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मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010

भारत में परम्पराओं को लेकर विचित्र रवैया - प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल

''साझी विरासत और कबीर की कविता'' विषय पर परिसंवाद
उदयपुर. एक कवि अपने सांस्कृतिक परिदृश्य में कितना बड़ा हस्तक्षेप कर सकता है,कबीर इसका उदाहरण हैं. प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल की चर्चित कृति ''अकथ कहानी प्रेम की'' के सन्दर्भ में आयोजित परिसंवाद में वरिष्ट आलोचक प्रो.नवल किशोर ने कहा कि इस पुस्तक का महत्त्व इस तथ्य में है कि लेखक कबीर के मध्याम से उनके समय के धर्म,दर्शन और संस्कृति की समग्र पड़ताल बेहद विश्वसनीय ढंग से कर सका है. अपने निष्कर्षों की पुष्टि के लिए वे यूरोप के विद्वानों और विख्यात ग्रंथों कि आलोचना करने में कैसा भी संकोच नहीं करते.

मोहन लाल सुखाड़िया विश्व विद्यालय के नेहरु अध्ययन केंद्र द्वारा ''साझी विरासत और कबीर की कविता'' विषय पर आयोजित इस परिसंवाद में सिरोही महाविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. माधव हाड़ा ने कहा कि वर्णाश्रम जैसी हमारी गढ़ी गई कई पूर्व धारणाओं को यह पुस्तक झटका देती है और औपनिवेशिक ज्ञान कांड से विरासत में मिली समझ कि विकलांगता को बहुधा दुरुस्त करती है. डॉ. हाड़ा ने प्रो. अग्रवाल द्वारा दिए देशज आधुनिकता के सिद्धांत को आलोचना व समाज विज्ञान के लिए प्रस्थान बिंदु बताया. गुरु गोबिंद सिंह विश्व विद्यालय के अंग्रेजी विभाग के प्रो. आशुतोष मोहन ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि यह ऐसी पुस्तक नहीं है जिसे मौज या सपाटे में पढ़ लिया जाये, अपितु अपने विस्तार और गहराई के कारण यह अंतर अनुशासनिक अध्ययन का आदर्श उदाहरण बन जाती है. दर्शन शास्त्र की प्राध्यापक डॉ. सुधा चौधरी न प्रो. अग्रवाल द्वारा दी गई अवधारणा ''धर्मेतर अध्यात्म'' के सम्बन्ध में अपने शंकाओं और जिज्ञासाओं को रखा. बी.एन.कालेज के डॉ. हिमांशु पंड्या ने कहा की अपनी स्थापनाओं के लिए पुस्तक 'पोलिटिकली इनकरेक्ट'' होने का जोखिम उठाने से परहेज नहीं करती. संयोजन कर रहे दिल्ली विश्व विद्यालय के हिंदी सहायक आचार्य डॉ. पल्लव ने कहा कि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने आलोचना को सभ्यता समीक्षा कहा था, सभ्यता समीक्षा के स्तर को प्राप्त करने वाली दुर्लभ आलोचना पुस्तकों में से है जो कवि रूप में कबीर को सुस्थापित करती है.

लेखकीय वक्तव्य में आलोचक और संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि जब तक हम परम्परा से विवेकपूर्ण सम्बन्ध नहीं बनाते तब तक अपने सांस्कृतिक इतिहास को सही नहीं देख सकते.उन्होंने कहा कि अपनी परम्पराओं को लेकर जैसा विचित्र रवैया भारत में है वैसा और किसी औपनिवेशिक समाज में नहीं मिलता. प्रो. अग्रवाल ने देशज आधुनिकता और उसमें औपनिवेशिक आधुनिकता द्वारा उत्पन्न किये गए व्यवधान को समझना अतीत,वर्तमान और भविष्य का बोध प्राप्त करने के लिए ही नहीं अपितु नितांत निजी आत्मबोध के लिए भी जरूरी है. इससे पहले कला महाविद्यालय की अधिष्ठाता प्रो. अंजू कोहली ने अथितियों का स्वागत किया. अध्यक्षता कर रहे विश्व विद्यालय के कुलपति प्रो. आई.वी.त्रिवेदी ने कहा कि स्थानीय और सार्वभौमिक विषयों पर ऐसे उच्च स्तरीय संवादों का सिलसिला बनाना शिक्षण संस्थानों का कर्तव्य है.प्रो. अग्रवाल के इस सुझाव पर, मेवाड़ के विख्यात प्राच्यविद मुनि जिन विजय की स्मृति को स्थाई बनाने के लिए प्रयास होने चाहिए, कुलपति ने घोषणा की कि प्रतिवर्ष मुनि जिनविजय स्मृति व्याख्यानमाला का आयोजन मोहन लाल सुखाड़िया विश्व विद्यालय द्वारा किया जायेगा. पद्म श्री से सम्मानित मुनि जिन विजय चित्तोड्गढ़ जिले के निवासी थे,जिन्होंने प्राच्य विद्या के क्षेत्र में अपने असाधारण कार्य से अंतर्राष्ट्रीय पहचान बनाई थी.प्रो. आई.वी.त्रिवेदी ने प्रो. अग्रवाल को शाल ओढ़ाकर अभिनन्दन भी किया. आयोजन में स्वयं सेवी संस्थान ''आस्था'' द्वारा हाल में प्रकाशित सामुदायिकता और साम्प्रदायिक सदभाव शृंखला कि तीन पुस्तकों का लोकार्पण भी किया गया. इस शृंखला का संपादन डॉ. पल्लव ने किया है.

