स्याहफाम सौदागर
मजदूर की आंख में रोजी का सपना
भूखे की आंख में रोटी का सपना
बरहना की आंख में कपड़े का सपना
बेघर की आंख में मकान का सपना
किसान की आंख में मानसून का सपना
तालिब इल्म की आंख में तरक्की का सपना
दुनिया की इस सबसे बड़ी ख्वाबिदा मंड़ी में
सपनों के करोडों सौदो का हसीन सपना संजोये
कल सपनों का स्याहफाम सौदागर आया था
अपने सपने को हकीकत में बदलने।
बहुत धन्यवाद जय-हिन्द
उसने रोजी मांगी
हम हसते-हसते बेरोजगार हो गये
उसने रोटी मांगी
हम हसते-हसते दाने-दाने को मोहताज हो गये
उसने गिरवी पड़ा मकान मांगा
हम हसते-हसते बेघरबार हो गये
उसने कपड़ा मांगा
हम हसते-हसते दिगम्बर तक हो लिये
हमने इक अपना हक मांगा
वो हसते-हसते बोला सूपरपॉवर बहुत धन्यवाद जय-हिन्द।
हत्यारा
गगनचुम्बी इमारते, मॉल, तकनीकी
विलासिता का हसीन मायाजाल
साम्राज्यवादी अर्थविदों का अनगढ
नास्त्रेदेमस भविष्यवाणीयों का चक्रव्यूह
लहुलुहान फिलीस्तीन-अफगान-इराक
विषैला नागासाकी-भोपाल-विएतनाम
भूखी-प्यासी-नंगी तीसरी दुनिया
दाने-दाने को मोहताज
खुदकुशी के ताल पे थिरकती
किसानों की जान
मुक्त-बाजार का कोलाहल और
आज का सबसे कीमती जिंन्स
यतीम सताये हुवे बच्चे और उनकी
बेवा मां के आंख से उतरता खूं
खूं से वजू कर रहें
तुम भी तो हो
महात्मा गांधी-मार्टिन लूथर किंग जूनियर
के हत्यारे।
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मंगलवार, 9 नवंबर 2010
स्याहफाम सौदागर
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बाजारवाद
गुरुवार, 10 दिसंबर 2009
कोप से होप के बजाय निकल रहे हैं गुप्त मसौदे
मीनाक्षी अरोरा
कोपेनेहेगेन जलवायु वार्ता जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे आशा-उम्मीदों के दिये कमजोर पड़ते जा रहे हैं। धरती गरम होती जा रही है, दुनिया के सैकड़ों द्वीप डूबने के कगार पर हैं, भारत के सुंदरवन के ही चार से ज्यादा द्वीप डूब चुके हैं, ऐसे में भी विकसित देश कोपेनेहेगेन जलवायु वार्ता में भी मुद्दे को छोड़कर अपनी चालबाजियों को अंजाम देने पर ही ज्यादा आमादा हैं, उनके कई गुप्त एजेंडे पर्दे पर आने शुरू हो गये हैं।
7-18 दि
संबर तक चलने वाले संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सभा (यूएनएफसीसी) के कोपेनहेगन सम्मेलन के बीच की कई अंदरूनी जानकारियां अब बाहर आ रही हैं। इन जानकारियों के मद्देनजर कोप15 से कोई होप नजर नहीं आ रही है। ऐसा लगता है कि कोप 15 सचमुच विकासशील देशों पर कोप का अखाड़ा बनता जा रहा है और विकसित देश फिर अपने विनाशकारी उपभोग की जीवनशैली को हर कीमत पर सुरक्षित रखते हुए विकासशील और गरीब देशों को हर कीमत चुकाने के लिए तैयार करने पर लग गये हैं।
जलवायु वार्ता उस समय अमीर-गरीब वार्ता मे बदल गई जब विकासशील देशों ने एक गुप्त दस्तावेज लीक होने के बाद नाराजगी और विरोध जाहिर किया है। लीक हुए दस्तावेज से यह साफ हो गया कि अगले सप्ताह दुनिया के नेताओं को एक ऐसे समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा जाएगा जिससे न केवल अमीर देशों की शक्तियां बढ़ेंगीं बल्कि जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र की भूमिका भी सीमित हो जाएगी। ऐसे