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गुरुवार, 5 अगस्त 2010

शोकगीत

''इतिहास खुद को दोहराता है, पहली बार त्रासदी और दूसरी बार प्रहसन के रूप में'' कार्ल मार्क्स का यह महान सूत्रवाक्य बरबस ही याद आ जाता है। ७ जून २०१० को भोपाल त्रासदी के २५ वर्षो बाद यूनियन कार्बाईड के ७ हिन्दोस्तानी अधिकारीयों को ''आपराधिक लापरवाही'' के कारण हुवी मौतो का दोषी ठहराते हुवे भारतीय कानूनानुसार अधिकतम २ वर्षो के कारावास की सजा सुनायी गयी एवं तुरंत जमानत पर रिहा कर पिडीतों के जख्मों पर नमक छिड़का गया। २५ जून २०१० को मध्यप्रदेश की औद्योगिक राजधानी इन्दौर से महज २२ किमी दूर स्थित औद्योगिक क्षेत्र पीथमपुर में हैदराबाद की अपशिष्ट प्रबंधन कंपनी राम्को एनवायरों इंजिनियर के भस्मक में यूनियन कार्बाइड का जहरीला कचरा जलाने के परीक्षण अभियान के समय ७ मजदूर बीमार पड़ गए। ज्ञातव्य रहे कि जहा यूनियन कार्बाईड का ३४६ टन रेडियोएक्टिव अपशिष्ट जलाया जा रहा है वह घनी आबादी वाले धार-महू-इन्दौर से घिरा हुआ है इसपर प्लांट के पास से निकल रहे दो नाले इन्दौर की जीवनरेखा यशवंत सागर में मिलते है। मामले पर आसपास के ग्रामिणों व शहरी लोगो में व्याप्त आक्रोश के बाद कैंद्र की कांग्रेस व राज्य की भाजपा नीत सरकारें गेंद एक-दूसरे के पाले में डाल कामनवेल्थ खेलो का अभ्यास करती नजर आ रही है, उधर यूका का कचरा निपटाने की तैयारीया पर्दे के पिछे शुरू है। भोपाल कांड की त्रासदी के बाद क्या अब भारत में प्रहसन रचने की तैयारी की जा रही है? अमेंरीका के साथ परमाणु करार करने के लिये सप्रग-१ ने साम-दाम-दंड-भेद के इस्तेमाल का क्लासिकल उदाहरण पेश किया एवं 'परमाणु दायित्व विधेयक' के मामले में भी वो कोई कसर छोडने के लिये तैयार नहीं दिख रही है। 'परमाणु दायित्व विधेयक' भोपाल जैसी किसी भी घटना का संपुर्ण दायित्व सस्ते में भारत की जनता पर ड़ालने की साम्राज्यवादी तिकड़मबाजी को अमलीजामा पहनाने की रस्म अदायगी मात्र है।

हिरोशिमा-नागासाकी की त्रासदी का रचियेता रोज नये-नये प्रहसन ईजाद करने में लगा हुआ है, जिसकी निर्विवादित कर्मस्थली बन रही है तीसरी दुनिया। तमाम नये ईजादो के परिक्षण के लिये विएतनाम, युगोस्लाविया, अफगानिस्तान, ईराक, ईरान, फिलीस्तीन या हिन्दोस्ता जैसे देशो से अच्छी प्रयोगशाला दुनिया में ओर कहा मिलेगी? खैर नित नये बनते हिरोशिमा-नागासाकी की भीड़ में हम स्वयं बैल को आमंत्रित कर रहे है जब अपना ही सिक्का खोटा हो तो दुसरे को क्या दोष देना।

हिरोशिमा-नागासाकी की ६५ वी बरसी पर साम्राज्यवाद-जनित तमाम मानवीय त्रासदी के हताहतों से 'शोकगीत' के अलावा ओर क्या अपेक्षा की जा सकती है।


भोपालः शोकगीत १९८४ - मेरे शहर का नाम / राजेश जोशी

मैं नहीं चाहता
कि जब भी लूँ
मैं अपने शहर का नाम
दूसरा पूछे
क्या हुआ था उस रात?
कैसे हुआ वह सब कुछ?