नेहरु अध्ययन केंद्र के निदेशक डॉ. संजय लोढ़ा ने अंत में सभी का आभार माना. आयोजन में विश्वविद्यालय कुल सचिव मोहनलाल शर्मा, कोटा खुला विश्वविद्यालय के निदेशक प्रो. अरुण चतुर्वेदी, कवि कैलाश जोशी,आकाशवाणी के केंद्र निदेशक डॉ. इन्द्रप्रकाश श्रीमाली,मीरा कन्या महाविद्यालय की हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. मंजू चतुर्वेदी, श्रमजीवी महाविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. मलय पानेरी, आस्था के विष्णु जोशी सहित आसपास के शहरों से आये लेखक-कवियों की उपस्थिति भी रही अंकुर प्रकाशन द्वरा लगायी गई पुस्तक प्रदर्शनी का संभागियों ने पूरा लाभ लिया..

(डॉ. संजय लोढ़ा)

सोमवार, 27 जुलाई 2009

वे हिन्दुस्तानी के लेखक थे और पक्षधर भी

प्रेमचन्द की जयंती पर
वे हिन्दुस्तानी के लेखक थे और पक्षधर भी

वीरेन्द्र जैन

जब समाज को बांटने वाली शक्तियां अपना काम कर रही होती हैं तो वे उसे कई स्तरों पर बांटती हैं। दूसरी ओर समाज को एकता के सूत्र में बांधने वाली शक्तियां उसे सभी स्तरों पर बंटने से रोकती हैं हमारे देश के संदर्भ में मुंशी प्रेमचन्द समाज को एकता के सूत्र में बांधने वाली भाषा में साहित्य रचने वाले सबसे सटीक उदाहरण की तरह सामने आते हैं। एक धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था में ऐसा ही लेखक साहित्य का सर्वोच्च प्रतीक बन सकता है। उनकी प्रासंगिकता का यह सबसे बड़ा कारण है।

प्रेमचन्द हिन्दी के नहीं हिन्दुस्तानी के लेखक हैं जिन्होंने सबसे पहले अपनी हिन्दुस्तानी कहानियों को उर्दू लिपि में लिखा और बाद में नागरी लिपि में। यही कारण है कि उनका संपूर्ण साहित्य साथ ही साथ उर्दू लिपि में भी अनुवादित या कहें लिप्यांतर हुआ है। उनके भाषा सम्बन्धी विचार इस बात की पुष्टि करते हैं। वे कहते हैं कि ''राष्ट्रभाषा के नाम से हमारी कोई बहस नहीं है इसे हिन्दी कहिये, हिन्दुस्तानी कहिये, या उर्दू कहिये, चीज एक है। राष्ट्रभाषा केवल रईसों और अमीरों की भाषा नहीं हो सकती। उसे किसानों और मजदूरों की भी बनना पड़ेगा। जैसे रईसों और अमीरों से राष्ट्र नहीं बनता उसी तरह उनकी गोद में पली हुई भाषा ही राष्ट्रभाषा नहीं हो सकती।''