में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर किसी संभावित समझौते के मामले में अमीर और विकासशील देशों के बीच मतभेद गहरा गया है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सम्मलेन के दूसरे दिन ही मेज़बान देश डेनमार्क का मसौदा लीक हो गया है। इसे अमीर देशों की ओर से तैयार किया गया है। इस रहस्यमयी तथा-कथित समझौते पर मात्र कुछ लोगों द्वारा काम किया गया है, जिसे ‘सर्किल ऑफ कमिटमेंट’ का नाम दिया गया है- हैरानी की बात तो यह है कि जिस समझौते पर दुनिया के नेता हस्ताक्षर करने वाले हैं और इसी सप्ताह उसे अंतिम रूप दिया जाना है उसे ब्रिटेन, अमरीका और डेनमार्क सहित कुछ मुट्ठीभर देशों को ही दिखाया गया है।
बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार पर्यावरणविदों के मुताबिक़ यह मसौदा अमीर देशों के प्रति बहुत नरम है। विकासशील देशों का मानना है कि इस दस्तावेज में 2050 तक प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन में भी विकसित और विकासशील देशों के बीच बनाई गई सीमा में भी असमानता है। यानी कि अब अमीर देशों को दोगुना कार्बन उत्सर्जन करने की भी इजाजत मिल जाएगी। इतना ही नहीं इसमें विकासशील देशों को पर्याप्त धन देने का भी सुझाव नहीं है ताकि वे बढ़ते तापमान का मुकाबला करने के उपाय लागू कर सकने में सक्षम हों।
पर्यावरणविदों का तो यहां तक कहना है कि कोपेनहेगेन सम्मेलन का एक तात्कालिक उद्देश्य यह भी है कि क्योटो जलवायु संधि के बाद की संधि पर सहमति बने। क्योंकि क्योटो संधि की अवधि 2012 में ख़त्म हो रही है लेकिन यह मसौदा क्योटो प्रोटोकाल को भी नकार रहा है जिसमें अमीर देशों को ही सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार मानकर एक बाध्यकारी समझौता करने के लिए कहा गया था।
दुनिया की लगभग 15 प्रतिशत आबादी का नेतृत्व कर रहे दुनिया के लगभग 85 प्रतिशत संसाधनों का उपभोग कर रहे विकसित देश किसी कीमत पर अपनी अय्याशी छोड़ना नहीं चाहते। 1992 में ‘रियो द जेनिरो’ (ब्राजील) में हुए पहले पृथ्वी सम्मेलन में जब किसी ने यह कह दिया कि पृथ्वीग्रह के विनाश के लिए अन्य कारणों के साथ-साथ पश्चिम के लोगों का अति उपभोग भी जिम्मेदार है तो वहां उपस्थित तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश (सीनियर) तपाक से बोल पड़े-हमारी जीवनशैली पर कोई बहस नहीं हो सकती है। कहीं कोपेनेहेगेन में चल रहे गुप्त मसौदे के पीछे भी यही मंशा तो नहीं है।
संयुक्तराष्ट्र को किनारे करने की कोशिश
चूंकि यह मसौदा गुप्त रूप से तैयार किया गया है इसलिए इसके पीछे की मंशा साफ जाहिर हो रही है कि जब अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा वार्ता में पहुंचे तो पूरी पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी हो और सभी नेता उनके एक इशारे पर चुपचाप इस रहस्यमयी समझौते पर हस्ताक्षर कर दें। एक कूटनीतिज्ञ के अनुसार यह सब इसलिए किया जा रहा है ताकि संयुक्त राष्ट्र की जलवायु वार्ता प्रक्रिया का पूरी तरह अंत हो जाए। मसौदा संयुक्तराष्ट्र को दरकिनार करके जलवायु परिवर्तन की बातचीत में विश्व बैंक की भूमिका गुप्त रूप से बना रहा है। क्योंकि विश्व बैंक में लोकतंत्र नहीं है। “वन कंट्री – वन वोट’ के सिद्धान्त पर चलने वाला संयुक्तराष्ट्र अमेरिका के लिए असुविधा पैदा करता है। ‘जितनी पूंजी, उतना वोट’ के सिद्धान्त पर चलने वाला विश्व बैंक अमेरिका के लिए ज्यादा काम का है।