मुझे आज तक कोई नहीं मिला
जिसने कहा हो
मैं हिरोशिमा से आया हूँ
मैं आया हूँ नागासाकी से

क्या मुँह लेकर जाऊँ मैं
दूसरों के सामने?
किस मुँह से कहूँ
कि मैं आया हूँ
किस शहर से !

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

कोपेनहेगन वार्ता का दुःखद अंत

मीनाक्षी अरोरा

अंततः जलवायु परिवर्तन पर कोपेनहेगन वार्ता का दुःखद अंत हो चुका है। डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन के बेला सेंन्टर में चले 12 दिन की लंबी बातचीत दुनिया के आशाओं पर बेनतीजा ही रही। कोपेनहेगन सम्मेलन में बातचीत के लिए जुटे 192 देशों के नेताओं के तौर-तरीकों से यह कतई नहीं लगा कि वे पृथ्वी के भविष्य को लेकर चिंतित हैं। दुनियाँ के कई बड़े नेताओं ने बेशर्मी के साथ घोषणा की कि ‘यह प्रक्रिया की शुरुआत है, न की अंत’। 192 देशों के नेता किसी सामुहिक नतीजे पर नहीं पहुँच सके, झूठी सदिच्छाओं के गुब्बारे के गुब्बार तो बनाए गए, पर किसी ठोस कदम की बात कहीं नहीं आई। कोपेनहेगन सम्मेलन मात्र एक गर्मागर्म बहस बनकर खत्म हो चुकी है।

कोपेनहेगन की शुरुआत ही जिन बिन्दुओं पर होनी थी, वह विकसित देशों के अनुकूल नहीं थी। कार्बन उत्सर्जन में कानूनी रूप से अधिक कटौती का वचनबद्धता, कार्बन उत्सर्जन के प्रभावी रोकथाम के लिए एक निश्चित समय सीमा की प्रतिबद्धता, कार्बन उत्सर्जन में 1990 के स्तर से औसत 5 प्रतिशत तक कटौती आदि ऐसे मुद्दे थे जिनपर विकसित देश किसी भी स्थिती में तैयार नहीं होने वाले थे।

कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन के मसले पर ‘सार्थक समझौते’ की निरर्थकता इसी बात से साबित हो जाती है कि सार्थक समझौते में गिनती के 28-30 देश ही शामिल हैं। बाकी देश इसे पूरी तरह खारिज कर चुके हैं। 18 दिसंबर को ही कोपेनहेगन की असफलता साफ नजर आ गयी थी, जब एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरु हुआ। दुनिया भर से आईं वरिष्ठ हस्तियां एक दूसरे पर दोषारोपण कर रही थीं।

130 विकासशील देशों के समूह जी77 ने ओबामा पर आरोप लगाया कि, “ओबामा ने अमरीका के लिए कार्बन उत्सर्जन को कम करने की बात से इंकार करके गरीब देशों को हमेशा के लिए गरीबी में ढकेल दिया है।” एक प्रवक्ता ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कोपेनहेगन की असफलता जलवायु परिवर्तन के इतिहास में सबसे बुरी घटना है।

पाबलो सोलोन, संयुक्त राष्ट्र के बोलिवियन राजदूत ने मेजबान डेनमार्क पर आरोप लगाते हुए कहा कि ‘उंहोंने दुनिया के नेताओं के आगे मसौदा रखने से पहले मात्र कुछ देशों के समूह को ही तैयार करने के लिए दे दिया। यह कैसे हो सकता है कि 190 देशों को दर किनार करके मात्र 25-30 देश अपनी ही खिचड़ी पकाकर बाकी देशों को परोस दें। इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।‘

