इन्दौर, 21 नवबंर 2009
जनवादी लेखक संघ के 'मासिक रचना गोष्ठी' कार्यक्रम के अंतर्गत उर्दू रचनाकारों की रचनाओं के पाठ का आयोजन स्थानिय ए आई आई ई ए (एल आय सी) यूनियन कार्यलय में आयोजित किया गया। इस अवसर पर तरक्कीपसंद शायर इसहाक असर, मुश्ताक अंसारी, नईम अनवर, सैय्यद अशरफ मीर व चुन्निलाल वाधवानी की रचनाओं का पाठ हुवा व रचनाओं पर चर्चा हुवी।
कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. देवीप्रसाद मौर्य ने की व संचालन डॉ. अयाज एहमद कुरैशी ने किया। इस अवसर पर नवगठित उर्दू साहित्य परिषद् के गठन की जानकारी उर्दू साहित्य परिषद् इन्दौर के सदर डॉ. अयाज एहमद कुरैशी ने दी।
कार्यक्रम में सनत कुमार, सदाशिव कौतुक, प्रदीप मिश्र, श्रीराम तिवारी, जितेन्द्र चौहान, सत्यनारायण पटेल, राहूलसिंह चौहान, चारूशीला मौर्य व परेश टोकेकर ने शिरकत की।
परेश टोकेकर कबीरा
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सोमवार, 23 नवंबर 2009
सोमवार, 16 मार्च 2009
उदयपुर में सत्यनारायण पटेल का कहानी पाठ
उदयपुर ।
“कहां है आदमी, यहां तो सब कीड़ेमकोड़े है। इनकी औलादें भी ऐसी ही होंगी। कभी नहीं, कभी पनही नहीं पहनेंगे। जिनगीभर उबाणे पगे पटेलों की जी हुजूरी करेंगे।’’
गाँवों में जातीय और आर्थिक शोषण के यथार्थ का जीवन्त चित्र प्रस्तुत करने वाली कहानी ‘पनही’ पढते चर्चित युवा कथाकार सत्यनारायण पटेल ने अंत में कथा नायक के इस कथन से समाहार किया ‘अब मेरा मुंह वया देख रहे हो, जाओ टापरे में जो कुछ हो लाठी, हंसिया लेकर तैयार रहो, पटेलों के छोरे आते ही होंगे और हां, उबाणे पगे मत आजो कोई।’ पटेल की इस कहानी का अंत प्रबल जन प्रतिरोध की अभिव्यक्ति से हुआ है जो अब कैसी भी धौंस को बर्दाश्त नहीं करेगा।
जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय के जनपद विभाग द्वारा आयोजित इस कहानी पाठ के पश्चात हुई चर्चा में वरिष्ठ कवि नन्द चतुर्वेदी ने कहा कि ‘पनही’ एक शक्तिशाली कहानी है जो दबे हुए व्यक्ति को वाणी दे सकने वाली चेतना का उद्घाटन करती है। उन्होंने कहा कि इधर का कहानीकार मध्यम वर्ग की चालाकियों से भरा नजर आ रहा है। ऐसे में पटेल की कहानियॉ आश्वस्ति देने वाली हैं कि कई तरह के पटेलों से लड़ रहे लोगों के स्वर देने की सामथ्र्य अभी मौजूद है। नंद बाबू ने ग्लोबलाइजेशन के नये खतरों में स्थानीयता की रक्षा को बड़ी चुनौती बताया। वरिष्ठ उपन्यासकार राजेन्द्र मोहन भटनागर ने पटेल को बधाई दी कि उन्होंने गांव को अपने रचनाकर्म की विषय वस्तु बनाया। उन्होंने कहा कि ‘पनही’ की सफलता इस बात में है कि यह श्रोताओं को शहर से निकालकर ठेठ गांव में ले जाती है। सुखाड़िया विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के प्रो.आशुतोष मोहन ने इसे छोटे कैनवास के बावजूद सघन कथा बताया जो अपने भीतर औपन्यासिक गुंजाइश रखती है। उन्होंने नायिका पीराक के चित्रण में आई ऐन्द्रिकता को विरल अनुभव बताते हुए कहानी में छिपे अनेक संकेतों की भी व्याख्या की। उर्दू कथाकार डॉ.