विश्व बैंक की भूमिका
ऑक्सफैम इंटरनेशनल के क्लाइमेट सलाहकार एंटोनियो हिल के अनुसार ‘इस मसौदे में एक ग्रीन फंड का भी प्रस्ताव है जिसका प्रबंधन करने के लिए एक बोर्ड होगा, लेकिन उसका सबसे खतरनाक पहलू ये हैं कि यह सब विश्व बैंक और ग्लोबल इनवायरनमेंट फैसिलिटी के हाथ में रहेगा। ग्लोबल इनवायरनमेंट फैसिलिटी 10 एजेंसियों का एक साझा समूह है जिसमें विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम शामिल हैं, लेकिन संयुक्त राष्ट्र शामिल नहीं है। इस तरह यह मसौदा फिर से विकासशील देशों की बातचीत में बाधा डालने की अनुमति अमीर देशों को दे रहा है।
यह मसौदा डेनमार्क और दूसरे अमीर देशों ने एक कार्यकारी एजेंडे के तौर पर तैयार किया है, जिसे सभी देश अगले सप्ताह स्वीकार करेंगें। ऊपरी तौर पर अच्छा लगने वाला यह मसौदा वास्तव में बहुत खतरनाक साबित होगा क्योंकि इसमें संयुक्त राष्ट्र की वार्ता प्रक्रिया को दरकिनार कर दिया गया है और अमीर देशों की तानाशाही स्थापित की गई है।
एंटोनियो हिल ने स्पष्ट तौर पर कहा भी है, हालांकि यह एक मसौदा है लेकिन इसमें खतरा साफ दिखाई दे रहा है, जब-जब अमीर देश हाथ मिलाते हैं और एक होते हैं तो गरीब देश को दबा देते हैं। मसौदे मे बहुत सी खामियां हैं इसमें ऐसा कुछ भी नहीं कहा गया है कि कार्बन उत्सर्जन में 40 फीसदी कटौती होनी चाहिए जैसा कि विज्ञान के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग के खतरे से निपटने के लिए जरूरी है।
हालांकि इसमें ये वादा किया गया है कि दुनिया भर के देश जलवायु परिवर्तन के कारण हो रहे तापमान में बढ़ोत्तरी को दो फ़ीसदी से भी कम रखेंगे और तापमान में बढ़ोत्तरी को दो सेंटीग्रेट से कम रखने की बात हैं लेकिन यह नहीं बताया गया है कि अमीर देश इस पर किस तरह अमल करेंगे। यह बहुत ही ख़तरनाक है। पर्यावरण से जुडी संस्था फ्रेंड्स ऑफ़ अर्थ के कार्यकारी निदेशक एंडी एटकिन्स का कहना है कि यह मसौदा पहली नज़र में बहुत अच्छा दिखता है, पर है बहुत ख़तरनाक। इसमें क्योटो प्रोटोकोल की अनदेखी की जा रही है।
बीबीसी की एक जानकारी के अनुसार क्योटो में 1997 में हुई संधि की सबसे मुख्य मुद्दा औद्योगीकृत देश ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को 1990 के स्तर से क़रीब सवा पाँच प्रतिशत कम करने का था। क्योटो संधि बाध्यकारी नहीं थी और अमरीका ने इस पर हस्ताक्षर भी नहीं किए थे। इसलिए इससे ज़्यादा उम्मीदें लगाई भी नहीं गई थीं। कोपेनहेगेन के जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में कोशिश, क्योटो संधि से कहीं ज़्यादा महत्वाकांक्षी संधि पर सहमति बनाने की है जो कि क़ानूनन बाध्यकारी भी हो। लेकिन असलियत में यह किसके लिए बाध्यकारी होगा यह बताने की शायद अब जरूरत जरूरत नहीं रह गया है।
फिलहाल तो पर्यावरण के सुधरने की संभावना कम ही नजर आ रही है, उपभोगवादी जीवनशैली, अंधाधुंध औद्योगीकरण, कंक्रीट के बढ़ते जंगल, खेती का नाश, जल-जंगल-जमीन पर पूजीपतियों का कब्जा, नदियों, तालाबों और समुद्र को जहरीला होने से नहीं रोका गया, तो कोपेनहेगन जैसे सम्मेलन भी बेनतीजा ही रहेंगे।