लेकिन दूसरी ओर अमीर देशों ने अपने पक्ष को मजबूत करते हुआ कहा कि विकासशील देशों ने एक ठोस बातचीत की बजाय प्रकिया पर ज्यादा वक्त जाया किया है।

वार्ता के तुरंत बाद हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ब्राउन ने कहा, कि यह तो बस एक पहला कदम है, इसे कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाने से पहले बहुत से कार्य किए जाने हैं। एक सवाल का जवाब देते हुए उंहोंने इसे ऐतिहासिक कॉन्फ्रेंस मानने से भी इंकार कर दिया। ओबामा भी विश्व नेताओं के सामने काफी विचलित से दिख रहे थे। हालांकि अमरीका से हिलेरी क्लिंटन ने घोषणा की थी कि अमरीका विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटने के लिए 100 बिलियन डॉलर की मदद करेगा लेकिन ओबामा ने गरीब देशों को सहायता मुहैया कराने और कार्बन उत्सर्जन में कमीं करने का कोई दावा नही किया।

अपनी बातचीत में ओबामा ने यह तो कहा कि अमरीका क्लीन एजेंडा अपनाएगा। लेकिन विकासशील देश इस बात से निराश थे कि ये सब कहने के लिए हैं लिखित रूप से कोई भी दावा नहीं किया गया। इतना ही नहीं, जिस जलवायु परिवर्तन संबंधी कानून के लिए पर्यावरणीय संगठन कईं महीनों से मांग कर रहे थे उंहोंने सीनेट को कोई कानून बनाने के लिए दबाव नहीं डाला।

मसौदे में यह सदिच्छा तो है कि ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री की सीमा पर ले आना चाहिए लेकिन इसमें कोई कानूनी बाध्यता नहीं रखी गई। मसौदे को तैयार करने वाले ब्राउन सहित सभी 28 देशों ने आज सवेरे वार्ता को अगले साल दिसम्बर 2010 तक के लिए स्थगित करने का प्रस्ताव रखा जब तक संयुक्त राष्ट्र की मेक्सिको में जलवायु परिवर्तन पर अगली बैठक नहीं हो जाती।

लेकिन कोपेनहेगन से जो मसौदा सामने आया है वह न केवल दुनिया में शक्ति संतुलन सुनिश्चित कर सकता था बल्कि भावी पीढ़ियों का भविष्य भी निर्धारित कर सकता था। लेकिन यह समझौता बिना किसी ठोस निष्कर्ष के फ्लॉप हो गया। कोपेनहेगन वार्ता निम्न बिंदुओं पर फ्लॉप हो गईः

तापमान : "ग्लोबल तापमान में वृद्धि 2 डिग्री से कम होनी चाहिए।"
इससे 100 से भी ज्यादा देश निराश हो गए जो तापमान में अधिकतम 1.5 डिग्री की कमीं चाहते थे, इसमें वे सभी छोटे-छोटे द्वीपीय देश भी शामिल हैं जो इस बात से भयभीत हैं कि इस लेवेल पर भी उनके घर डूब ही जाएंगे।

कार्बन उत्सर्जन के लिए समय सीमा
"हमें वैश्विक और राष्ट्रीय उत्सर्जन की सीमा को जल्द से जल्द पाने के लिए के लिए सहयोग करना चाहिए, इस बात को ध्यान में रखते हुए कि विकासशील देशों में यह समय ज्यादा लग सकता है…" इस वक्तव्य से वे देश निराश हो गए जो कार्बन उत्सर्जन के लिए एक तिथि निर्धारित करना चाहते थे।

"सभी पक्ष इस बात का वादा करते हैं कि वे व्यक्तिगत रूप से या मिलकर 2020 तक तार्किक रूप से कार्बन उत्सर्जन लक्ष्य में कटौती करेंगे। "
इस तथ्य के अनुसार विकसित देशों को अपने मध्यकालीन लक्ष्य तक तुरंत पहुंचने के लिए अभी से काम शुरु करना होगा। अमरीका को 2005 के स्तर पर 14-17फीसदी कमीं करनी होगी, यूरोपीय संघ को 1990 के स्तर पर 20-30फीसदी, जापान को 25 और रूस को 15-25फीसदी की कटौती करनी होगी।