सर्वतुन्निसा खान ने कहा कि समकालीन कथा लेखन की एकरसता में जीवन के बहुविध रंगों की छटा गायब हो रही है ऐसे में गांव की कहानी आना खुशगवार है। खान ने कहानी की भाषा को देशज अनुभवों की समृद्ध उपज बताया। राजस्थान विद्यापीठ के सहआचार्य डॉ. मलय पानेरी ने कहा कि सामंतवाद का पहिया स्वतः जाम नहीं होगा अपितु उसके लिए संघर्ष करना होगा। डॉ. पानेरी ने कहानी को ग्रामीण निम्न वर्गीय जीवन का यथार्थ बताया। ‘बनास’ के संपादक डॉ. पल्लव ने देशज कथा रूप और शोषण की उदम चेष्टा को सत्यनारायण पटेल की कहानियों की मुख्य विशेषता बताया। इससे पहले जनपद विभाग के निदेशक पुरुषोतम शर्मा ने अतिथियों का स्वागत किया और जनपद विभाग की गतिविधियों की जानकारी दी। वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी रामचन्द्र नन्दवाना ने दलित उत्पीड़न के प्रतिरोध के अपने अनुभव सुनाए। अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ समालोचक प्रो. नवल किशोर ने कहा कि भूमंडलीकरण की चकाचौंध में साहित्य में ही जगह बची है जो पूरन और पीराक जैसे दबे कुचले लोगों की बात कर सके। उन्होंने कहा कि अच्छे लेखक की पहचान यह है कि वह बदलते समय को पकड़े और उसे सार्थक कला रूप दे। उन्होंने सत्यनारायण पटेल की कहानियों को इस चेतना से सम्पन्न बताते हुए कहा कि छोटी छोटी अस्मिताओं के नाम पर बंटने से ज्यादा जरूरी है कि हम बड़ी लड़ाई के लिए तैयार हों। आयोजन में लोककलाविद डॉ. महेन्द्र भाणावत, डॉ. एल.आर. पटेल, विभा रश्मि, दुर्गेश नन्दवाना, भंवर सेठ, हिम्मत सेठ, अर्जुन मंत्री, लक्ष्मीलाल देवड़ा, गणेश लाल बण्डेला सहित बड़ी संख्या में युवा पाठक उपस्थित थे।
अंत में विद्यापीठ के सांस्कृतिक सचिव डॉ. लक्ष्मीनारायण नन्दवाना ने आभार व्यक्त किया।
गणेशलाल मीणा
152, टैगोर नगर, हिरण मगरी, से. 4, उदयपुर 313 002
प्रेक्षक: पल्लव (ईमेल: pallavkidak@gmail.com, फ़ोन: ०९४१४७३२२५८)
“कहां है आदमी, यहां तो सब कीड़ेमकोड़े है। इनकी औलादें भी ऐसी ही होंगी। कभी नहीं, कभी पनही नहीं पहनेंगे। जिनगीभर उबाणे पगे पटेलों की जी हुजूरी करेंगे।’’
गाँवों में जातीय और आर्थिक शोषण के यथार्थ का जीवन्त चित्र प्रस्तुत करने वाली कहानी ‘पनही’ पढते चर्चित युवा कथाकार सत्यनारायण पटेल ने अंत में कथा नायक के इस कथन से समाहार किया ‘अब मेरा मुंह वया देख रहे हो, जाओ टापरे में जो कुछ हो लाठी, हंसिया लेकर तैयार रहो, पटेलों के छोरे आते ही होंगे और हां, उबाणे पगे मत आजो कोई।’ पटेल की इस कहानी का अंत प्रबल जन प्रतिरोध की अभिव्यक्ति से हुआ है जो अब कैसी भी धौंस को बर्दाश्त नहीं करेगा।जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय के जनपद विभाग द्वारा आयोजित इस कहानी पाठ के पश्चात हुई चर्चा में वरिष्ठ कवि नन्द चतुर्वेदी ने कहा कि ‘पनही’ एक शक्तिशाली कहानी है जो दबे हुए व्यक्ति को वाणी दे सकने वाली चेतना का उद्घाटन करती है। उन्होंने कहा कि इधर का कहानीकार मध्यम वर्ग की चालाकियों से भरा नजर आ रहा है। ऐसे में पटेल की कहानियॉ आश्वस्ति देने वाली हैं कि कई तरह के पटेलों से लड़ रहे लोगों के स्वर देने की सामथ्र्य अभी मौजूद है। नंद बाबू ने ग्लोबलाइजेशन के नये खतरों में स्थानीयता की रक्षा को बड़ी चुनौती बताया। वरिष्ठ उपन्यासकार राजेन्द्र मोहन भटनागर ने पटेल को बधाई दी कि उन्होंने गांव को अपने रचनाकर्म की विषय वस्तु बनाया। उन्होंने कहा कि ‘पनही’ की सफलता इस बात में है कि यह श्रोताओं को शहर से निकालकर ठेठ गांव में ले जाती है। सुखाड़िया विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के प्रो.