इंडिया वाटर पोर्टल (हिन्दी) hindi.indiawaterportal.org
कोपेनेहेगेन जलवायु वार्ता जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे आशा-उम्मीदों के दिये कमजोर पड़ते जा रहे हैं। धरती गरम होती जा रही है, दुनिया के सैकड़ों द्वीप डूबने के कगार पर हैं, भारत के सुंदरवन के ही चार से ज्यादा द्वीप डूब चुके हैं, ऐसे में भी विकसित देश कोपेनेहेगेन जलवायु वार्ता में भी मुद्दे को छोड़कर अपनी चालबाजियों को अंजाम देने पर ही ज्यादा आमादा हैं, उनके कई गुप्त एजेंडे पर्दे पर आने शुरू हो गये हैं।
7-18 दि
जलवायु वार्ता उस समय अमीर-गरीब वार्ता मे बदल गई जब विकासशील देशों ने एक गुप्त दस्तावेज लीक होने के बाद नाराजगी और विरोध जाहिर किया है। लीक हुए दस्तावेज से यह साफ हो गया कि अगले सप्ताह दुनिया के नेताओं को एक ऐसे समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा जाएगा जिससे न केवल अमीर देशों की शक्तियां बढ़ेंगीं बल्कि जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र की भूमिका भी सीमित हो जाएगी। ऐसे में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर किसी संभावित समझौते के मामले में अमीर और विकासशील देशों के बीच मतभेद गहरा गया है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सम्मलेन के दूसरे दिन ही मेज़बान देश डेनमार्क का मसौदा लीक हो गया है। इसे अमीर देशों की ओर से तैयार किया गया है। इस रहस्यमयी तथा-कथित समझौते पर मात्र कुछ लोगों द्वारा काम किया गया है, जिसे ‘सर्किल ऑफ कमिटमेंट’ का नाम दिया गया है- हैरानी की बात तो यह है कि जिस समझौते पर दुनिया के नेता हस्ताक्षर करने वाले हैं और इसी सप्ताह उसे अंतिम रूप दिया जाना है उसे ब्रिटेन, अमरीका और डेनमार्क सहित कुछ मुट्ठीभर देशों को ही दिखाया गया है।
बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार पर्यावरणविदों के मुताबिक़ यह मसौदा अमीर देशों के प्रति बहुत नरम है। विकासशील देशों का मानना है कि इस दस्तावेज में 2050 तक प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन में भी विकसित और विकासशील देशों के बीच बनाई गई सीमा में भी असमानता है। यानी कि अब अमीर देशों को दोगुना कार्बन उत्सर्जन करने की भी इजाजत मिल जाएगी। इतना ही नहीं इसमें विकासशील देशों को पर्याप्त धन देने का भी सुझाव नहीं है ताकि वे बढ़ते तापमान का मुकाबला करने के उपाय लागू कर सकने में सक्षम हों।
पर्यावरणविदों का तो यहां तक कहना है कि कोपेनहेगेन सम्मेलन का एक तात्कालिक उद्देश्य यह भी है कि क्योटो जलवायु संधि के बाद की संधि पर सहमति बने। क्योंकि क्योटो संधि की अवधि 2012 में ख़त्म हो रही है लेकिन यह मसौदा क्योटो प्रोटोकाल को भी नकार रहा है जिसमें अमीर देशों को ही सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार मानकर एक बाध्यकारी समझौता करने के लिए कहा गया था।