"वनों की कटाई को रोकने, अनुकूलन, प्रौद्योगिकी विकास और हस्तांतरण और क्षमता के लिए पर्याप्त वित्त का मामला"
यह बहुत ही जटिल है क्योंकि 15 फीसदी से भी ज्यादा कार्बन उत्सर्जन के लिए पेड़ों के कटाव को जिम्मेदार माना गया है। वार्ता में शामिल समूहों का मानना है कि इस तर्क में सुरक्षा मानकों की कमीं है।

पूंजी: "विकसित देशों ने एक साथ मिलकर यह वादा किया है कि 2010-12 तक 30 बिलियन तक की कीमत वाले नए और अतिरिक्त संसाधनों को मुहैया कराएंगे.... विकसित देशों ने लक्ष्य निर्धारित किया है कि विकासशील देशों की जरूरतों को पूरा करने के लिए वे सब मिलकर 2020 तक प्रतिवर्ष 100 बिलियन डॉलर इकट्ठा करेंगे।"
हालांकि अमीर देशों नें विकासशील देशों के प्रयासों के लिए शीघ्र आर्थिक सहयोग देने की बात कही है। दीर्घकाल में, बड़ा फंड कोपेनहेगन ग्रीन क्लाइमेट फंड में जाएगा। लेकिन समझौते में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि यह फंड कहां से आएगा, और इसका इस्तेमाल कैसे होगा।

वार्ता में दरकिनार किए गए पूर्व मसौदे के मुख्य तत्व:
वार्ता में क्योटो को परिवर्तित करने का प्रयास किया गया है। क्योटो का साफ कहना था कि "हमारा दृढ़ निश्चय है जलवायु परिवर्तन पर एक या अधिक नए कानूनी साधनों को अपनाना होगा…"। दरअसल यह प्रस्तावना ही अमार देशों के वार्ताकारों के सामने सबसे बड़ी बाधा थी। इससे यह सवाल खड़ा हुआ कि क्योटो प्रक्रिया को बरकरार रखा जाए या नहीं।

सब जानते हैं कि संधि के लिए डेडलाइन की बात का काफी गंभीर मतलब है, लेकिन मसौदे के अंतिम रूप में इस तय समय सीमा को छोड़ दिया गया और कहा गया कि यह अगले साल होगा।

हसरतों को पंख मिलने के उम्मीद में लोग कोपेनहेगन सम्मेलन को होपेनहेगन नाम से बुला रहे थे, पर अब लोग बहुत बूरी तरह गुस्से में और दुखी हैं। जब कई देशों के नेता कोपेनहेगन से रवाना हो रहे थे, तो ब्रिटेन के ग्रीनपीस के कार्यकारी निदेशक जॉन सॉवेन ने बीबीसी से कहा कि कोपेनहेगन एक ऐसी अपराधभूमि की तरह लग रहा है जहाँ से अपराधी स्त्री-पुरुष एयरपोर्ट की ओर रवाना हो रहे हैं।
(इंडिया वाटर पोर्टल हिन्दी)

रविवार, 20 दिसंबर 2009

'साहित्यिक बाजारवाद' की जय हो!