आशुतोष मोहन ने इसे छोटे कैनवास के बावजूद सघन कथा बताया जो अपने भीतर औपन्यासिक गुंजाइश रखती है। उन्होंने नायिका पीराक के चित्रण में आई ऐन्द्रिकता को विरल अनुभव बताते हुए कहानी में छिपे अनेक संकेतों की भी व्याख्या की। उर्दू कथाकार डॉ.सर्वतुन्निसा खान ने कहा कि समकालीन कथा लेखन की एकरसता में जीवन के बहुविध रंगों की छटा गायब हो रही है ऐसे में गांव की कहानी आना खुशगवार है। खान ने कहानी की भाषा को देशज अनुभवों की समृद्ध उपज बताया। राजस्थान विद्यापीठ के सहआचार्य डॉ. मलय पानेरी ने कहा कि सामंतवाद का पहिया स्वतः जाम नहीं होगा अपितु उसके लिए संघर्ष करना होगा। डॉ. पानेरी ने कहानी को ग्रामीण निम्न वर्गीय जीवन का यथार्थ बताया। ‘बनास’ के संपादक डॉ. पल्लव ने देशज कथा रूप और शोषण की उदम चेष्टा को सत्यनारायण पटेल की कहानियों की मुख्य विशेषता बताया। इससे पहले जनपद विभाग के निदेशक पुरुषोतम शर्मा ने अतिथियों का स्वागत किया और जनपद विभाग की गतिविधियों की जानकारी दी। वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी रामचन्द्र नन्दवाना ने दलित उत्पीड़न के प्रतिरोध के अपने अनुभव सुनाए। अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ समालोचक प्रो. नवल किशोर ने कहा कि भूमंडलीकरण की चकाचौंध में साहित्य में ही जगह बची है जो पूरन और पीराक जैसे दबे कुचले लोगों की बात कर सके। उन्होंने कहा कि अच्छे लेखक की पहचान यह है कि वह बदलते समय को पकड़े और उसे सार्थक कला रूप दे। उन्होंने सत्यनारायण पटेल की कहानियों को इस चेतना से सम्पन्न बताते हुए कहा कि छोटी छोटी अस्मिताओं के नाम पर बंटने से ज्यादा जरूरी है कि हम बड़ी लड़ाई के लिए तैयार हों। आयोजन में लोककलाविद डॉ. महेन्द्र भाणावत, डॉ. एल.आर. पटेल, विभा रश्मि, दुर्गेश नन्दवाना, भंवर सेठ, हिम्मत सेठ, अर्जुन मंत्री, लक्ष्मीलाल देवड़ा, गणेश लाल बण्डेला सहित बड़ी संख्या में युवा पाठक उपस्थित थे।
अंत में विद्यापीठ के सांस्कृतिक सचिव डॉ. लक्ष्मीनारायण नन्दवाना ने आभार व्यक्त किया।
गणेशलाल मीणा
152, टैगोर नगर, हिरण मगरी, से. 4, उदयपुर 313 002
प्रेक्षक: पल्लव (ईमेल: pallavkidak@gmail.com, फ़ोन: ०९४१४७३२२५८)
शनिवार, 20 सितंबर 2008
कवि संवाद कार्यक्रम कल
प्रिय साथीयों,
आशादीप सेवा प्रकल्प ट्रस्ट द्वारा अपनी स्थापना की नौवीं वर्षगाठ के अवसर पर प्रकाशन 'इन्द्रदर्शन' के सहयोग से अभिनव कवि संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया है।
दिनांक: 21 सितंबर 2008 रविवार
समय: शाम 6 बजे
स्थान: आशादीप सेवा प्रकल्प ट्रस्ट परिसर, स्कीम नं. 78, इन्दौर
कविगण: प्रदीप मिश्रा, देवेंद्र रिणवा, प्रदीपकांत व राकेश शर्मा
कार्यक्रम में आप सभी आमंत्रित है।
आशादीप सेवा प्रकल्प ट्रस्ट द्वारा अपनी स्थापना की नौवीं वर्षगाठ के अवसर पर प्रकाशन 'इन्द्रदर्शन' के सहयोग से अभिनव कवि संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया है।
दिनांक: 21 सितंबर 2008 रविवार
समय: शाम 6 बजे
स्थान: आशादीप सेवा प्रकल्प ट्रस्ट परिसर, स्कीम नं. 78, इन्दौर
कविगण: प्रदीप मिश्रा, देवेंद्र रिणवा, प्रदीपकांत व राकेश शर्मा
कार्यक्रम में आप सभी आमंत्रित है।
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