दुनिया की लगभग 15 प्रतिशत आबादी का नेतृत्व कर रहे दुनिया के लगभग 85 प्रतिशत संसाधनों का उपभोग कर रहे विकसित देश किसी कीमत पर अपनी अय्याशी छोड़ना नहीं चाहते। 1992 में ‘रियो द जेनिरो’ (ब्राजील) में हुए पहले पृथ्वी सम्मेलन में जब किसी ने यह कह दिया कि पृथ्वीग्रह के विनाश के लिए अन्य कारणों के साथ-साथ पश्चिम के लोगों का अति उपभोग भी जिम्मेदार है तो वहां उपस्थित तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज बुश (सीनियर) तपाक से बोल पड़े-हमारी जीवनशैली पर कोई बहस नहीं हो सकती है। कहीं कोपेनेहेगेन में चल रहे गुप्त मसौदे के पीछे भी यही मंशा तो नहीं है।
संयुक्तराष्ट्र को किनारे करने की कोशिश
चूंकि यह मसौदा गुप्त रूप से तैयार किया गया है इसलिए इसके पीछे की मंशा साफ जाहिर हो रही है कि जब अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा वार्ता में पहुंचे तो पूरी पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी हो और सभी नेता उनके एक इशारे पर चुपचाप इस रहस्यमयी समझौते पर हस्ताक्षर कर दें। एक कूटनीतिज्ञ के अनुसार यह सब इसलिए किया जा रहा है ताकि संयुक्त राष्ट्र की जलवायु वार्ता प्रक्रिया का पूरी तरह अंत हो जाए। मसौदा संयुक्तराष्ट्र को दरकिनार करके जलवायु परिवर्तन की बातचीत में विश्व बैंक की भूमिका गुप्त रूप से बना रहा है। क्योंकि विश्व बैंक में लोकतंत्र नहीं है। “वन कंट्री – वन वोट’ के सिद्धान्त पर चलने वाला संयुक्तराष्ट्र अमेरिका के लिए असुविधा पैदा करता है। ‘जितनी पूंजी, उतना वोट’ के सिद्धान्त पर चलने वाला विश्व बैंक अमेरिका के लिए ज्यादा काम का है।
विश्व बैंक की भूमिका
ऑक्सफैम इंटरनेशनल के क्लाइमेट सलाहकार एंटोनियो हिल के अनुसार ‘इस मसौदे में एक ग्रीन फंड का भी प्रस्ताव है जिसका प्रबंधन करने के लिए एक बोर्ड होगा, लेकिन उसका सबसे खतरनाक पहलू ये हैं कि यह सब विश्व बैंक और ग्लोबल इनवायरनमेंट फैसिलिटी के हाथ में रहेगा। ग्लोबल इनवायरनमेंट फैसिलिटी 10 एजेंसियों का एक साझा समूह है जिसमें विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम शामिल हैं, लेकिन संयुक्त राष्ट्र शामिल नहीं है। इस तरह यह मसौदा फिर से विकासशील देशों की बातचीत में बाधा डालने की अनुमति अमीर देशों को दे रहा है।
यह मसौदा डेनमार्क और दूसरे अमीर देशों ने एक कार्यकारी एजेंडे के तौर पर तैयार किया है, जिसे सभी देश अगले सप्ताह स्वीकार करेंगें। ऊपरी तौर पर अच्छा लगने वाला यह मसौदा वास्तव में बहुत खतरनाक साबित होगा क्योंकि इसमें संयुक्त राष्ट्र की वार्ता प्रक्रिया को दरकिनार कर दिया गया है और अमीर देशों की तानाशाही स्थापित की गई है।
एंटोनियो हिल ने स्पष्ट तौर पर कहा भी है, हालांकि यह एक मसौदा है लेकिन इसमें खतरा साफ दिखाई दे रहा है, जब-जब अमीर देश हाथ मिलाते हैं और एक होते हैं तो गरीब देश को दबा देते हैं। मसौदे मे बहुत सी खामियां हैं इसमें ऐसा कुछ भी नहीं कहा गया है कि कार्बन उत्सर्जन में 40 फीसदी कटौती होनी चाहिए जैसा कि विज्ञान के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग के खतरे से निपटने के लिए जरूरी है।