हिन्दी के एक अग्रणी अराष्ट्रीय-अवामपंथी आलोचक 'साहित्यिक बाजार-युग' के प्रारंभ से अति-उत्साहित हैं। इतिहास के बाद न जाने किस-किस का अंत करवा चुके इन महानुभव की खुशी के आगे हिन्दोस्ता में नयी आर्थिक नितीयों का आगाज करने वाले माननीय मनमोहन सिंह जी व उनके मळंलीबाज चिदंबरम, मौंटेक की खुशी भी फिकी पड़ती नजर आती हैं। अब हो भी क्यो न हर क्षेत्र का बाज़ारीकरण हो गया लेकिन ये साहित्य वाले थे कि कुछ समझने को ही तैयार नहीं थे जब देखो तब साम्राज्यवाद मुर्दाबाद - पूंजीवाद मुर्दाबाद की रट लगाये रखते थे। अरे साहित्य सृजन हाय-हाय के बगैर भी तो हो सकता है, लिखने के लिए चिर-विरोध, विक्षुब्ध सतत, नित क्रांति-क्रांति की अनिवार्यता भला क्यो? लेखक को मानवीय मूल्यों, अन्याय, समाज में फैली असमानताओं के विरोध में लिखने की आखिर जरूरत क्या है, इन लेखकों ने वैश्वीक बाजार में हमारी बड़ी इकन्नी करवायी है, अरे ये शाईनिंग इंडिया या विजन 2020 पर भी तो कलम-कीबोर्ड़ तोड़ सकते है। इलेक्ट्रानिक मीडिया तो जन्मजात बाजारू था लेकिन बाजारवाद ने धीरे-धीरे प्रिंट मीडिया को भी अपना कर ही लिया। ये न समझो की पत्रकारों ने अपने संस्कार झुटला दिये हो, लेकिन ये संतोष की बात है कि इनकी आवाज़ पर कम-अस-कम लगाम तो लगा कर रखी जा सकी है। पर हाय रे ये लेखक गीता के लिखे को भी झुटलाने पर तुले रहे और परिवर्तन के नियम का विरोध करने तक से बाज़ नहीं आये। नौकरी करे बाजारूओं की ओर लेखनी चलाये उन्हीं के खिलाफ, अरे नामुरादो तुमने जिस थाली में खाया उसी में छेद किया। ये गरीब-शोषित-अन्याय के शिकार निरीह लोग तुम्हारा पेट थोडे ही भरते है, रोजी के लिये तो तुम्हें आखिरकार बाजार के ही पास आना पडता हैं। ब्लाग-आरकुट-फेसबुक हर कही तुम हिन्दी के साम्राज्यविरोधी साहित्यकारों-लेखको का साम्राज्य फैला हुआ है। अरे ये तो हद ही हो गयी तुम लोगो ने बाजार प्रदत्त तकनीकी को भस्मासुर बनवा डाला। सही ही है हर सिक्के के दो पहलू होते है, अब आप ही देखिये औपनिवेशिक ताकतों ने दुनियाभर के संसाधनों व मूल्कों के बटवारे के लिये जिन हथियारों को बनाया उन्हीं हथियारों का उपनिवेश-विरोधी ताकतो ने उपनिवेशवादियों के खिलाफ जमकर इस्तेमाल किया।

हिन्दास्तान की भूखी-गरीब जनता के लिये कलम तोडने वाले भी उनके समान भूखे-गरीब ही होंगे। अब सरकार या साहित्य अकादमिया दिखावे के लिये ही सही भूखे-नंगो के इन हिमायतीयों का खर्चा भला क्यों कर उठाये, कितनी ही कम राशी के क्यो न हो टुच्चे पुरस्कार भला क्यो बाटे? जब सबकुछ बाजार के हवाले किया जा चुका हैं ऐसे में सरकार साहित्य अकादमियों के लिये दाता क्यों बनी रहें? अब इन अकादमियों की जिम्मेंदारी सरकार के कंधो से हटाकर सीधे बाजार के हवाले कर दिये जाने का वक्त आ गया है। टीवी के टैंलेन्ट हंट या क्रिकेट-फुटबाल प्रतियोगिताओं की ही तरह साहित्य के पुरस्कार भी प्रायोज्य किये जाने चाहिये। इनका चयन भी सीधे जनता द्वारा एस.एम.एस. के ट्रांसपरेन्ट सिस्टम से होना चाहिये, फिल्म फेयर अवार्डो की तरह साहित्य के क्षेत्र में भी बडे-बडे आयोजन होने चाहिये, जिसमें इंडिया के गणमान्य नागरिकों का गेट-टुगेदर किया जा सके।