प्रेमचन्द न केवल कहानियों के विषय के कारण अपितु उनमें प्रयुक्त अपनी बोलचाल की भाषा के कारण भी जन-जन के प्रिय कथाकार बने हैं। वे कहते हैं कि ''लिखित भाषा की यह खूबी है कि बोलचाल की भाषा से मिले। इस आर्दश से वह जितनी दूर जाती है इतनी ही अस्वाभाविक हो जाती है''। इसी बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए एक जगह वे कहते हैं कि '' सवाल यह उठता है कि जिस कौमी भाषा पर इतना जोर दिया जा रहा है उसका स्वरूप क्या है। हमें खेद है कि अभी तक हम इसकी कोई खास सूरत नहीं बना सके हैं, इसलिए कि जो लोग उसका रूप बना सकते थे वे अंग्रेजों के पुजारी थे और हैं, मगर उसकी कसौटी यही है कि उसे ज्यादा से ज्यादा लोग समझ सकें। हमारी कोई सूबे वाली भाषा इस कसौटी पर पूरी नहीं उतरती। सिर्फ हिंदुस्तानी उतरती है, क्योंकि मेरे खयाल में हिन्दी और उर्दू एक ज़बान है। क्रिया और कर्ता, फेल और फाइल जब एक हैं, तो उनके एक होने में कोई सन्देह नहीं हो सकता। उर्दू वह हिन्दुस्तानी जबान है जिसमें अरबी फारसी के लफ्ज ज्यादा हों, उसी तरह हिंदी वह हिंदुस्तानी है जिसमें संस्कृत के शब्द ज्यादा हों। लेकिन जिस तरह अंग्रेजी में चाहे लेटिन या ग्रीक शब्द अधिक हों या एंग्लो सैक्सन, दोनों ही अंग्रेजी हैं, उसी भांति हिन्दुस्तानी भी अन्य भाषाओं के शब्दों के मिल जाने से कोई भिन्न भाषा नहीं हो जाती। साधारण बातचीत में तो हम हिंदुस्तानी का व्यवहार करते ही हैं। थोड़ी सी कोशिश से हम इसका व्यवहार उन सभी कामों में कर सकते हैं जिनसे जनता का सम्बन्ध है।

प्रेमचन्द ग्रामीण जीवन के सबसे बड़े चितेरे थे किंतु उनकी निगाह में पूरा देश और पूरा समाज रहता था इसलिए उन्होंने अपनी भाषा को बोलचाल की सरल भाषा रखते हुये भी आंचलिक नहीं होने दिया। दक्षिण भारत राष्ट्रभाषा प्रचार सभा के एक व्याख्यान में उन्होंने कहा था '' जीवित भाषा तो जीवित देह की तरह बनती रहती है। भाषा सुंदरी को कोठरी में रख कर आप उसका सतीत्व तो बचा सकते हैं,लेकिन उसके स्वास्थ का मूल्य देकर। उसकी आत्मा इतनी बलवान बनाइये कि वह अपने सतीत्व और स्वास्थ की रक्षा कर सके। बेशक हमें ऐसे ग्रामीण शब्दों को दूर रखना होगा जो किसी खास इलाके में बोले जाते हें। हमारा आर्दश तो यह होना चाहिए कि हमारी भाषा अधिक से अधिक आदमी समझ सकें। अगर इस आर्दश को हम अपने सामने रखें तो लिखते समय भी हम शब्द चातुरी के मोह में न पड़ेंगे।

एक धर्मनिरपेक्ष लेखक में ही यह शक्ति हो सकती है कि वह हर तरह की संकीर्णता को नकार कर उन्हें डांट पिला सके। प्रेमचन्द हिन्दी को संस्कृतनिष्ठ बनाकर शुद्ध हिंदी बनाने वालों पर ही अपना गुस्सा व्यक्त नहीं करते अपितु उर्दू वालों को भी उसी अधिकार से फटकारते हैंं ''इधर तो हम राष्ट्र राष्ट्र का गुल मचाते हैं, उधर अपनी ज़बानों के दरवाजे पर संगीन लिए खड़े रहते हैं कि कोई उनकी तरफ आंख न उठा सके। हिन्दी में हम उर्दू शब्दों को बिना तकल्लुफ स्थान देते हैं, लेकिन उर्दू के लेखक संस्कृत के मामूली शब्दों को भी अंदर नहीं आने देतें वह चुन चुन कर हिन्दी की जगह फारसी और अरबी शब्दों का स्तेमाल करते हैं। जरा जरा से मुजक्कर और मुअन्नस के भेद पर तूफान मच जाया करता है। उर्दू ज़बान सिरात का पुल बन कर रह गयी है जिससे जरा सा इधर उधर हुए और जहन्नुम में पहुंचे।

प्रेमचन्द के कथन की आत्मा को फिल्मी जगत ने पहचाना और माना है। यही कारण है कि आज सिनेमा, साहित्य से अधिक लोकप्रिय और सम्प्रेषणीय होता है क्योंकि उसकी भाषा न हिन्दी होती है और न उर्दू होती है अपितु हिन्दुस्तानी होती है। इसी तरह हिन्दुस्तानी फिल्म (भले ही उसका लोकप्रिय नाम हिन्दी फिल्म हो) के र्दशकों में भी कोई भाषा और धर्म का भेद भाव नहीं होता। समाज को बांटने के लाख प्रयत्नों के बाद भी आज तक हमारा संगीत हिंदुस्तानी संगीत है और वह हिंदी संगीत या उर्दू संगीत नहीं बना। प्रेमचन्द इस बात को समझते थे, मानते थे और व्यवहार में लाते थे। जनता की एकता का सच्चा पक्षधर उसकी एकजुट अभिव्यक्ति तथा उस अभिव्यक्ति के लिए एक भाषा का पक्षधर भी होगा। प्रेमचन्द ऐसे ही थे इसलिए महान थे और बने रहेंगे।