हालांकि इसमें ये वादा किया गया है कि दुनिया भर के देश जलवायु परिवर्तन के कारण हो रहे तापमान में बढ़ोत्तरी को दो फ़ीसदी से भी कम रखेंगे और तापमान में बढ़ोत्तरी को दो सेंटीग्रेट से कम रखने की बात हैं लेकिन यह नहीं बताया गया है कि अमीर देश इस पर किस तरह अमल करेंगे। यह बहुत ही ख़तरनाक है। पर्यावरण से जुडी संस्था फ्रेंड्स ऑफ़ अर्थ के कार्यकारी निदेशक एंडी एटकिन्स का कहना है कि यह मसौदा पहली नज़र में बहुत अच्छा दिखता है, पर है बहुत ख़तरनाक। इसमें क्योटो प्रोटोकोल की अनदेखी की जा रही है।
बीबीसी की एक जानकारी के अनुसार क्योटो में 1997 में हुई संधि की सबसे मुख्य मुद्दा औद्योगीकृत देश ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को 1990 के स्तर से क़रीब सवा पाँच प्रतिशत कम करने का था। क्योटो संधि बाध्यकारी नहीं थी और अमरीका ने इस पर हस्ताक्षर भी नहीं किए थे। इसलिए इससे ज़्यादा उम्मीदें लगाई भी नहीं गई थीं। कोपेनहेगेन के जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में कोशिश, क्योटो संधि से कहीं ज़्यादा महत्वाकांक्षी संधि पर सहमति बनाने की है जो कि क़ानूनन बाध्यकारी भी हो। लेकिन असलियत में यह किसके लिए बाध्यकारी होगा यह बताने की शायद अब जरूरत जरूरत नहीं रह गया है।
फिलहाल तो पर्यावरण के सुधरने की संभावना कम ही नजर आ रही है, उपभोगवादी जीवनशैली, अंधाधुंध औद्योगीकरण, कंक्रीट के बढ़ते जंगल, खेती का नाश, जल-जंगल-जमीन पर पूजीपतियों का कब्जा, नदियों, तालाबों और समुद्र को जहरीला होने से नहीं रोका गया, तो कोपेनहेगन जैसे सम्मेलन भी बेनतीजा ही रहेंगे।
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बुधवार, 5 अगस्त 2009
Hiroshima Day
Hiroshima ChildI come and stand at every door
But none can hear my silent tread
I knock and yet remain unseen
For I am dead for I am dead
I'm only seven though I died
In Hiroshima long ago
I'm seven now as I was then
When children die they do not grow
My hair was scorched by swirling flame
My eyes grew dim my eyes grew blind
Death came and turned my bones to dust
And that was scattered by the wind
I need no fruit I need no rice
I need no sweets nor even bread
I ask for nothing for myself
For I am dead for I am dead
All that I need is that for peace
You fight today you fight today
So that the children of this world
Can live and grow and laugh and play
by Nazim Hikmet
बुधवार, 13 अगस्त 2008
कामरेड फिदेल को 82 वे जन्मदिवस पर क्रांतिकारी बधाई
सलाम फिदेल
फिदेल कास्त्रो ने क्यूबा में सत्ता छोड़ने का एलान किया है। वे पिछले काफी वक्त से बीमार हैं। अमरीका और हर साम्राज्यवादी-पूंजीवादी की आँखों की किरकिरी कास्त्रो अमेरिका से लेकर दुनिया के हर कोने में न्याय के पक्षधर लोगों के दिलों पर राज करते हैं और इस बात का कोई अर्थ नही है कि वे अब सत्ता नहीं संभालेंगे। उन्होंने अपने जीवन का बेहद विवेक और बेमिसाल साहस के साथ जनता के लिए इस्तेमाल किया है और वे एक गहरे भरोसे की तरह हैं। अपने भगत सिंह और कास्त्रो के साथी चे की तरह ऐसे ढेरों उदाहरण मिलेंगे, जिन्होंने अपनी शहादत से मिसाल पेश कीं। लेकिन कास्त्रो के जीवन को देखकर अचरज ही होता है कि कैसे उन्होंने क्रांति की कमान संभाली, और फिर तमाम आर्थिक पाबंदियों के बावजूद देश में आम लोगों