बाजार हिन्दी में खतरनाक मिथ की तरह देखा जाता है? खतरनाक मिथ मानने-मनवाने तक तो ठीक था पर हद तो ये है कि लेखक इसे खतरनाक वास्तविकता सिद्ध करने पर तुले पडे है। घोर कलिजुग है भाई लोगो को सच बताने की क्या जरूरत है? खुदा-न-खास्ता हिन्दोस्तान की भूखी-गरीब जनता इनके बहकावे में आ गयी तो क्या होंगा? कही यह इंडियावालों के शायनिंग ड्रीम को चकनाचुर करके न रख दे। ये सब बाते इन बुतशिकनो को भला कौन समझाये। लेकिन अब हमारे सुसंस्कृत संस्कृति मंत्रालय प्रभारी सिंग इज किंग के सानिध्य में साहित्य अकादमी के खैरख्वाहों ने इनको निपटाने के पुरजोर इंतजामात किये हैं। अब ऐसा तो नहीं है कि सभी लेखक एक जैसे होते है, कई नामवंत नमकहलाल भी है। अनेकों ऐसे भी है जिन्हें पूंजीवाद-साम्राज्यवाद, गरीब और गरीबो से कोई लेना देना नहीं है, सिर्फ अड्डेबाजी की जगह व विषय की तलाश उन्हें जनवादी-प्रगतिशीलों के साथ जाने को मजबुर करती है। अब साहित्य के बाजारीकरण की पहल से ये उम्मीद जगी है कि इन बीच का रास्ता अख्तियार किये लेखकों को दक्षिण में खिचा जा सकेंगा व बचे-खुचे अस्सल वामपंथी जनवादी-प्रगतिशीलों को आसानी से चुन-चुनकार निपटाया जा सकेंगा। धन्य हों अग्रेंजो का क्या गजब की पालिसी सिखा गये हमें। सैमसंग ने राष्ट्रकवी टैगोर के नाम से साहित्यकारों के लिये पुरस्कार प्रायोजित करने की जो घोषणा की है, बाजार के लिये बहुत अच्छा संकेत है। हिंदी के पूंजीरहित बाजार में पूंजी निवेश की भारी संभावने जगी हैं, सैमसंग जैसी मल्टीनेशनल कंपनी का इस क्षेत्र में प्रवेश एक नयी सदी का आगाज है। मजलूमों की बाते करते लेखक व उनके प्रेमचंदी संघो को अब इतिहास के कूडेदान में फेंक दिया जायेगा। इलेक्ट्रानिक-प्रिंट मिडिया की भांती अब साहित्य में भी 'काम दे - दाम ले' की संस्कृति का ही बोलबोला होंगा। 'साहित्यिक बाजारवाद' की जय हो!

कुछ बुद्घिजीवीछाप लोग सैमसंग द्वारा की गयी जालसाजीयों की खबरे बाजार में परोस रहे है। जालसाजीया बाजारवाद का एक अहम हिस्सा है, इसके बगैर भला बाजारवाद चल सकता हैं क्या? वामपंथी जनवादी-प्रगतिशील और उनके लेखक संगठन भी साहित्य में पूंजी के इस घालमेंल का कड़ा विरोध कर रहें है। वैसे उन्हें इस मुद्दे पर बोलने का कोई हक नहीं है, अस्सल जनवादी-प्रगतिशील साहित्यकारो-लेखको को साहित्य के पुरस्कार दिये ही नहीं जाते है या दिये जाते भी है तो अधिकांश इन्हें लेने से साफ इंकार कर देते है। फ्री लंच-डीनर-दारू के लोभ से परे जलेस-प्रलेस-जसम के ज्ञानेंद्रपति, लीलाधर जगूड़ी, राजेश जोशी, अरुण कमल, विरेन डंगवाल, मंगलेश डबराल और इनके जैसे अनेकों मनसा-वाचा-कर्मणा नई आर्थिक व्यवस्था और नव-साम्राज्यवाद के सक्रिय विरोधीयों को साहित्य अकादमी में बैठे मठाधीशों ने किनारें करके रखा है। लेकिन विडंबना देखिये फिर भी ये हिन्दी के नवीन बिंदास पाठक-पाठिकाओं के हीरों है।

