे वहाँ रूकने के बाद हम लोग हमीदिया अस्पताल की ओर आये जहाँ मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग के डायरेक्टर श्रीराम तिवारी और असिसटेंट डायरेक्टर सुरेश तिवारी समेत लगभग पूरा संस्कृति विभाग उपस्तिथ था। पोस्टमार्टम पूरा हो चुका था और ताबूतों में शव रखे जाने थे, पर ताबूत उठाने वाला कोई नहीं था, एक पुलिस कानिस्टबल झुंझला कर कह रहा था कि ताबूत भी पुलिस ही उठाये। मेंने उसे सहायता देते हुये समझाया कि ये दुर्घटना है और ये सब सरकारी अधिकारी हैं, ये अपने हाथ से ताबूत तो क्या पानी का गिलास भी नहीं उठाते इसलिए मदद तो करनी ही पड़ेगी। उसी समय सूचना मिली कि हबीब तनवीर साहब भी नहीं रहे तो हम लोग ताबूतों को वाहनों में रखवा कर सीधे श्यामला हिल्स के अंसल अपार्टमेंट्स की ओर तेजी से चल दिये। वहाँ हबीब साहब की मृत देह आ चुकी थी और कमला प्रसाद, लज्जाशांकर हरदेनिया मनोज कुलकर्णी, जया मेहता, समेत दसबीस रंगकर्मी उपस्थित थे। जानकर आशचर्य और दुख हुआ कि हबीबजी के साथ काम करने वाले रंगकर्मियों में से भी कुछ अब तक मजहबी बने हुये थे और कोई कह रहा था कि पैर काबे की ओर नहीं करते या गुशल कराना चाहिये। लगता था कि अगले दिन उनके अंतिम संस्कार होने तक वे लोग हबीब जी की देह के साथ वे सब मजहबी खिलवाड़ कर लेना चाहते थे जो उन्होंने जिन्दगी भर नहीं किये थे।

एक कामरेड की देह को साम्प्रदायिक मुस्लिम, मुसलमान बना कर साम्प्रदायिक हिंदुओं के इस तर्क को बल दे रहे थे कि हबीब तनवीर ने पोंगा पंडित नाटक एक मुसलमान की तरह किया था और हिन्दू देवी देवताओं का अपमान किया था।

आठ जून सचमुच मेरे लिए गहरे क्षोभ का दिन रहा।

वीरेन्द्र जैन

रविवार, 31 मई 2009

जय हो

जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो
लूट मार के बाद सभी का अपना हिस्सा तय हो
जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो

दल बदलू वोटों की जय हो
संसद में नोटों की जय हो
लोकतंत्र की इस चौपड़ में
अमरीकी गोटों की जय हो
सीनाजोरी करता फिरता हर दलाल निर्भय हो
जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो

सच पर प्रतिबंधों की जय हो
जाचों के अन्धों की जय हो
लोकतंत्र के नाम चल रहे
सब काले धंधों की जय हो
मतलब तो सीधा सपाट पर पेंचदार आशय हो
जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो

पंजों की कमलों की जय हो
कांटों के गमलों की जय हो
कन्याओं पर राम नाम की
सेना के हमलों की जय हो
गूंगी जनता बहरा शासन अंधा न्यायालय हो
जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो जय हो

वीरेन्द्र जैन
/1 शलीमार स्टलिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल म.प्र.
फोन 9425674629

रविवार, 23 नवंबर 2008

चॉदी की जूती

विश्व के सबसे बडे लोकतंत्र के पाच राज्यो में चुनाव प्रचार अपने चरम पर है, कांग्रेस व बीजेपी चुनावों के इस दंगल को अगले बरस संभावित लोकसभा चुनावो का सेमीफाईनल मान कर चल रही है। लाजिम है कि वे चुनावो को सेमीफाईनल माने क्योकि इन प्रमुख पूंजीवादी राजनैतिक दलो के लिये चुनाव भी एक खेल या जंग ही है। ये सिद्धांतहीन दल “जंग व इश्क में सब कुछ जायज” की रणनिती के आधार पर जंग लडते आये है जितते आये है, अब इनके पास लाठी है तो भैस भी इनकी ही होना चाहिये। आज मध्यप्रदेश में भारतीय संविधान के पुरोधा बाबा अंबेन्डकर की जन्मस्थली महू के ग्राम चोरल व आसपास के गावों में घुमते समय यकायक चीन का माझी याद गया, गोरो ने चीन के अकर्मण्य सम्राट की मदत से चीन की पुरी जनता को अफीमची बनवा दिया था। मध्यप्रदेश के पी.ड्ब्ल्यू.डी. मंत्री सिहस्थ, विधवा पैंशन … घोटाला फैम आतंकी सांध्वी प्रज्ञा के नये खैरख्वाह सी.एम. इन वेटिंग अमाननीय कैलाश विजयवर्गीय जी गोरो से कोई कम थोडे ही है उनके छर्रे गावो में सूरा की नदिया बहा रहे है। अपने पठ्ठो के लिये तो ठीक गावो के तथाकथित मुकादमों के वास्ते कार-मोटरसाईकिलो की रेवडी बाटी जा रही है, महंगाई के इस दौर में दो बोरे भर चांदी की पायजेब बटवायी जा चुकी है, इसपर भंडारो के द्वार तो सदैव खुले ही है। शिवराज के राज में भले ही कुपोषण या भुखमरी से बच्चो की मौते हुवी हो इधर मंत्री जी के क्षेत्र में धार्मिक अनुष्ठानों व भंडारों के नये रिकार्ड कायम किये गये है।
विरेन्द्र जैन साहब की गिनती मध्यप्रदेश के चंद प्रमुख स्वतंत्र पत्रकारों में की जाती है, जैन साहब जनवादी लेखक संघ के अध्यक्ष भी रहे है। मध्यप्रदेश से छपने वाले प्रमुख हिन्दी पाक्षिक लोकजतन में छपने वाला आपका कालम बडा प्रसिद्ध है। पूंजीवादी व पूंजीवादी-सांप्रदायिक दलो के महान नेताओ को समर्पित विरेन्द्र जैन साहब का एक गीत शाया कर रहा हूँ।

चॉदी की जूती
नंगो की बस्ती में चलती
चॉदी की जूती
पैसा जिसके पास उसी की
बोल रही तूती

लक्ष्मी जिसके पास
उसी का रंग है चमकीला
कौन देखता चकाचौंध में
काला या पीला
धूम धडाके में दब जाती
उसकी करतूती
नंगो के बस्ती में चलती
चॉदी की जूती

उसकी गाडी उसके बैनर
उसके ही झन्डे
उसके बाबा उसके मुल्ले
उसके ही पण्डे
ठाकुर साहब साथ हो लिये
कर मूछें नीची
नंगो की बस्ती में चलती
चॉदी की जूती