के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य की ऊँचे स्तर की सुविधाएँ मुहैया करायीं और इस समाजवादी ढांचे की सफलता से दुनिया भर के लोगों को रह दिखाई, लगातार एक बेहद सजग बुद्धिजीवी की तरह जटिल मसलों पर लिखते-बोलते रहे। यह अकारण नहीं है की उन्हें हजारों हज़ार ढंग से मारने की कोशिश करता रहा दुश्मन भी अपने मीडिया में उनकी उपलब्धियों को देखने को मजबूर रहा है। यह भी अकारण नही है कि वे इस वक्त समरज्य्वाद, पूंजीवाद और हर तरह के अन्याय के खिलाफ संघर्ष करने वालों के बीच सबसे ज़्यादा पढे जा रहे हैं और अपने यंहा भी उनके लगातार अनुवाद हो रहे हैं। नेरुदा और मर्ख्वेज जैसे कवि उन पर लिखते हैं। मर्ख्वेज की उन पर लिखी छोटी सी पुस्तक अद्भुत है।
एक जिद्दी धुन
27 फरवरी 2008
मंगलवार, 5 अगस्त 2008
Kız Çocuğu (The Little Girl)
6 अगस्त 1945 को अमेंरीकी द्वारा हिरोशीमा पर गिराये "Little Boy" परमाणु बम से उपजी मानवीय त्रासदी से व्यथित हो नाज़िम हिकमत ने अपनी कालजयी कृति Kız Çocuğu (The Little Girl) लिखी। जलेस साम्राज्यवादी ताकतो द्वारा विश्व पर थोपे तमाम युद्धो के हताहतो को श्रंद्धाजली देता है।
And for this child will never be
At Hiroshima do you see
Oh stranger please do this for me.
Kiz Cocugu
Kapýlarý çalan benim
Kapýlarý birer birer
Gözünüze görünemem
Göze görünmez ölüler
Hiroþima'da öleli
Oluyor bir on yýl kadar
Yedi yaþýnda bir kýzým
Büyümez ölü çocuklar
Saçlarým tutuþtu önce
Gözlerim yandý kavruldu
Bir avuç kül oluverdim
Külüm havaya savruldu
Çalýyorum kapýnýzý
Teyze, amca, bir imza ver
Çocuklar öldürülmesin
Þeker de yiyebilsinler
Nazým Hikmet
Kapýlarý çalan benim
Kapýlarý birer birer
Gözünüze görünemem
Göze görünmez ölüler
Hiroþima'da öleli
Oluyor bir on yýl kadar
Yedi yaþýnda bir kýzým
Büyümez ölü çocuklar
Saçlarým tutuþtu önce
Gözlerim yandý kavruldu
Bir avuç kül oluverdim
Külüm havaya savruldu
Çalýyorum kapýnýzý
Teyze, amca, bir imza ver
Çocuklar öldürülmesin
Þeker de yiyebilsinler
Nazým Hikmet
At every door, at every door.
And I am she you cannot see,
I am at your door, at every door.
I am at your door, at every door.
And for this child will never be
That love and laughter you have known.
At Hiroshima do you see
My flesh was seared to bone,
My flesh was seared to bone.
My hair was blue aflame,
Hot were my poor eyes, hot my hands.
Now just a trace of ash remains
Where I had played on smiling sands.
Stranger, what can you do for me,
This little ash, this little girl?
This human child like paper burned
Dry ash the cooling wind shall swirl,
Dry ash the cooling wind shall swirl,
Dry ash the cooling wind shall swirl
This little maid unseared by strife.
Oh stranger please do this for me.
Your name for mankind's peace and life,
And peace and life for all like me,
And peace and life for all like me.
Nazim Hikmet
Nazim Hikmet
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