बुधवार, 5 अगस्त 2009

Hiroshima Day

Hiroshima Child

I come and stand at every door
But none can hear my silent tread
I knock and yet remain unseen
For I am dead for I am dead

I'm only seven though I died
In Hiroshima long ago
I'm seven now as I was then
When children die they do not grow

My hair was scorched by swirling flame
My eyes grew dim my eyes grew blind
Death came and turned my bones to dust
And that was scattered by the wind

I need no fruit I need no rice
I need no sweets nor even bread
I ask for nothing for myself
For I am dead for I am dead

All that I need is that for peace
You fight today you fight today
So that the children of this world
Can live and grow and laugh and play

by Nazim Hikmet

शनिवार, 25 जुलाई 2009

रूसवा है वतन दुनिया भर में

इक हश्र बपा हैं घर-घर में, दम घुटता हैं गुंबद-ऐ-बेदर में।
इक शक्स के हाथों मुद्दत से, रूसवा है वतन दुनिया भर में।


Nuke deal: Just Rs 300cr cover for accidents
Win-Win Situation for Multinational Firms & Manmohan Singh
Lost game for Aam Adami

शुक्रवार, 2 जनवरी 2009

अलविदा 008

आतंकवाद के खिलाफ राष्ट्रवाद
चेला : आतंकवाद किसे कहते है?
उस्ताद : मुसलमान बम फोड़े तो उसे आतंकवाद कहते हैं।
चेला : राष्ट्रवाद किसे कहते है?
उस्ताद : हिन्दू बम फोड़े तो उसे राष्ट्रवाद कहते हैं।

राष्ट्रवाद के खिलाफ देशभक्ति
चेला :
राष्ट्रवादी कौन होते है?
उस्ताद : प्रतियोगी राष्ट्रो के मुकाबले अपने राष्ट्र विशेष की श्रेष्ठता के दावे को मजबूत करने के खातिर राष्ट्रपिता को गोली मार देश को अनाथ बनाने का पराक्रम दिखाने वाले राष्ट्रवादी होते है।
चेला : ये देशभक्त कौन होते है?
उस्ताद : साम्राज्यवाद-सांप्रदायवाद की शोषण आधारित व्यवस्था को चुनौती पैश कर मातृ अथवा पितृभूमि को गुलामी की जंजीरो से मुक्त कराने के खातिर हसते-हसते फासी का फंदा चूमने वाले – सीने पर गोली खाने वाले देशभक्त होते है।

बस वोही घर चला रहा है
चेला : क्यो उस्ताद कैसे हो?
उस्ताद : अब क्या बताये …
उस्ताद : छोटा भाई शेयर ब्रोकर है …
उस्ताद : एक भतीजा जेट में था, तो दूसरा रिलायंस रिटेल में…
उस्ताद : बडा बेटा इंजिनियरिंग कर रहा है सत्यम में कैंपस प्लेस्ड हुआ है…
चेला : बहुत बुरा हुवा उस्ताद! पर अब घर कौन चला रहा है?
उस्ताद : सबसे छोटा पानवाला है …
उस्ताद : बस वोही घर चला रहा है।

रविवार, 26 अक्टूबर 2008

Marx is back


Hasan Suroor

LONDON: With capitalism in crisis, Karl Marx has become fashionable again in the West. Das Kapital, his seminal work, is set to become a best-seller in Europe.


In his native Germany, copies of Das Kapital are reported to be "flying off the shelves" as failed bankers and free-market economists try to make sense of the global economic meltdown.
Jorn Schutrumpf, head of the Berlin publishing house Dietz, is reported as having said that the sales of the works of Marx, and Friedrich Engels, have trebled. "Marx is fashionable again…We have a new generation of readers who are rattled by the financial crisis and have to recognise that neo-liberalism has turned out to be a false dream," he told The Times.


A dramatic rise has been reported in the number of visitors to Marx’s birthplace in Trier. And film-maker Alexander Kluge is planning to turn Das Kapital into a movie.


Western leaders who once sneered at Marx’s dense tome, breezily dismissing it as a "doorstop," have been seen flaunting Das Kapital in recent weeks. French President Nicolas Sarkozi has been spotted "flicking through" it, German Finance Minister Peer Steinbruck has said nice things about it, and even the Pope has praised the book for its "great analytical" quality.
Archbishop of Canterbury Rowan Williams recalled Marx’s analysis of capitalism , saying: "Marx long ago observed the way in which unbridled capitalism became a kind of mythology, ascribing reality, power and agency to things that had no life in themselves."


Free-market cheerleaders such as The Times and The Daily Telegraph have become interested in Marx. There has been a wave of soul-searching analyses of whether he was right, after all.


गुरुवार, 18 सितंबर 2008

Spy comes to SAHMAT

Now the state is spying on SAHMAT, India's leading secular platform for artists.

New Delhi, Sept. 12: A “spy” sat staring at his polished shoes locked up in the small office of cultural group Sahmat for almost an hour today, after hamhanded snooping blew his cover and gave a telling insight into the working of the Intelligence Bureau.

“I am an FCRA (foreign contribution regulation) official and am here on official duty,” Praveen Sharma (name changed) insisted, fidgeting with his phone.

But Rajendra Prasad, the Sahmat member he had first approached with the introduction and a long list of queries, was not buying this any more. He had called police.

Sahmat, set up in January 1989 after actor, poet and political and street theatre activist Safdar Hashmi was killed performing a play 20km from Delhi, brings together a cross-section of people to defend democracy and freedom of expression.

In white T-shirt and grey pants, the bespectacled Sharma had walked into its office posing as an FCRA official under the home ministry.

“He wanted to know every detail of the organisation, and I gave it to him. I didn’t even ask for his identity card. He initially started with who the members of the organisation were and also details of the kind of work we do. He asked me if Sahmat took foreign funds for their work, and when I said no, he said if I was offered, would I take it? I had no problems answering those questions,” Prasad said.

Then he named two people, who he said were connected with the Maharashtra blasts, and asked me if I knew them. I realised he was asking me if our group had connections with terrorists. That’s what made me suspicious. I asked for his identity card and he just flashed some card at me. I asked him which blasts he was talking about, and he couldn’t even answer that,” the Sahmat member said.

Soon, Sharma had been locked up and the police called.

“It’s the recent blasts in Maharashtra,” Sharma said in answer to this correspondent’s question as he tried to contact his bosses.

So where was his office? Sharma didn’t remember.

When the police arrived, the mystery was solved. “He is with the Intelligence Bureau and it was his mistake that he barged into Sahmat’s office and intimidated them. Sahmat can officially register a case if they want,” the Parliament Street SHO, Vijay Chandel, said before the police took him away.

It is not uncommon for officials of the Intelligence Bureau, the country’s internal spy agency, to make discreet enquiries about organisations. But to go about it as Sharma did provides a clue perhaps to the intelligence failures blamed for blast after blast.

“What’s completely unacceptable is that at the time of the incident, there were two artistes in the room — young women, one from Pakistan and the other a Bangladeshi, who are in the country for an international art workshop. He made such a fuss about their nationalities that they ran away from the spot,” said photographer Ram Rahman.

Courtesy: Commualism Watch
Read more: http://www.pragoti.org/node/2048